दिल्ली चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल ने एक नया दावा किया था, ‘मैं अकाउंट का जादूगर हूं.’ अरविंद केजरीवाल ने ये बात मुख्यमंत्री महिला सम्मान स्कीम को लेकर कहा था, जिसमें दिल्ली की महिलाओं को 2100 रुपये महीने दिये जाने का वादा था.
असल में, वो लोगों को ये समझाने की कोशिश कर रहे थे कि वे उनके राजनीतिक विरोधियों के बहकावे में न आयें कि स्कीम के लिए फंड का इंतजाम कहां से होगा. वो हर हाल में इंतजाम कर लेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अरविंद केजरीवाल ने अपनी बात समझाने की पूरी कोशिश की, लेकिन चुनाव नतीजे बता रहे हैं कि जनता ने मान लिया था कि केजरीवाल से ना हो पाएगा. वे सिर्फ बहका रहे हैं.
बात ये थी कि अरविंद केजरीवाल अब तक अपनी हर बात इसी अंदाज में समझाते आ रहे थे, लोगों को समझ नहीं भी आता था, तो वो मान लेते थे. कभी कभी उनको शक भी होता था, लेकिन भरोसा इतना मजबूत था कि हवा हवाई बातें भी सही लगतीं.
लेकिन, ये नहीं भूलना चाहिये था कि एक बार चल गया तो बार बार वही सिक्का नहीं चलने वाला. भरोसे की राह में छोटा सा संदेह भी बहुत भारी पड़ता है. और, जहां कहीं भी संदेह की गुंजाइश बनती है, भरोसे की बड़ी से बड़ी इमारत ढहते देर नहीं लगती. कहते तो ये भी हैं, ‘खुदा जब हुस्न देता है तो नजाकत आ ही जाती है’, केजरीवाल के साथ भी ऐसा ही हुआ है - लोगों के सपोर्ट से पैदा गुरूर, और गुरूर से पैदा नजाकत ही अरविंद केजरीवाल को भारी पड़ा है.
2013 में शीला दीक्षित को हराने के बाद अरविंद केजरीवाल वाराणसी भी पहुंच गये थे. लोकसभा चुनाव लड़ने. तब बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ गंगा में डूबकी भी लगाई, और चुनाव भी ठीक-ठाक लड़े, लेकिन दिल्ली नहीं दोहरा पाये.
2015 के चुनाव में पूरी दिल्ली घूम घूम कर लोगों से माफी मांगी. लोगों ने फिर से सिर पर बिठा लिया, और वो आसमान छूने लगे. आसमान छूने तक तो चलता है, लेकिन आसमान में ज्यादा देर तक उड़ा नहीं जा सकता, और धरती का सपोर्ट छूटते ही, आदमी चारों खाने चित्त हो जाता है - अरविंद केजरीवाल के साथ बिलकुल वही हुआ है.
अरविंद केजरीवाल खुद को राजनीति का जादूगर समझने लगे थे. जादूई दुनिया काफी मजेदार लगती है, लेकिन वो हकीकत तो नहीं होती. अरविंद केजरीवाल को लगा वो अपने जादू से लोगों को खुद और अपने साथियों के कट्टर इमानदार होने की बात भी समझा देंगे, लेकिन मायाजाल से पैदा लोगों का भ्रम टूटा और नतीजा सामने है. ऐसा भी नहीं कि सब खत्म ही हो गया है, लेकिन बहुत बड़ा झटका तो लगा ही है.
1. चुनाव के लिए जमानत मिली, लेकिन लोगों की सहानुभूति नहीं
दिल्लीवालों ने तो लोकसभा चुनाव में ही केजरीवाल को अपना मैसेज दे दिया था. बल्कि, फैसला ही सुना दिया था. लेकिन, वो तो अग्नि परीक्षा देने पर आमादा थे. सीता माता की तरह अग्नि-परीक्षा दे रहे थे. श्रवण कुमार बनकर सेवा करने का दावा कर रहे थे, और बीच बीच में हनुमान भी बने हुए थे - इतने सारे रूपों में देखकर लोग समझ ही नहीं पाये, किस रूप पर भरोसा करें. और आगे बढ़ गये. केजरीवाल हाथ मलते रह गये.
लोकसभा चुनाव कैंपेन के दौरान अरविंद केजरीवाल बार बार कहते रहे कि अगर दिल्लीवालों का वोट मिला तो उनको जेल नहीं जाना पड़ेगा. लेकिन, लोगों ने परवाह नहीं की. केजरीवाल हर तरह से लोगों की सहानुभूति बटोरने की कोशिश करते रहे, लेकिन किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा.
2. खुद को ईमानदार बताने के लिए सबको बेइमान बता डाला
अरविंद केजरीवाल ने बारी बारी सबको भ्रष्ट बता डाला था. 2011-12 में जब देश में अन्ना आंदोलन की हवा बनी थी, कांग्रेस नेतृत्व तो केजरीवाल के निशाने पर था ही, शरद पवार से लेकर लालू यादव तक सबका नाम ले लेकर भ्रष्ट बताते रहे.
संसद में बैठे सारे नेताओं को एक साथ लुटेरे, डकैत और बलात्कारी बता डाला था. संसद में अरविंद केजरीवाल के बयान पर चर्चा तो हुई, हालांकि निंदा प्रस्ताव पारित नहीं हुआ - लेकिन बाद में कई नेताओं ने मानहानि का दावा जरूर ठोक दिया.
जब कानूनी रूप से फंसे तो माफी मांग ली - और जिस कांग्रेस को भ्रष्ट बता रहे थे, दिल्ली में समर्थन लेकर पहली सरकार भी बना ली.
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवारों के लिए रोड शो करके वोट भी मांगने लगे - पब्लिक है, सब जानती है. बस, बताती एक ही बार है.
3. भ्रष्टाचार खत्म करने का वादा सिर्फ जुमला निकला
अरविंद केजरीवाल ने जो उम्मीद जगाई थी, उसे ही तोड़ा डाला है. लोगों ने बड़े धैर्य से इंतजार किया. पूरा मौका दिया. लक्षण तो तभी दिख गये थे, जब 2013 में सवा महीने में ही दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर भाग खड़े हुए थे. तब कहा था कि जब लोकपाल बना ही नहीं सकते तो सत्ता में रहने का क्या फायदा.
फिर भी दिल्लीवालों ने भरोसा करके 2015 में 70 में से 67 और 2020 में 62 सीटें दे डाली. लेकिन, वो पैंतरा बदलते रहे - जिस लोकपाल की मांग लेकर राजनीति में आये थे, वो तो बाद में कभी उनके मुंह से सुनने को भी नहीं मिला.
4. आम आदमी की सादगी सिर्फ मार्केटिंग मैटीरियल बन गई
अरविंद केजरीवाल जब राजनीति में आये तो सादगी की मिसाल हुआ करते थे. चुनावों के दौरान तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी याद दिला रहे थे कि कैसे अरविंद केजरीवाल नीले रंग की वैगन-आर कार से चला करते थे. भारी भरकम सुरक्षा इंतजाम और वीआईपी कल्चर के विरोधी हुआ करते थे.
लेकिन, वही अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री आवास में निर्माण को लेकर ‘शीशमहल’ के आरोपों में घिर गये - और दिल्ली आबकारी नीति केस में जेल तक जाना पड़ा.
मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही दिन बाद अरविंद केजरीवाल वो सब करने लगे जिन चीजों का खुद विरोधी होने का दावा किया करते थे. अरविंद केजरीवाल की शुरुआती राजनीति के बेहद करीबी साथी रहे पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष की एक टिप्पणी बड़ी सटीक लगती है.
आम आदमी पार्टी तो उसी दिन ख़त्म हो गई थी जिस दिन इस पार्टी के लोग चार्टर्ड फ़्लाइट से चलने लगे,
— ashutosh (@ashutosh83B) February 10, 2025
Presidential suite में रहने लगे, अपने लिये शीश महल बनाने लगे, Z+ security लेने लगे, चुनाव लड़ने के लिये कहने लगे कि हरियाणा ने पानी में ज़हर मिला दिया Genocide के लिये, पत्रकारों को…
5. राजनीति में भी बिकाऊ चीजें टिकाऊ नहीं होतीं
अरविंद केजरीवाल नौकरशाही की पृष्ठभूमि से आये थे. आंदोलन के रास्ते. सूचना के अधिकार के लिए काम करते रहे, और रमन मैगसेसे अवॉर्ड पाया - और आंदोलन को जारी रखते हुए राजनीति में एंट्री ली. एंट्री भी धमाकेदार रही.
अब तो ऐसा लगता है, ‘अकाउंट के जादूगर’ होने का दावा करने वाले अरविंद केजरीवाल ने किसी कारोबारी कंपनी की तरह आम आदमी पार्टी के नाम से राजनीतिक पार्टी बनाई, और अलग अलग तरह के प्रोडक्ट बेच डाले - लेकिन अब तो ये भी साफ हो गया है कि राजनीति में भी चीजें बिकाऊ हो सकती हैं, लेकिन टिकाऊ नहीं.