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'हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा...' ये शब्द देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविता के अंश हैं. बार बार गिरकर हार न मानना और अपनी मंज़िल तक पहुंच जाने का जज़्बा, उनकी कही ये पंक्तियां आज भी लोगों को हिम्मत देती हैं. देश के लिए राजनीति जैसे दलदल में उतरना और उस दलदल को पार कर, उसकी आग को झेलकर, कमल की तरह खिल जाना... 'मैं अटल हूं' ने ये बखूबी दिखाया है.
लव लेटर वाला प्यारा सा 'प्रेम'
फिल्म की कहानी कविताओं के उस गांव से शुरू होती है, जहां सबके अटल तब अटला हुआ करते थे. अपनी कहानियों से वो स्नेह और सद्भाव की वर्षा कर देते थे. उनकी कविताओं की ताकत देखकर ही लोगों को उनके भाषण भी पसंद आने लगे.
इन्हीं सबसे गुज़रते हुए, वो कई बार तपे और फिर सोना बनकर देश को चमका दिया, एक उच्च शिखर तक पहुंचा दिया और न्यूक्लियर पावर बना दिया. फिल्म 'मैं अटल हूं' में पूर्व पीएम के जीवन के संघर्षों के साथ ही उस कोमल पल की झलक भी दिखी, जिसे लोग 'प्रेम' कहते हैं.
ये वो प्रेम है, जो आज वाले प्रेम से कई गुना खूबसूरत हुआ करता था. जब इशारों के लिए आंखें काफी थीं और दिल की बातों के लिए लव लेटर लिखे जाते थे.फिल्म में पूर्व पीएम अटल और राजकुमारी कौल के प्यार के किस्से को दर्शाया गया है.
इस किस्से की शुरुआत 1940 के मध्य में हुई थी. उस दौरान लड़के-लड़कियों की कभी कभार ही बातचीत होती थी.तब ग्वालियर के एक कॉलेज में राजकुमारी कौल को युवा अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण काफी प्रिय लगा. दोनों के बीच आंखों के इशारे को फिल्म में दर्शाया गया है.
अटल ने कौल के लिए एक किताब में लव लेटर रखा था. हालांकि उन्हें उसका जवाब कभी नहीं मिला. कहा जाता है कि कौल ने उसका जवाब दिया था, लेकिन वो जवाब और किताब कभी अटल तक नहीं पहुंचे.
कौल इसके बाद परिवार के साथ दिल्ली चली गईं. इधर अटल भी राजनीति में पूरी तरह मशगूल हो गए थे. उधर राजकुमारी कौल की शादी कॉलेज के प्रोफेसर रहे ब्रिज नारायण कौल से करा दी गई.
फिल्म में ही दिखाया गया है कि कैसे करीब डेढ़ दशक बाद राजकुमारी कौल अटल के सामने आती हैं, लेकिन तब वो किसी की मां और पत्नी थीं. वहीं अटल भी संसद के सदस्य बन गए थे.
हालांकि अटल इस परिवार के प्रिय बन गए. वो इनके साथ ही रहने लगे और राजकुमारी कौल के जीवन के आखिरी पलों में भी अटल उनके और उनके परिवार के साथ थे. बाद में उन्होंने कौल की बेटी को गोद ले लिया.
1980 के दशक में दिए एक इंटरव्यू में राजकुमारी कौल से जब उनके और अटल के बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि अटलजी और उन्होंने कभी उनके पति श्री कौल से माफी मांगने की ज़रूरत महसूस नहीं की.
उनका कहना था कि उनके साथ उनके पति का रिश्ता इतना मज़बूत था कि कभी ऐसी ज़रूरत ही नहीं पड़ी.2014 में कौल का हार्ट अटैक से निधन हो गया था. मगर उनका और अटल के प्यार का किस्सा एक खुली किताब है. इस किताब को दोनों ने कोई नाम नहीं दिया. न ही ये किस्सा कभी किसी से छिपाया.
राजनीति की आग से जूझकर सोने सा खरा बनना
'एक मां और उसके बेटे ने भारत मां और उनके बच्चों को जो प्रताड़ना दी है, जो पीड़ा दी है, उसका कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता...' ये वो लाइनें हैं, जो अटल बिहारी वाजपेयी का किरदार निभाने वाले एक्टर पंकज त्रिपाठी ने बारिश में भीगते हुए कहीं.
ये इमरजेंसी को लेकर दिया गया भाषण था. भारतीय इतिहास का वो काला दौर जब लोगों की जबरन नसबंदी कराई गई, विपक्षी पार्टियों के नेताओं को जेल में डाल दिया गया था. फिल्म में इमरजेंसी के उस काले काल को ऐसे दिखाया गया, मानो हम खुद वहां मौजूद हों.
फिल्म में अयोध्या जा रहे कार सेवकों पर हुई गोलीबारी का सीन सबसे भयानक था. इसके अलावा महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस के दफ्तर में आग लगाए जाने का सीन भी दमदार रहा.
वहीं एक सीन वो भी रहा, जिसे देखने के बाद हर किसी को भारतीय होने पर गर्व महसूस होने लगा. इसमें पंकज सबको मिठाई देते हैं. सब पूछते हैं कि क्या हुआ है. इस पर पंकज कहते हैं, 'ऐसा है, नेशनल सिक्योरिटी की वजह से ये बात गुप्त रखी गई.
पोखरण में परीक्षण सफल हुआ है. भारत अब न्यूक्लियर पावर बन चुका है.'पंकज त्रिपाठी ने अटल बिहारी वाजपेयी के किरदार को मानो जीवंत कर दिया. फिल्म के शुरुआत में वो मां-बाप के प्यारे अटला हुआ करते थे.
इसके बाद उनके कॉलेज के जीवन, आरएसएस से जुड़ाव, राजनीति में प्रवेश और उत्थान, विदेश मंत्रित्व काल और फिर देश के प्रधानमंत्री के रूप में उनके योगदान को दिखाया गया है, जिनमें पोखरण टेस्ट, लाहौर बस यात्रा, कारगिल विजय जैसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम शामिल हैं.
इसके साथ ही फिल्म में जवाहरलाल नेहरू के निधन, इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री बनना, इमरजेंसी और ऑपरेशन ब्लू स्टार का दौर भी दिखाया गया. फिल्म में कांग्रेस पार्टी की कमियां दिखाने से भी परहेज़ नहीं किया गया है.
चीन से हुए 1962 के युद्ध के बाद अटल का किरदार निभा रहे पंकज त्रिपाठी कहते हैं, 'पूरा देश इस सरकार से अपना भरोसा हार गया. और प्रधानमंत्री जी विदेश नीति से हार गए.' इस सीन में एक तरफ पंकज को भाषण देते हुए दिखाया गया है.
वहीं एक डार्क सीन में नेहरू के किरदार को अपना गुलाब का फूल टेबल पर रखते हुए दिखाया गया. फिल्म के फर्स्ट हाफ को देखकर लगा मानो हमारे सामने इतिहास के पन्ने पलटे जा रहे हों.
इसी बीच फिल्म में अटल और उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी (पीयूष मिश्रा) के बीच के दोस्ताना रिश्ते को भी बखूबी दिखाया गया. दोनों कैसे साथ में वकालत की पढ़ाई करते हैं. और कैसे अटल के पिता उन्हें खुद पर गर्व करने का अवसर देने के लिए हर बंधन से आज़ाद कर देते हैं.
'न धन है न दौलत है, मेरे पास सिर्फ और सिर्फ...'
फिल्म के एक सीन में जब वो वोट मांगने जाते हैं, तो कहते हैं, 'निराशा, दुख, दर्द ये सब आपसे छीनने आया हूं, न मेरे पास बाप दादा की दौलत है, न कुबेर का खज़ाना, मेरे पास यदि कुछ है, तो सिर्फ और सिर्फ भारत माता का आशीर्वाद...'
फिल्म में उनके कहे डायलॉग और जीवन के अलग अलग किस्सों को देख कई बार आंखें नम हो जाएंगी. मगर फिल्म की कहानी का अंत भारत के 1999 में पाकिस्तान से कारगिल युद्ध जीतने पर हुआ.
लगा कि कहानी अभी और बची है, अभी और देखना है... मगर अंत यहीं हो गया, मानो कुछ अधूरा सा देखा. खैर... अटल बिहारी वाजपेयी एक ऐसी शख्सियत थे, और उनका जीवन इतने किस्सों से भरा हुआ है कि इन्हें एक 2 घंटे की फिल्म में दिखा पाना मुमकिन नहीं.
वो देश के ऐसे प्रधानमंत्री रहे हैं, जो सबसे प्रिय माने जाते हैं. अपनी राजनीतिक विचारधारा से लेकर नैतिक मूल्यों, संवेदनशीलता, ओजस्वी व्यक्तित्व, और धारदार वाचन शैली, उनके प्रशंसकों के साथ साथ उनके विरोधियों का भी दिल जीत लेती थीं.
उनका 93 साल का लंबा जीवन एक बायोपिक के तौर पर पर्दे पर उतारना बेहद मुश्किल काम था. हालांकि नेशनल अवॉर्ड विनिंग डायरेक्टर रवि जाधव ने अपनी नई फिल्म 'मैं अटल हूं' के रूप में इस चुनौती को स्वीकार किया.
फिल्म देश के प्रिय प्रधानमंत्री के जीवन की उपलब्धियों के कई किस्से समेटने में काफी हद तक सफल रही, लेकिन फिर भी पूर्ण रूप से न समेट सकी.