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2024 में नेता प्रतिपक्ष के लिए जुगाड़ लगा रहे हैं केसी वेणुगोपाल, निजी महत्वाकांक्षाओं से भरी है कांग्रेस की पहली लिस्ट

अलप्पुझा लोकसभा सीट से एआईसीसी के महासचिव केसी वेणुगोपाल की उम्मीदवारी ने कांग्रेस के भीतर ही कई लोगों को चौंका दिया है. कांग्रेस परिवार में उन्हें केसीवी के नाम से जाना जाता है. वह मौजूदा समय में राजस्थान से राज्यसभा सांसद हैं और उनका ये कार्यकाल 2028 तक है. केसीवी अलप्पुझा से जीतते हैं तो, उनकी राज्यसभा सीट बीजेपी के पास जाएगी.

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कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और केसी वेणुगोपाल | Photo: PTI
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और केसी वेणुगोपाल | Photo: PTI

लोकसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने बचे हैं. ऐसे में सभी राजनीतिक दलों ने अपनी कमर कस ली है. कांग्रेस ने हाल ही में लोकसभा चुनावों को लेकर 39 उम्मीदवारों की अपनी पहली लिस्ट जारी की है. लेकिन ऐसा लगता है कि लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के उम्मीदवारों की पहली लिस्ट में संगठनात्मक हितों के बजाए व्यक्तिगत हितों को अधिक महत्व दिया गया.

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उदाहरण के लिए कांग्रेस की पहली लिस्ट के नामों पर गौर करें. छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव जीतने के बावजूद छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल राजनांदगांव लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. बघेल जाहिर तौर पर खुद को एक बड़ी भूमिका में देखना चाहते हैं. वह मौजूदा समय में ना तो अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआईसीसी) के अधिकारी हैं, ना ही कांग्रेस विधायक दल के नेता हैं और ना ही कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य हैं. बघेल की पूरी योजना है कि वह लोकसभा चुनाव में राजनांदगांव सीट से जीत दर्ज कर कांग्रेस के विश्वसनीय पिछड़े नेता के तौर पर खुद को पेश करें.

बघेल छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में हारने वाली अपनी छवि से पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रहे हैं. वहीं, राजस्थान के उनके पूर्व समकक्ष अशोक गहलोत की छवि गठजोड़ करने वाले नेता की है. गहलोत लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं लेकिन उनके बेटे वैभव जालौर से उम्मीदवार हैं. इससे भी बड़ी बात यह है कि गहलोत कांग्रेस को राजस्थान की आधा दर्जन संसदीय सीटों पर जिताने की जिम्मेदारी भी नहीं ले रहे. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में 25 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला था. 

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अलप्पुझा लोकसभा सीट से एआईसीसी के महासचिव केसी वेणुगोपाल की उम्मीदवारी ने कांग्रेस के भीतर ही कई लोगों को चौंका दिया है. कांग्रेस परिवार में उन्हें केसीवी के नाम से जाना जाता है. वह मौजूदा समय में राजस्थान से राज्यसभा सांसद हैं और उनका ये कार्यकाल 2028 तक है. केसीवी अलप्पुझा से जीतते हैं तो, उनकी राज्यसभा सीट बीजेपी के पास जाएगी.

अगर कांग्रेस 2024 के लोकसभा चुनाव में 55 से अधिक संसदीय सीट जीती तो केसीवी लोकसभा में विपक्ष के नेता के तौर पर खुद को स्थापित करेंगे. दूसरे शब्दों में कहें तो केसीवी को ऐसा लगता है कि उनके गुरु राहुल गांधी वायनाड सीट से चुनाव जीतने के बाद खुद विपक्ष के नेता की भूमिका में नहीं रहेंगे और शशि थरूर, भूपेश बघेल या मनीष तिवारी से आगे बढ़कर अधीर रंजन चौधरी जैसे शख्स को चुनेंगे.

विपक्ष के नेता पद के लिए ये कथित शोरगुल कांग्रेस के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है. दरअसल इससे पार्टी नेताओं के उस निचले स्तर का पता चलता है, जो नेताओं ने खुद के लिए बनाए हैं. उदाहरण के लिए एआईसीसी के महासचिव के लिए हार की मानसिकता रखना और आम चुनाव में पार्टी के हारने के बाद ईनाम की उम्मीद रखना परेशान करना वाला है. नॉन एप्लिकेश ऑफ माइंड एक ऐसा शब्द है, जिसका इस्तेमाल एआईसीसी के महासचिव और विचारक स्वर्गीय देवेन्द्रनाथ द्विवेदी द्वारा अक्सर इस्तेमाल किया जाता था. एआईसीसी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी को लेकर ये टर्म अक्सर सामने आती है, जो नेताओं की तरह व्यवहार करने के बजाए बेउम्मीद और मूक दर्शक दिखाई देते हैं.

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इसे लेकर भी बड़ा सवाल है कि क्या प्रियंका गांधी वाड्रा चुनावी मैदान में उतरेंगी और रायबरेली या वाराणसी से चुनाव लड़ेंगी. बड़ी तादाद में पार्टी के नेता चाहते हैं कि प्रियंका चुनाव लड़ें और जीते ना कि हार के साथ अपना चुनावी आगाज करें. अगर प्रियंका चुनाव नहीं लड़ती हैं तो पार्टी कार्यकर्ता 2024 चुनाव को लेकर नेतृत्व के हार मानने के एक और संकेत के तौर पर देख रहा है. 

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