महाराष्ट्र और झारखंड में महिलाओं को हर महीने खाते में पहुंचने वाले रुपये ने कमाल कर दिया है. महाराष्ट्र में महायुति सरकार की वापसी और झारखंड में हेमंत सोरेन सरकार की वापसी के पीछे महिलाओं को हर महीने मिलने वाले रुपये का ही योगदान माना जा रहा है. इसके बाद से हर राजनीतिक दल को जीत का शॉर्ट कट मिल गया है. दिल्ली मे आम आदमी पार्टी सरकार ने महिला वोटरों को लुभाने के लिए बड़ा फैसला लिया है. दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने 18 साल और उससे ज्यादा उम्र की महिलाओं को प्रतिमाह 1000 रुपये मुख्यमंत्री महिला सम्मान निधि के रूप में देने का ऐलान किया था. गुरुवार को आज दिल्ली कैबिनेट ने उसे मंजूरी दे दी है. अब इस प्रस्ताव को उपराज्यपाल के पास अंतिम मंजूरी के लिए भेजा जाएगा. केजरीवाल ने यह भी कहा है कि दिल्ली में सरकार बनने पर यह रकम बढ़ाई भी जा सकती है. इसके पहले 2020 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले केजरीवाल ने 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली का ऐलान, दिल्ली की डीटीसी बसों में महिलाओं की मुफ्त बस में सफर के ऐलान ने कमाल किया था. अब देखना है कि क्या इस बार महिलाओं के लिए मुख्यमंत्री महिला सम्मान निधि के ऐलान का फैसला क्या रंग दिखाता है.
1-पंजाब में हुई देरी पर सवाल उठेंगे तो दूसरी ओर बीजेपी भी रेवड़ियां बांटने का दावा करेगी
मुख्यमंत्री महिला सम्मान योजना को सबसे पहले मुख्यमंत्री आतिशी ने चालू वित्त वर्ष का बजट पेश करने के दौरान ऐलान किया था. 4 मार्च को विधानसभा में सरकार ने इस योजना के बारे में घोषणा किया था, जिस पर प्रतिक्रिया देते हुए अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि, यह दिल्ली की महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में बढ़ाया गया कदम है. अब महिलाओं को सालाना 12 हज़ार रुपए की सौगात मिलने के लिए रास्ता साफ हो गया है. सवाल यह उठता है कि क्या जानबूझकर महिला सम्मान योजना में देरी की गई. दिल्ली सरकार का आरोप रहा है कि बीजेपी एलजी के माध्यम से उनके कई विकास कार्यों की राह में रोड़ा अटकाती रही है. तो जनता कैसे यह मान लेगी कि नई सरकार बनने पर बीजेपी इसे लागू करने देगी? सवाल यह भी उठेगा कि पंजाब में इतनी देर क्यों हुई महिलाओं को 1000 रुपये हर माह देने में. यही नहीं दिल्ली विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी भी इस बार मुफ्त वाली रेवड़ियों की दुकान सजाएगी ही. अरविंद केजरीवाल को इस बार के विधानसभा चुनावों में रेवड़ियों बांटने में भी कई चुनौतियों का सामना करना होगा.
2-कांग्रेस का उभार केजरीवाल के लिए चिंता का विषय है
कांग्रेस को हल्के में समझने की भूल जो भी राजनीतिक दल करेगा उसे हर चुनाव में पछताना होगा. ये इंडिया गठबंधन के लिए ही नहीं एनडीए के लिए भी उतना ही सही है. लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को हल्के में लेना बीजेपी को भी काफी भारी पड़ चुका है. यूपी विधानसभा उपचुनावों में अखिलेश यादव को भी कांग्रेस को अलग थलग करना नुकसान कर गया. आम आदमी पार्टी के साथ भी यही होने वाला है. लोकसभा चुनावों के बाद कांग्रेस के दिन फिरे हैं . इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है. हरियाणा में भले ही पार्टी हार गई पर वोट का परसेंटेज बीजेपी के मुकाबले एक परसेंट से भी कम है.
अभी तक दिल्ली में केजरीवाल की राजनीतिक सफलता का श्रेय मुस्लिम और प्रवासी वोटों पर टिका रहा है. अगर उसका कुछ परसेंट भी कांग्रेस की ओर जाता है तो समझिए कि आम आदमी पार्टी के साथ खेला हो जाएगा. यही कारण है कि अरविंद केजरीवाल कांग्रेस से मुस्लिम नेताओं को तोड़ कर उम्मीदवार बना रहे हैं. लेकिन इसका साइड इफेक्ट भी हो रहा है. नाराज नेता कांग्रेस और ओवैसी की पार्टी की तरफ जा रहे हैं. इस बीच आम आदमी पार्टी के महरौली के विधायक नरेश यादव कुरान शरीफ की बेअदबी के केस में दोषी ठहराए गए हैं. उनको दो साल की सजा हुई लेकिन आम आदमी पार्टी ने अब तक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है. जाहिर है कि कांग्रेस इस बात को मुद्दा बनाएगी.
इसी तरह इस बार अरविंद केजरीवाल की चुनौतियों में दलित वोट भी शामिल है. कांग्रेस उनके दलित वोट बैंक पर डाका डालने को तैयार बैठी है. जबकि पार्टी के दो बड़े दलित चेहरे राजकुमार आनंद और राजेंद्र पाल गौतम पार्टी छोड़ कर जा चुके हैं.
3-एंटी इंकंबेंसी से लड़ना आसान नहीं
अभी तक आम आदमी पार्टी ने जो टिकट बांटें हैं उसे देखकर यही लगता है कि पार्टी एंटी इंकंबेंसी से परेशान है. अब तक अधिकतम ऐसे लोगों को टिकट दिए गए हैं जिन्होंने अभी हाल ही में पार्टी में एंट्री ली है. मनीष सिसौदिया जैसा पार्टी का नंबर 2 चेहरा अपनी सीट पटपड़गंज छोड़कर सेफ सीट जंगपुरा की राह पकड़ ली है. मतलब साफ है कि पार्टी को इस बार अपने विधायकों पर भरोसा नहीं है. ये तब ही होता है जब सरकार के पास कुछ गिनाने के लिए नहीं होता है. पार्टी एंटी इंकंबेंसी के चलते ही कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ना चाहती है. कारण यही है कि सरकार से नाराज लोगों के सामने विकल्प के रूप में केवल बीजेपी न हो. अगर कांग्रेस के उम्मीदवार रहेंगे तो जाहिर है कि सरकार से नाराज वोटर्स सामने दो विकल्प होंगे.
4-शीशमहल और भ्रष्टाचार में जेल जाने से केजरीवाल के आदर्शवाद का भ्रम टूटा
दिल्ली ही नहीं देश का एक बहुत बड़ा तबका ऐसा रहा है जो अरविंद केजरीवाल को राजनीति में आदर्शवाद लाने वाला समझता रहा है. जाहिर है कि यह इमेज भ्रष्टाचार और मुख्यमंत्री आवास जिसे मीडिया ने शीशमहल का नाम दिया हुआ के चलते डेंट हुई है. केजरीवाल की पार्टी की सांसद और कभी उनकी बहुत खास रहीं स्वाति मालीवाल ने भी पार्टी के खिलाफ जबरदस्त अभियान चलाया हुआ है. वो हर रोज जनता के बीच में जाकर पार्टी का पर्दाफाश कर रही हैं.