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ममता बनर्जी का राहुल गांधी के लिए सीधा पैगाम- अब बंगाल होगा कांग्रेस मुक्त!

ममता बनर्जी ने बहरामपुर सीट पर युसूफ पठान को उतारकर सिर्फ अधीर रंजन चौधरी की राजनीति ठिकाने लगाने का इंतजाम ही नहीं किया है, बल्कि कांग्रेस मुक्त पश्चिम बंगाल बनाने का इरादा भी साफ कर दिया है. इतना ही नहीं, यह भी बता दिया है कि बीजेपी से मुकाबले के लिए टीएमसी को किसी की मदद की जरूरत नहीं है.

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राहुल गांधी के बहाने ममता बनर्जी सबको ये बताने की कोशिश कर रही हैं कि कोई भी उनको हल्के में न ले
राहुल गांधी के बहाने ममता बनर्जी सबको ये बताने की कोशिश कर रही हैं कि कोई भी उनको हल्के में न ले

ये सिर्फ राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ही थे, जो मीडिया के जरिये ममता बनर्जी के साथ होने का दावा करते रहे, तृणमूल कांग्रेस नेता ने तो बहुत पहले ही अपना इरादा जता दिया था - अब कोई जानबूझ कर समझने की कोशिश न करे, तो बात ही और है. 

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INDIA ब्लॉक को लेकर उनके मन में क्या चल रहा था, वो तो अरविंद केजरीवाल से मुलाकात में ही फाइलन कर लिया था, और कांग्रेस नेतृत्व को जो सलाह दी उसमें भी साफ साफ संदेश था. मीटिंग में ममता बनर्जी की सलाह थी कि मल्लिकार्जुन खरगे को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया जाये, और प्रियंका गांधी को वाराणसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ाया जाये. वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव मैदान में होते हैं, ममता बनर्जी की सलाह तभी आई थी जब बीजेपी की उम्मीदवारों की सूची नहीं आई थी. 

जब राहुल गांधी भारत जोड़ो न्याय यात्रा के साथ पश्चिम बंगाल में दाखिल होने वाले थे, पहले ही ममता बनर्जी की तरफ से साफ कर दिया गया कि वो अकेले चुनाव लड़ने जा रही हैं - और इसकी एक बड़ी वजह तो बंगाल कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी हैं, लेकिन वो कोई अकेला कारण नहीं हैं. 

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ममता बनर्जी के दिल्ली और गोवा दौरों में राहुल गांधी ने ममता बनर्जी के साथ जो व्यवहार किया था, वो तो उनको बुरा लगा ही था, कांग्रेस नेता के क्षेत्रीय दलों की आइडियोलॉजी को लेकर स्टैंड की भूमिका तो पहले से धधकती आग में घी डालने वाली ही लगती है. 

ममता ने राहुल से वैसा ही व्‍यवहार किया, जैसे वो TMC और बाकी क्षेत्रीय दलों से करते हैं

2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तो कांग्रेस का पत्ता साफ हो ही गया था, लोकसभा चुनाव 2014 में भी ममता बनर्जी बिलकुल वैसा ही नतीजा चाहती हैं - और बंगाल PCC अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी के खिलाफ क्रिकेटर युसूफ पठान को चुनाव मैदान में उतारना इस बात का सबूत है. 

कांग्रेस को लेकर ममता बनर्जी के मन में गुस्सा तो पहले से ही था, लेकिन बीजेपी को चुनावों में शिकस्त देने के बाद जब ममता बनर्जी पहली बार दिल्ली पहुंचीं तो उनको कांग्रेस नेतृत्व से वैसे व्यवहार की कोई उम्मीद नहीं थी. तब ममता बनर्जी के आने के साथ ही राहुल गांधी विपक्षी दलों के नेताओं के साथ लगातार मीटिंग करने लगे थे - और कांग्रेस ने ऐसा जाल बिछाया कि शरद पवार ने भी मिलने का टाइम नहीं दिया. 

और बाद में भी राहुल गांधी लगातार क्षेत्रीय दलों में आइडियोलॉजी का अभाव बताकर अक्सर जलील करते रहे. राहुल गांधी की न्याय यात्रा को लेकर चिढ़ तो INDIA ब्लॉक के बैनेर तले इकट्ठा होने वाले सभी दलों को हुई थी, लेकिन पहली बार कांग्रेस नेता को पश्चिम बंगाल में ही ठीक से महसूस हुआ होगा. 

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देखा जाये तो राहुल गांधी के क्षेत्रीय दलों की आइडियोलॉजी पर हमले का जवाब है, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का अकेले लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला. ऐसा भी नहीं था कि शुरू से ही लोकसभा चुनाव को लेकर ममता बनर्जी का ये रवैया रहा. टीएमसी की तरफ से साफ तौर पर बताया जा चुका था कि कांग्रेस 2019 की अपनी जीती हुई सीटों पर लड़ना चाहे तो चलेगा. लेकिन कांग्रेस आधा दर्जन से कम सीटों पर राजी नहीं हो रही थी, और अधीर रंजन चौधरी तो अलग ही ललकार रहे थे.

पश्चिम बंगाल की बहरामपुर सीट अधीर रंजन चौधरी का गढ़ मानी जाती है, लेकिन उनके खिलाफ क्रिकेटर युसूफ पठान को उतार कर ममता बनर्जी ने जता दिया है कि वो कांग्रेस उम्मीदवार को संसद नहीं पहुंचने देना चाहतीं. वैसे कांग्रेस ने अभी वहां से अपना उम्मीदवार घोषित नहीं किया है. 

अधीर रंजन चौधरी ने युसूफ पठान की उम्मीदवारी पर बाहरी का मुद्दा उठाया है. ममता बनर्जी बीजेपी के खिलाफ ऐसी बातें करती रहती हैं. और अक्सर इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी नेता अमित शाह का नाम भी लेती रहती हैं - और खास बात ये है कि युसूफ पठान भी मोदी-शाह के गुजरात से ही आते हैं. 

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अधीर रंजन चौधरी कहते हैं, अगर टीएमसी युसूफ पठान को सम्मानित करना चाहती थी तो उनको राज्यसभा भेजती... बाहर के लोगों को राज्यसभा का सांसद बनाया गया... अगर ममता बनर्जी की युसूफ पठान के बारे में अच्छी सोच होती तो INDIA ब्लॉक में गुजरात से एक सीट की मांग लेतीं.

राष्ट्रीय टीम में दो बार विश्व कप विजेता टीम के सदस्य रहे युसूफ पठान आईपीएल में कोलकाता नाइटराइडर्स को भी दो बार चैंपियन बना चुके हैं - और बाहरी बताये जाने पर खुद को भारी बंगाली बता रहे हैं. युसूफ पठान परिवार में अभी तक कोई राजनीति में नहीं है, ये पहला मौका जब वो क्रिकेट से राजनीति में कदम रखने जा रहे हैं.

ये मुस्लिम वोट की भी लड़ाई है

2021 के बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद जेपी नड्डा ने माना था कि मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण टीएमसी के पक्ष में हो गया, और बीजेपी को हार का मुंह देखना पड़ा था - कांग्रेस को साथ लेकर ममता बनर्जी मुस्लिम वोटों का बंटवारा रोकने की भी कोशिश कर रही हैं.

बहरामपुर सीट पर आधे से ज्यादा मुस्लिम आबादी है, जाहिर हार-जीत में मुस्लिम वोटर की निर्णायक भूमिका रहती है. लोकसभा क्षेत्र में आने वाली 7 विधानसभा सीटों में से 6 पर टीएमसी का कब्जा है, जबकि एक सीट पर बीजेपी का विधायक है. अधीर रंजन चौधरी 1999 से लगातार चुनाव जीतते आ रहे हैं, लेकिन ममता बनर्जी के मुस्लिम कार्ड ने इस बार 'खेला' करने का पूरा इंतजाम कर लिया है. 

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अधीर रंजन चौधरी ऐसे नेता हैं, जो लेफ्ट नेताओं से भी ज्यादा ममता बनर्जी को परेशान करते रहे हैं, खासकर 2011 में ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद से. अब वो ममता बनर्जी पर बीजेपी और मोदी से मिलीभगत का इल्जाम भी लगा रहे हैं. 

अधीर रंजन चौधरी कह रहे हैं, ममता बनर्जी को डर है कि INDIA ब्लॉक में शामिल होने पर मोदी जी से चुनौती मिलेगी... क्योंकि मोदी जी ईडी सीबीआई को घर घर भेज देंगे.

अकेले दम पर बीजेपी से लड़ लेने का संदेश 

सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, बल्कि ममता बनर्जी प्रधानमंत्री पद के बाकी दावेदारों को भी अपनी तरफ से सख्त मैसेज देना चाहती हैं, ऐसा लगता है - और अब तो चुनावों से पहले आसनसोल से टीएमसी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने भी ममता बनर्जी को पीएम मैटीरियल बता दिया है.

नीतीश कुमार के बीजेपी के साथ चले जाने के बाद से तो प्रधानमंत्री पद के दावेदार अकेले अरविंद केजरीवाल ही मैदान में बचे लगते हैं, अगर समाजवादी पार्टी ने अखिलेश यादव को लेकर अगर कोई ऐसा इरादा नहीं पाल रखा है तो. कांग्रेस के साथ अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव दोनों ने ही चुनावी गठबंधन किया है. INDIA ब्लॉक से इतर देखें तो ममता बनर्जी की तरफ से बताया गया है कि उत्तर प्रदेश में एक सीट के लिए अखिलेश यादव से बातचीत चल रही है. 

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पश्चिम बंगाल की 42 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार उतारकर ममता बनर्जी ने सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, बल्कि पूरे विपक्षी खेमे को ये सख्त मैसेज भी देने की कोशिश की है कि बीजेपी से लड़ने के लिए उनको किसी और की मदद की बिलकुल भी जरूरत नहीं है - मतलब, ममता बनर्जी अपने तरीके से राहुल गांधी ही नहीं, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल से भी खुद को ज्यादा सक्षम बताने की कोशिश कर रही हैं.

तृणमूल कांग्रेस की रैली में ममता बनर्जी के भाषण में भी ये बातें सुनने को मिलीं, बंगाल में लड़ाई बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच होगी... हम कांग्रेस और सीपीएम का विरोध जारी रखेंगे. 

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