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क्या जजों की नियुक्ति के लिए बना कॉलेजियम सिस्टम अब खत्म होने वाला है?

दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज के घर से मिले कैश ने देश की न्यायपालिका में सुधार की चर्चा को आम लोगों तक पहुंचा दिया है. जाहिर है बात जब आम लोगों तक पहुंचती है, सरकारें भी एक्शन मोड में आ जाती हैं.

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सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट

देश के उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्तियों को लेकर पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए अभी कुछ दिन पहले ही संसद में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बताया कि 2018 से अब तक सात वर्षों में देश की विभिन्न उच्च न्यायालयों में 78 प्रतिशत जज सवर्ण जाति से बनाए गए हैं. उनके अनुसार 715 जजों में से केवल 22 एससी श्रेणी से आते हैं. वहीं, 16 एसटी और 89 ओबीसी श्रेणी से आते हैं. इस दौरान 37 अल्पसंख्यकों को भी जज बनाया गया. आरोप लगता रहा है कि जजों की नियुक्तियों में देश के कमजोर वर्गों को प्रतिनिधित्व देने में कोताही की गई है.

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इसी तरह 2020 में हुए एक सर्वे की रिपोर्ट पर नजर डालिए. देश के सर्वोच्च न्यायालय में 33 फीसदी जज और हाईकोर्ट के 50 फीसदी जज ऐसे हैं जो किसी न किसी जज के परिवार से आते हैं. मुंबई के एक वकील मैथ्यूज जे नेदुमपारा की रिसर्च में यह बात सामने आई थी. दरअसल, नेदुमपारा वही वकील हैं, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट कमीशन एक्ट (NJAC act) को चुनौती देते हुए याचिका लगाई थी. उन्होंने अपनी यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संवैधानिक पीठ को सौंपी थी. नेदुमपारा के मुताबिक, यह व्यवस्था कोलेजियम सिस्टम की वजह से पैदा हुई है, जिसमें जज ही दूसरे जजों को नियुक्त करते थे.

उपरोक्त दोनों फैक्ट बताते हैं कि देश में कॉलेजियम सिस्टम को खत्म करके NJAC को लाना कितना जरूरी है. 2014 में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से ही लगातार ऐसे प्रयास होते रहे हैं कि देश में नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन (NJAC) बनाकर न्यायालयों में जजों की नियुक्ति प्रक्रिया कॉलेजियम सिस्टम को खत्म किया जा सके. सरकार ने संविधान संशोधन करके कानून भी बनाया पर न्यायपालिका ने उसे निरस्त कर दिया. इसके बाद भी सरकार निराश नहीं हुई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 78वें स्वतंत्रा दिवस पर लाल किले के प्राचीर से न्यायिक व्यवस्था में सुधार की जरूरत पर जोर देते हुए अपनी सरकार में रिफॉर्म्स पर हुए कार्यों के बारे में बताया था. मोदी ने तब कहा था कि अब न्यायिक सुधार समय की मांग है. लगता है कि अब समय आ गया है. लोहा गरम है बस विधायिका को चोट करनी है.

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धनखड़ की सभी दलों के नेताओं के साथ मीटिंग

दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास पर नकदी मिलने के विवाद के बाद न्यायिक नियुक्तियों पर बहस को एक नई दिशा मिली है. देश भर में एक बार फिर एनजेएसी के लिए माहौल तैयार हो रहा है. उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने मंगलवार को संसद द्वारा 2014 में पारित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम का जिक्र करते हुए कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज नहीं किया होता, तो स्थिति अलग होती. यह अधिनियम नरेंद्र मोदी सरकार का पहला बड़ा न्यायिक सुधार प्रयास था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में असंवैधानिक घोषित कर दिया.  इस अधिनियम के जरिए सरकार को उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में एक भूमिका मिलती, जिसे कॉलेजियम प्रणाली द्वारा पूरी तरह नियंत्रित किया जाता है. अब सवाल यह उठता है कि क्या NJAC को वापस लाया जा सकता है? धनखड़ ने ये बातें विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं से मुलाकात के दौरान कही. इसके पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से भी धनखड़ ने इसी विषय के संबंध में मुलकाता की थी.

क्या संसद से पास कराना आसान होगा?

अगर हम अगस्त 2014 में संसद से पारित संविधान का 99वां संशोधन अधिनियम और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम को मिले समर्थन को देखें तो ऐसा लगता है कि सरकार अगर चाह ले तो इसे कानून को फिर से पास करा सकती है. 2014 में
लोकसभा में 367 सांसदों ने इसके पक्ष में मतदान किया, किसी ने विरोध नहीं किया.

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राज्यसभा में 179 सांसदों ने समर्थन किया, जबकि AIADMK के 37 सांसदों ने मतदान में भाग नहीं लिया.केवल राम जेठमलानी अकेले राज्यसभा सांसद थे, जिन्होंने इसका विरोध किया था. 16 राज्यों ने इस विधेयक को अनुमोदित किया, जिनमें कांग्रेस और वाम दलों द्वारा शासित राज्य भी शामिल थे. इस आधार पर ऐसा लगता है कि कॉलेजियम सिस्टम को खत्म करके एनजेएसी को लाने के लिए देश के सभी दलों में आम सहमति है.

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