राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की पहल तो कांग्रेस की तरफ से ही हुई है, लेकिन अब तक पूरा INDIA ब्लॉक साथ खड़ा लग रहा था - हालांकि, ये ममता बनर्जी के सपोर्ट में लालू यादव का बयान आने से पहले की बात है.
विपक्ष की तरफ से राज्यसभा सभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाये जाने की बात मॉनसून सत्र में भी सुनने को मिला था, लेकिन बात आई-गई हो गई - और इस बार भी विपक्ष उतना ही गंभीर लग रहा है.
असलियत और इरादा जो भी हो, लेकिन खास बात ये है कि सभापति जगदीप धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर 70 सांसदों ने हस्ताक्षर भी कर दिए हैं.
उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की तैयारी
राज्यसभा के सभापति को हटाने के लिए प्रस्ताव पर 50 सदस्यों के हस्ताक्षर की जरूरत होती है, लेकिन अब तक 70 सदस्यों ने हस्ताक्षर कर दिए हैं. अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 14 दिन पहले नोटिस दिया जाना भी जरूरी होता है, और शीतकालीन सत्र तो 20 दिसंबर तक ही चलना है. सभापति देश के उपराष्ट्रपति ही होते हैं, जो भारत का दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद है. ऐसे में ये प्रस्ताव लोकसभा से भी पारित होना जरूरी होगा.
ये प्रस्ताव ऐसे दौर में लाने की कोशिश हो रही है, जब इंडिया ब्लॉक में नेतृत्व को लेकर जोरदार जंग छिड़ी हुई है. बात काफी आगे बढ़ चुकी है, क्योंकि ममता बनर्जी की दावेदारी को आरजेडी नेता लालू यादव का भी सपोर्ट मिल गया है.
मालूम हुआ है कि राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ के खिलाफ इस मुहिम में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी भी शामिल हैं. अब तक टीएमसी और समाजवादी पार्टी के सांसदों को इंडिया ब्लॉक के विरोध प्रदर्शनों से दूरी बनाते देखा जा रहा था, लेकिन प्रस्ताव पर दस्तखत करने वालों में दोनो दलों के सांसद भी शुमार बताये जाते हैं.
राज्यसभा सभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव क्यों
राज्यसभा में बीजेपी सांसदों की तरफ से जॉर्ज सोरोस का मुद्दा उठाये जाने पर कांग्रेस के सदस्यों ने खूब हंगामा किया था. कांग्रेस की तरफ से दिग्विजय सिंह से लेकर राजीव शुक्ला तक, सभी का एक ही सवाल था कि किस नियम के तहत सभापति ने चर्चा शुरू की है. कांग्रेस सांसदों ने सभापति जगदीप धनखड़ पर पक्षपात का आरोप लगाया. विपक्ष का ये भी आरोप है कि सभापति बीजेपी के सदस्यों के नाम ले लेकर उनसे बोलने के लिए कह रहे थे.
ये प्रस्ताव पेश होता है या पास होता है या नहीं, ये अलग मसला है. कांग्रेस को इस मुद्दे पर विपक्ष के कितने दलों का साथ मिलता है, ये ज्यादा महत्वपूर्ण है. अडानी के मुद्दे पर कांग्रेस अकेली पड़ती जा रही है.
राहुल गांधी ने दो सांसदों को मोदी और अडानी का मास्क पहनाकर परेड कराई थी, और इंटरव्यू वाले अंदाज में सवाल भी पूछे थे. और, अगले ही दिन कांग्रेस की नई नवेली सांसद प्रियंका गांधी 'मोदी अडानी भाई-भाई' लिखा हुआ बैग लेकर संसद पहुंचीं - और राहुल गांधी ने देखकर कहा, ये काफी क्यूट है.
अब तो ऐसा लगता है जैसे राहुल गांधी अडानी का मुद्दा जबरदस्ती ढो रहे हैं. किसी न किसी बहाने मुद्दे को जिंदा रखने की कोशिश लगती है, और सत्ता पक्ष ने जॉर्ज सोरोस का नाम लेकर सोनिया गांधी से सफाई मांगना शुरू कर दिया है. करीब करीब वैसे ही जैसे 2020 के दिल्ली दंगे के दौरान जब सोनिया गांधी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ राष्ट्रपति भवन तक मार्च किया और दोनो को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही बीजेपी की तरह से 1984 के दंगों का हवाला देकर जवाबी हमला किया गया, कांग्रेस नेतृत्व शांत हो गया.
विपक्ष को साथ रखने के लिए राहुल गांधी को थोड़ा आगे बढ़कर जातीय जनगणना जैसा ही कोई बड़ा मुद्दा खोजना चाहिये, क्योंकि बाकी सब राजनीति में मोह-माया साबित हो रहा है.