जून 2023 में INDIA गठबंधन के एक वरिष्ठ नेता ने कहा था, “मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के खिलाफ एक महागठबंधन समय की आवश्यकता है, लेकिन मुझे यकीन नहीं है कि यह संभव है.”
एक अनुभवी राजनीतिज्ञ के ये चेतावनी भरे शब्द सही साबित हुए लगते हैं. पटना की भीषण गर्मी में अलग अलग दलों के नेताओं का ये समूह भाजपा के विरोध में एक अप्रत्याशित गठबंधन बनाने के लिए जमा हुआ था, लेकिन यह गठबंधन शीघ्र ही बिखर गया. INDIA अलायंस लगभग खत्म हो चुका है, सिर्फ इसकी अंतिम यात्रा निकालनी बाकी रह गई है, बहुत संभव है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव, जहां बहुत कुछ दांव पर लगा है, इस चुनाव के बाद ये भी हो ही जाएगा.
एक तरह से, जो पटकथा चल रही है इसमें ऐसा होना अवश्यंभावी है. एक गठबंधन जो केवल मोदी के ‘चार सौ पार’ के रथ को रोकने के लिए बनाया गया था, वह 2024 के आम चुनाव खत्म होने के बाद कभी नहीं टिकने वाला था.
एक बार मोदी के प्रधानमंत्री पद पर आसीन हो जाने के बाद, हालांकि इसबार संख्याबल काफी कम है, अब राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर राज्य स्तरीय मजबूरियां हावी हो गई हैं.
क्या किसी को वाकई उम्मीद थी कि ममता बनर्जी और वाम दल बंगाल में किसी भी तरह मिल पाएंगे? क्या बिहार में दोस्त से दुश्मन बने फिर दोस्त दुश्मन (frenemies) बने लालू यादव और नीतीश कुमार कभी एक दूसरे पर भरोसा कर पाए थे? क्या कश्मीर में वर्चस्व की दौड़ में शामिल उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती एक साथ रह पाएंगे. और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) अपने उग्र हिंदुत्ववादी अतीत और अपने अस्पष्ट वर्तमान के बीच कितने समय तक सामंजस्य बिठा सकता है? राष्ट्रीय चुनाव में नरेन्द्र मोदी और भाजपा साझा दुश्मन थे, लेकिन राज्य की लड़ाई में समीकरण बदलने ही थे.
दिल्ली में यह बात सबसे ज्यादा स्पष्ट है. आठ महीने पहले, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) ने राष्ट्रीय राजधानी में गठबंधन करके लोकसभा चुनाव लड़ा था, जबकि पंजाब में दोनों एक-दूसरे के खिलाफ थे. यह एक असहज गठबंधन था, जो राजनीतिक समीकरणों से लाभ उठाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन इस दोस्ती में कोई भी केमिस्ट्री नहीं जंच रही थी.
आखिरकार, एक राजनीतिक स्टार्ट-अप के रूप में, AAP दिल्ली में कांग्रेस पार्टी के मलबे पर ही उभरी थी. यह 2011 में अरविंद केजरीवाल का इंडिया अगेंस्ट करप्शन अभियान ही था जिसने मनमोहन सिंह सरकार को कमजोर कर दिया और 2014 के आम चुनावों में भाजपा के लिए सत्ता-विरोधी माहौल बनाया.
यह केजरीवाल ही थे जिन्होंने 2013 में तीन बार की कांग्रेस की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को हराया था, और अंततः कांग्रेस के बाहरी समर्थन से पहली बार दिल्ली में सरकार बनाई थी. एक दिग्गज पुरानी पार्टी ने अपनी शक्ति एक राजनीतिक नौसिखिए के सामने समर्पित कर दी, जिससे राष्ट्रीय राजधानी में कांग्रेस का पतन तेजी से हुआ. इसके बाद कांग्रेस एक दशक में दिल्ली में एक भी सीट नहीं जीत पाई है.
इसीलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि दिल्ली कांग्रेस ने अब अपना अलग रास्ता चुनने का फैसला किया है. एक भयावह इतिहास अपने पीछे ऐसे निशान छोड़ जाता है जिससे पीछा छुड़ाना मु्श्किल होता है. हालांकि आश्चर्य की बात यह है कि कितनी जल्दी छिपी हुई दुश्मनी वाकयुद्ध में बदल गई, ये देखकर भाजपा को और भी अधिक इत्मीनान हो रहा होगा.
विडंबना यह है कि ज्यादा दिन नहीं हुए, सितंबर 2024 की ही तो बात है, राहुल गांधी ने हरियाणा विधानसभा चुनावों के लिए AAP के साथ गठबंधन को हरी झंडी दिखाई थी. हालांकि, चुनाव जीतने के प्रति अति आश्वस्त राज्य कांग्रेस ने गठबंधन की इस पहल को विफल कर दिया. अब हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव हारने के बाद पार्टी खुलकर फैसले लेने की स्थिति में नहीं है.
इस बार ‘एकला चलो रे’ ब्रांड की राजनीति करने की बारी अरविंद केजरीवाल की है. AAP ने तो यहां तक कह दिया है कि कांग्रेस को भारत गठबंधन से ‘बाहर निकाल दिया जाए’. कांग्रेस के बिना, जो कि INDIA अलायंस की एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसकी पूरे भारत में मौजूदगी है, इस गठबंधन के आंतरिक विरोधाभासों को सुलझाने के लिए चुंबक की तरह काम करने वाली कोई बड़ी ताकत नहीं होगी.
पीछे मुड़कर देखें तो व्यक्तिगत अहंकार और महत्वाकांक्षाएं इतनी परस्पर विरोधी हैं कि यह मानना भी आश्चर्यजनक है कि पहली बार INDIA अलायंस बनाने की कोशिश भी की गई थी.
इस गठबंधन को बनाने का पहला विचार देने वाले नीतीश कुमार सबसे पहले इससे बाहर निकलने वाले व्यक्ति थे, क्योंकि समूह का संयोजक बनाए जाने की उनकी उम्मीद को उनके ही साथियों ने ही नकार दिया था. ममता बनर्जी, जिन्होंने बंगाल में वामपंथियों के साथ गठबंधन करने के लिए कांग्रेस को कभी माफ नहीं किया है, राहुल गांधी के अधीन काम नहीं करेंगी, जिन्हें वह निश्चित रूप से राजनीतिक रूप से जूनियर मानती हैं. और कांग्रेस नेतृत्व, जिसका एक वर्ग 2024 में मिले 99 लोकसभा सीटों से प्रभावित है और जमीनी हकीकत से अनजान है, अभी भी खुद को सत्ता की स्वाभाविक पार्टी के रूप में देखता है.
शरद पवार, एक ऐसे नेता जो गठबंधन बनाने की भूमिका निभा सकते थे, अब 84 वर्ष के हो चुके हैं और महाराष्ट्र में हार तथा अपनी पार्टी के टूटने के बाद, उनमें आपसी मतभेदों को दूर करने के लिए राजनीतिक शक्ति नहीं बची है.
लेकिन INDIA अलायंस के ढहने में एक सीख भी है जिसका महत्व इसमें शामिल दलों से कहीं आगे जाता है. पिछले दशक में मोदी के उदय ने देश को एक पार्टी, एक नेता वाली ‘निर्वाचित निरंकुशता’ की ओर धकेलने का उन्माद पैदा कर दिया है.
पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिए जाने के डर ने ही विपक्ष को एकजुट किया. लेकिन इस समूह में मोदी-विरोध के अलावा कोई वैचारिक धरातल पर कोई समानता नहीं थी.
जिस तरह 1970 के दशक में जनता पार्टी का प्रयोग किसी भी कीमत पर इंदिरा गांधी से छुटकारा पाने की इच्छा से शुरू किया गया था, उसी तरह INDIA गठबंधन मोदी विरोध के जुनून से उभरा. हालांकि, विपक्षी राजनीति किसी भी वैचारिक आधार से विहीन अल्पकालिक नुस्खों पर जीवित नहीं रह सकती.
जनता पार्टी दो साल से कुछ ही ज़्यादा चली; INDIA गठबंधन की पारी और भी छोटी रही. कम से कम, जनता पार्टी के पास जयप्रकाश नारायण जैसा महान व्यक्तित्व था जिन्होंने कुछ समय तक उसका मार्गदर्शन किया; INDIA गठबंधन के पास न तो प्रबुद्ध नेतृत्व है और न ही अपनी दिशा तय करने के लिए कोई साझा न्यूनतम एजेंडा.
INDIA गठबंधन का पतन यह संकेत देगा कि भाजपा 2024 की शुरुआत में जहां थी, वहां वापस आ गई है, एक ऐसी प्रभावशाली शक्ति जो अपने उत्थान के रास्ते में आने वाले किसी भी विरोध को आसानी से कुचल देगी.
लोकतांत्रिक भावना में विश्वास रखने वाले नागरिकों के लिए विभाजित और टूटा विपक्ष गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए, विशेष रूप से मोदी सरकार की प्रवृत्ति को देखते हुए, जहां वह संस्थागत शक्तियों का प्रयोग करके अपने विरोधियों को लगातार रक्षात्मक स्थिति में धकेलने की कोशिश करती रहती है.
2024 के आम चुनावों ने उम्मीद की एक छोटी सी खिड़की खोली थी कि अब राजनीति में एनडीए और उसके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच संसद के अंदर और बाहर ज्यादा समान स्तर पर मुकाबला होगा. INDIA गठबंधन के तेजी से टूटने का मतलब है कि एक अधिक कठोर राजनीति की वापसी संभव है, जहां एक ताकतवर सरकार असहमति की सभी आवाजों को कुचलने और अपनी ताकत को दिखाने का लालच नहीं रोक पाएगी. ‘विपक्ष मुक्त भारत’ लोकतंत्र की वो स्थिति नहीं है जिसे इंडिया की जरूरत नहीं है.
(राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं। उनकी नई किताब है 2024:The Election That Surprised India)
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं)