
लोकसभा चुनाव की दृष्टि से उत्तर प्रदेश देश का सबसे अहम राज्य है जहां से निचले सदन (लोकसभा) के लिए 80 सांसद चुने जाते हैं. राज्य के पश्चिमी जिलों में आठ सीटों पर 19 अप्रैल को मतदान हुआ और आठ अन्य सीटों पर 26 अप्रैल को फिर से मतदान होना है. पहले चरण के मतदान के बाद की ग्राउंड रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि बसपा के लिए 2019 के उस प्रदर्शन को दोहरा पाना मुश्किल होगा जब उसे 10 सीटें मिली थी.
पिछले सप्ताह प्रचार अभियान के दौरान, बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने वादा किया था कि अगर उनकी पार्टी राज्य की सत्ता में आती है, तो वह इन जिलों को मिलाकर एक अलग राज्य (पश्चिमी उत्तर प्रदेश) बनाएंगी. यह पहली बार नहीं है कि बसपा अध्यक्ष ने उत्तर प्रदेश को छोटे भागों में बांटने की बात कही है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बसपा का यह चुनावी दांव उसे सियासी फायदा दिला पायगा? इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या इससे बसपा उत्तर प्रदेश में अपनी गिरती चुनावी साख को फिर से पुनर्जीवित कर पाएगी?
राजनीतिक विश्लेषकों के लिए बसपा हमेशा से एक पहेली रही है. कई बार पार्टी के पतन की भविष्यवाणियां की गई लेकिन संकट के समय में बसपा अधिक ताकत के साथ वापस लौटी. हालांकि, राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनने की बसपा की महत्वाकांक्षा निर्विवाद रूप से ख़त्म हो गई है. 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी के यूपी में एक महत्वपूर्ण सियासी दल के रूप में फिर से उभरने की संभावनाएं कुछ खास नहीं दिख रही हैं.
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बसपा का सियासी सफर
बसपा ने अपनी चुनावी यात्रा 1980 के दशक में शुरू की और अनुकूल जातीय समीकरणों और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण चुनावों के दौरान वह यूपी के अंदर अपना वोट शेयर लगातार सफलतापूर्वक बढ़ाते चले गई. बसपा का शुरूआती दौर 1993 के विधानसभा चुनावों तक चला जब दलित मतदाता ही बसपा का कोर वोटर माना जाता था और पार्टी दोहरे अंकों तक भी अपनी सीटें नहीं पहुंचा पा रही थी.
1993 का चुनाव बसपा ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में लड़ा और शानदार जीत हासिल करते हुए 67 सीटें जीतीं. सपा नेता मुलायम सिंह यादव बसपा और अन्य दलों के समर्थन से मुख्यमंत्री बने. इस दौरान कांशीराम और मायावती ने धीरे-धीरे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लोगों के बीच अपनी पार्टी के सामाजिक आधार का विस्तार करने की कोशिश की. इससे बसपा को सबसे पिछड़े वर्गों (एमबीसी) के बीच बढ़त हासिल करने में मदद मिली. यह ऐसा वर्ग था जो यादव और लोध जैसे उच्च ओबीसी के प्रभुत्व से नाराज था.
बसपा का मास्टरस्ट्रोक
1999 से 2014 के बीच यूपी में भारतीय जनता पार्टी की किस्मत में बड़ा सियासी उलटफेर तब हुआ तब बसपा ने खुद को सपा के प्राथमिक विकल्प के रूप में स्थापित कर लिया. 2004 के लोकसभा चुनावों के बाद, मायावती ने अपनी पार्टी के संदेश को "बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय" से "सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय" में बदलकर एक मास्टरस्ट्रोक खेला.
दलितों, एमबीसी और ऊंची जातियों को एक साथ लाने के प्रयोग से बसपा को अपने दम पर बहुमत हासिल करने में मदद मिली. 2007 के राज्य विधानसभा चुनावों में यूपी में पार्टी का वोट शेयर 25 प्रतिशत को पार कर गया. कई लोग मानते हैं कि 2000 के दशक में बसपा उम्मीदवार इस बात से पूरी तरह आश्वस्त हो गए थे कि दलित वोट बैंक उनका पक्का वोटर हो गया है.
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लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों में, पार्टी को अपने वोट शेयर में गंभीर गिरावट का सामना करना पड़ा क्योंकि दलित मतदाताओं का एक वर्ग भाजपा की तरफ शिफ्ट हो गया था और इसकी वजह से बसपा का वोट प्रतिशत 20 प्रतिशत से भी कम हो गया. हालांकि 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में उसे 22.2 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन पार्टी मुश्किल में रही. यूपी में 2019 के लोकसभा चुनाव में एसपी के साथ गठबंधन बनाने के अप्रत्याशित दांव से उतना चुनावी लाभ नहीं मिला. गठबंधन के बावजूद, भाजपा राज्य में सबसे अधिक सीटें जीतने में सफल रही.
2014 के बाद बसपा के प्रदर्शन में लगातार गिरावट
बसपा दलित मतदाताओं के बीच अपने घटते जनाधार को रोकने में विफल रही और इसका फायदा बीजेपी को मिला जिसने बसपा की सियासी जमीन को हथिया लिया. इसके अलावा, पार्टी ने धीरे-धीरे कई अन्य समूहों के बीच भी अपना समर्थन खो दिया. पिछले चुनावों में कुर्मी, कोइरी, राजभर, निषाद आदि जैसी कई पिछड़ी जातियां और मुसलमानों की निचली जातियां जो बड़ी संख्या में बसपा के पक्ष में आई थीं वो अब उसके पाले से छिटक गईं. 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से बसपा ने इन मतदाताओं के बीच अपनी पैठ नहीं बना सकी.
2017 के विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी और कमजोर हो गई. इससे पहले, 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में इसे राज्य में 20 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे. हालांकि 2019 में बसपा को 19 प्रतिशत वोट मिले और वह गठबंधन के तहत 10 सीटें जीतने में कामयाब रही. लेकिन यह साफ हो गया था कि पार्टी पार्टी अपने अपने बदौलत चुनाव नहीं जीत सकी था. बसपा ने सपा के आधार का सहारा लिया.
2007 में पार्टी 310 सीटों पर या तो जीती या उपविजेता रही और यह संख्या 2012 में मामूली गिरावट के साथ 289 सीटों पर आ गई. 2017 के चुनावों में यह तस्वीर काफी हद तक बदल गई जब उसने सिर्फ 19 सीटें जीतीं और केवल 119 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही. 2012 और 2017 के विधानसभा चुनावों के बीच बसपा का वोट बैंक बड़ी तेजी से उसके पाले से खिसक गया. कुल मिलाकर, 2012 की तुलना में 295 निर्वाचन क्षेत्रों में वोट शेयर में गिरावट आई और केवल 108 निर्वाचन क्षेत्रों में वृद्धि हुई.
राज्य में 2022 के विधानसभा चुनावों ने दलितों के मूल आधार के बीच भी पार्टी का समर्थन कम होते चला गया. पार्टी ने बमुश्किल केवल एक सीट जीती (और 18 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही) और कुल वोटों का 12.8 प्रतिशत हासिल किया. बड़ी संख्या में पार्टी के उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई.
चुनाव बाद सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में आधे से भी कम दलितों ने पार्टी को वोट दिया. एक चौथाई जाटव और लगभग आधे गैर-जाटव दलितों ने भाजपा को वोट दिया. पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन से संकेत मिलता है कि राज्य में सत्ता के दावेदार के रूप में वापसी के लिए उसे वोट शेयर में पर्याप्त बढ़ोतरी हासिल करनी होगी.
प्रदर्शन में गिरावट की वजह?
2007 में यूपी में बहुमत हासिल करने के बाद 2009 के लोकसभा चुनावों में, बसपा और मायावती ने दिल्ली में बड़ा पद हासिल करने का लक्ष्य रखा. लेकिन यह अवसर जल्दी ही ख़त्म हो गया. लोकनीति द्वारा एकत्र किए गए सर्वेक्षण के आंकड़े मायावती की घटती लोकप्रियता को रेखांकित करते हैं. राजनीतिक प्रचार की उनकी पिछली शैली, जो पूरी तरह से जाति की पहचान के इर्द-गिर्द केंद्रित थी, वह दो कारणों से दलित मतदाताओं के बीच कम होती चले गई.
सबसे पहले, पिछले कुछ वर्षों के दौरान दलितों के बीच एक नया वर्ग उभरा है, जो आधुनिक सोच के साथ-साथ आकांक्षी भी है. यह समूह मोदी की राजनीति की शैली को अधिक पसंद करता है, जो अपनी पिछड़ी जाति की पहचान पर गर्व का दावा करते हुए आर्थिक बदलाव की बात करते हैं. दूसरा, भ्रष्टाचार के मामलों, सत्ता के केंद्रीकरण और बसपा के वैचारिक संदेश के कमजोर होने के कारण मायावती की छवि धूमिल हो रही है. इसके अलावा, मायावती ने अपनी संगठनात्मक मशीनरी को फिर से विकसित करने, नेतृत्व की दूसरी पंक्ति को प्रोत्साहित करने या एक विश्वसनीय राजनीतिक संदेश देने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया है.
हालांकि यह सच है कि मायावती के नेतृत्व ने पार्टी को अपनी पार्टी का विस्तार करने में मदद की जिसकी कल्पना कांशीराम द्वारा की गई थी. बसपा ने खुद को एक सामाजिक आंदोलन से राजनीतिक पार्टी में बदल दिया. बसपा ने धीरे-धीरे खुद को एक आंदोलन-आधारित पार्टी से अलग-अलग राजनेताओं के एक समूह में बदल लिया, जो विशुद्ध रूप से व्यावहारिक कारणों से अन्य पार्टियों से अलग हो गए थे. पार्टी, उसके कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच संबंध तेजी से लेन-देन वाले हो गए. सुप्रीमो-केंद्रित पार्टी अंततः एक ही परिवार द्वारा नियंत्रित पार्टी बन गई.
सुप्रीमो-केंद्रित से लेकर वंशवादी पार्टी तक
मायावती ने पिछले साल अपने भतीजे आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया, जो तब से पार्टी के अभियान का सबसे प्रमुख चेहरा रहे हैं. हालांकि, आनंद को अभी भी ज़मीन पर अपनी राजनीतिक क्षमता साबित करने की ज़रूरत है. मायावती सहित बसपा के अधिकांश शीर्ष नेता (हालांकि उनमें से अधिकांश ने या तो पार्टी छोड़ दी है या उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है) उत्तर प्रदेश में 2024 के चुनाव अभियान से काफी हद तक साइडलाइन हैं.
मायावती के समर्थकों और विरोधियों के बीच चर्चा है कि वह काफी दबाव में हैं क्योंकि उन्हें कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रहे प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और अन्य केंद्र सरकार एजेंसियों की कार्रवाई का डर है. इसने राजनीतिक प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल न होने और विपक्षी इंडिया गुट में शामिल होने के लिए गंभीर प्रयास न करने के उनके निर्णयों को प्रभावित किया है. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि बसपा वास्तव में ऐसे उम्मीदवार उतार रही है जो उत्तर प्रदेश की कई सीटों पर इंडिया ब्लॉक की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाएंगे.
क्या पश्चिमी यूपी में मायावती के अभियान से बसपा को कोई उम्मीद की किरण नजर आ रही है? यूपी की बढ़ती द्विध्रुवीय राजनीति में बसपा अब पूरी तरह से हाशिए पर चली गई है और ऐसी संभावना है कि 2024 में बसपा का वोट शेयर कम हो सकता है.
(लेखक नई दिल्ली में सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में फेलो हैं)