ममता बनर्जी को लेकर मल्लिकार्जुन खरगे और अधीर रंजन चौधरी के सरेआम भिड़ जाने के बावजूद मामला करीब करीब रफा दफा हो गया है - और जो बात सामने आई है, उससे तो यही लगता है कि अधीर रंजन भारी पड़े हैं.
मल्लिकार्जुन खरगे को अपना स्टैंड बदलना पड़ा है. ऐसे भी कह सकते हैं कि संजीदगी के साथ यू-टर्न लेना पड़ा है. सॉरी बोलने जैसा तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन अधीर रंजन चौधरी को जोरदार फटकार लगाने के बाद मल्लिकार्जुन खरगे पुचकारते नजर आ रहे हैं - और यथासंभव नये सिरे से तारीफ करने लगे हैं.
क्या ये सब ममता बनर्जी की वजह से हुआ है?
या मल्लिकार्जुन खरगे को अपना रुख अधीर रंजन चौधरी की वजह से नरम करना पड़ा है?
या फिर राहुल गांधी की तरफ से कोई खास मैसेज मिलने के बाद हुआ है?
बड़ा सवाल ये है कि आखिर ममता बनर्जी कांग्रेस के लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों हो गई हैं?
क्योंकि दिल्ली में तो ममता बनर्जी को राहुल गांधी खास अहमियत देते नहीं, न ही वो राहुल गांधी को कभी देती हैं.
मल्लिकार्जुन को नरम क्यों होना पड़ा?
ममता बनर्जी के प्रति राहुल गांधी के स्टैंड को देखें तो सीधे सीधे कुछ भी साफ साफ समझ में नहीं आता. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी वैसी ही बात की है, जो हाल के दिनों में जयराम रमेश के मुंह से सुनी जाती रही है.
जैसे कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश INDIA ब्लॉक अस्तित्व में आने के बाद से ममता बनर्जी के प्रति उम्मीदों से भरपूर बयानबाजी करते रहे हैं, मल्लिकार्जुन खरगे की बातों में भी उसी तरह का रुख जाहिर होता है.
और ये भी सच है कि अधीर रंजन भी ममता बनर्जी के प्रति अपनी बात पर पहले की ही तरह कायम हैं - बस, पहली बार किसी ने टोका-टोकी की है.
वैसे भी बतौर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का इतना हक तो बनता ही है कि वो किसी भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को कमांड करने के लिए हिदायतें जारी कर सकें. हदें तक कर सकें.
लगता है मल्लिकार्जुन खरगे ये बाद भूल गये कि अधीर रंजन चौधरी सिर्फ पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष ही नहीं हैं, लोकसभा में विपक्ष के नेता भी हैं. 2014 में मल्लिकार्जुन खरगे भी इसी भूमिका में थे, लेकिन 2019 में लोकसभा चुनाव हार जाने के कारण मल्लिकार्जुन खरगे के लिए कांग्रेस को राज्यसभा में भेजने का इंतजाम करना पड़ा. राज्यसभा में फिलहाल मल्लिकार्जुन खरगे भी उसी पोजीशन में हैं, जो लोकसभा में अधीर रंजन की पोजीशन है.
देखा जाये तो मल्लिकार्जुन खरगे कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते भी अधीर रंजन से ऊपर की हैसियत रखते हैं, लेकिन कागजी और किताबी बाते व्यवहार में भी लागू होती हों, जरूरी भी तो नहीं है - ताजा मामला सबसे बड़ी मिसाल है.
ऐसा लगता है, मल्लिकार्जुन खरगे एक पल के लिए पूरी तरह भूल गये कि राहुल गांधी ने ही अधीर रंजन को कोलकाता से बुलाकर दिल्ली में तैनात किया है, और 2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव में भी राहुल गांधी ने ही कोलकाता भेजा था - जाहिर है, राहुल गांधी ने ये सारे ही फैसले सोच समझ कर ही लिये होंगे, और ये सब जानते हुए मल्लिकार्जुन खरगे को अधीर रंजन चौधरी को ममता बनर्जी के मामले में फटकार लगाने की जरूरत ही क्या थी? वो भी तब जब अधीर रंजन चौधरी को भी मल्लिकार्जुन खरगे की हदें अच्छी तरह मालूम हैं.
बहरहाल, मल्लिकार्जुन खरगे ने बातों बातों में ही अपनी तरफ से कदम पीछे खींचते हुए अधीर रंजन चौधरी के साथ समझौता कर लिया है. मल्लिकार्जुन खरगे के ताजा बयान से तो ऐसा ही लगता है.
ये पूछे जाने पर कि क्या कांग्रेस अधीर रंजन चौधरी के साथ भी वैसा ही व्यवहार कर रही है, जैसे कभी ममता बनर्जी के साथ पेश आई थी, मल्लिकार्जुन खरगे कहते हैं, 'मैं किसी एक व्यक्ति के बारे में कुछ नहीं कहना चाहूंगा... वो कांग्रेस पार्टी के एक लड़ाकू सिपाही हैं... और बंगाल में हमारे नेता हैं.'
कांग्रेस के लिए अधीर रंजन चौधरी से बड़ा नहीं है ममता बनर्जी का कद
INDIA ब्लॉक को लेकर ममता बनर्जी के हाल के बयानों पर अधीर रंजन चौधरी का कहना था, ‘मुझे उन पर भरोसा नहीं है... वो गठबंधन छोड़ चुकी हैं... वो बीजेपी की तरफ भी जा सकती हैं... वो बाहर या अंदर क्या करेंगी, मुझे नहीं पता... ये आपको उनसे पूछना होगा, लेकिन मुझे उन पर भरोसा नहीं है.
ममता बनर्जी को अवसरवादी नेता बताते हुए अधीर रंजन ने कहा था कि वो जमीनी हकीकत को समझने लगी हैं... वोटर का झुकाव इंडिया ब्लॉक की ओर हो रहा है... इंडिया ब्लॉक को समर्थन देने से उनको चुनाव में मदद मिलेगी इसलिए ये सब कर रही हैं.
मल्लिकार्जुन खरगे ने यही सब सुन कर बोल दिया था कि ममता बनर्जी गठबंधन में रहेंगी या नहीं, ये फैसला लेने वाले अधीर रंजन कोई नहीं होते. ये सुनते ही अधीर रंजन ने अपने तरीके से मल्लिकार्जुन खरगे को अपनी अहमियत भी समझा दी थी - और नतीजा तो सबके सामने है ही.
अधीर रंजन शुरू से ही ममता बनर्जी के प्रति वैसा ही कड़ा रुख रखते हैं, और कभी किसी ने उनकी बातों पर आपत्ति नहीं जताई है. ममता बनर्जी कह चुकी थीं कि वो अकेले चुनाव लड़ेंगी, फिर भी जयराम रमेश कहते रहे कि टीएमसी के साथ बातचीत चल रही है, लेकिन अधीर रंजन अपनी बात पर अड़े रहे - और ममता बनर्जी के खिलाफ हमेशा की तरह हमलावर रहे.
कुछ दिन पहले टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी का बयान आया था कि अधीर रंजन के कारण ही टीएमसी और कांग्रेस का चुनावी गठबंधन नहीं हो सका - और हाल ही में ममता बनर्जी का कहना था कि इंडिया गठबंधन की सरकार बनी तो तृणमूल कांग्रेस बाहर से सपोर्ट करेगी, लेकिन 24 घंटे में ही भूल सुधार के साथ ममता बनर्जी ने अपनी ही बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि वो इंडिया गठबंधन का ही हिस्सा हैं - मतलब, ये समझा जाये कि केंद्र में विपक्ष की सरकार बनी तो वो उसमें शामिल भी हो सकती हैं.
अधीर रंजन अपने स्वभाव के अनुसार इसी पर बोले कि ममता बनर्जी पर वो भरोसा नहीं कर सकते. अधीर रंजन का कहना था, 'मैं किसी ऐसे व्यक्ति के पक्ष में नहीं बोल सकता जो मुझे और हमारी पार्टी को बंगाल में राजनीतिक रूप से खत्म करना चाहता है... ये लड़ाई कांग्रेस के हर कार्यकर्ता की है... मैंने उनकी ओर से बोला है.
और मल्लिकार्जुन खरगे ने इसी बात पर अधीर रंजन को फटकार लगाई थी, वो होते कौन हैं? लेकिन अधीर रंजन को भी तो पता ही है कि मल्लिकार्जुन खरगे और उनकी हैसियत में मामूली फर्क है - दिल्ली में खरगे का हस्ताक्षर चलता है, लेकिन कोलकाता में तो अधीर रंजन को कोई ओवरराइट भी नहीं कर सकता.
ममता बनर्जी के मामले में राहुल गांधी डबल स्टैंडर्ड क्यों?
भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान ममता बनर्जी ने अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा करके असल में राहुल गांधी से बदला लिया था. ममता बनर्जी ने ये ऐलान न्याय यात्रा के साथ राहुल गांधी के पश्चिम बंगाल में दाखिल होने के ठीक एक दिन पहले किया था.
अब ये भी समझ लेते हैं कि बदला किस बात का?
2021 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी के लिए करो या मरो जैसा ही था. बीजेपी ने उनको हर तरीके से कमजोर करने की कोशिश की थी, यहां तक कि ममता बनर्जी को नंदीग्राम में अपने ही पुराने साथी से चुनावी शिकस्त तक झेलनी पड़ी थी - लेकिन प्रशांत किशोर की रणनीतिक मदद से ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस की सत्ता में शानदार वापसी कराने में पूरी तरह सफल रहीं.
चुनावों के दौरान ही ममता बनर्जी ने कहा था कि एक पैर से बंगाल जीतूंगी और दो पैरों से दिल्ली. असल में चुनाव के दौरान ही ममता बनर्जी के पैर में चोट लग गई थी, जिसके चलते वो व्हील चेयर पर बैठ कर ही चुनाव प्रचार करती रहीं.
लेकिन चुनाव जीतने के बाद जैसे ही वो दिल्ली पहुंचीं, राहुल गांधी एक्टिव हो गये और विपक्षी दलों के नेताओं के साथ मीटिंग करने लगे. ममता बनर्जी भी उसी काम के लिए दिल्ली पहुंची थीं, और आखिर में बड़े भारी मन से वापस गईं.
मल्लिकार्जुन खरगे और अधीर रंजन की तकरार से एक बात तो साफ हो गई है कि बंगाल में ममता बनर्जी के प्रति राहुल गांधी का स्टैंड बदला नहीं है. राहुल गांधी दिल्ली में ममता बनर्जी को बर्दाश्त नहीं कर पाते, लेकिन कोलकाता में वो ममता बनर्जी के खिलाफ बस इतना ही कर पाते हैं कि उनके पीछे अधीर रंजन को लगा देते हैं - ममता बनर्जी के प्रति राहुल गांधी की यही डबल स्ट्रैंडर्ड नहीं समझ में आता.