एन. बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद मुख्यमंत्री के नाम पर सहमति न बन पाने के कारण मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया है. लेकिन, ये अस्थाई व्यवस्था है. जैसे सब कुछ चल रहा था, वैसे ही चीजें चलती रहेंगी. कोई खास बदलाव नहीं होने वाला है. कोई सुधार भी हो सकेगा, ऐसी कोई उम्मीद भी नहीं लगती.
जमीनी हालात में बहुत सुधार तो जम्मू कश्मीर में भी नहीं हुए हैं, लेकिन वहां के लोगों को ये तो भरोसा है कि कम से कम उनकी आवाज सुनने वाला कोई तो है. कोई तो है जो उनकी आवाज उठा सकता है, और उनकी आवाज को सही जगह पहुंचा सकता है.
जम्मू-कश्मीर में चुनी हुई सरकार के कामकाज संभाल लेने के बाद व्यवस्थागत बदलाव तो आया ही है. लेकिन, अगर दलील ये होती है कि मणिपुर में तो चुनी हुई सरकार थी ही, फिर ऐसे हालात क्यों हो गये?
आखिर मई, 2023 से शुरू हुआ विवाद अभी तक क्यों नहीं सुलझाया जा सका?
ऐसे सवालों के जवाब में भी मणिपुर संकट का हल छुपा है. और वो राष्ट्रपति शासन से आगे बढ़कर ही खोजना होगा.
राष्ट्रपति शासन पिछली सरकार से तो बेहतर है
बीरेन सिंह के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष तो 10 फरवरी को लाने वाला था, लेकिन मणिपुर की जनता का विश्वास तो वो पहले ही खो चुके थे. केंद्र में बीजेपी की सरकार होने, और संकट समाधान का कोई आइडिया न होने के कारण बीरेन सिंह कुर्सी पर डटे रहे - लेकिन, कब तक? इस्तीफा देना ही पड़ा.
अव्वल तो मणिपुर में बीजेपी को अपने बूते ही बहुमत हासिल था, ऊपर से 11 अन्य विधायकों का समर्थन भी हासिल था. फिर भी बीजेपी को इस बात का भरोसा नहीं रह गया था कि बीजेपी के विधायक बीरेन सिंह के साथ बने रहेंगे. बीजेपी को डर हो गया था कि बीजेपी के विधायक भी अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में जा सकते हैं.
संभावित फ्लोर टेस्ट से पहले ही बीरेन सिंह ने इस्तीफा दिया और राज्यपाल अजय भल्ला ने विधानसभा को स्थगित कर दिया. फिर स्थिति को संभालने के मकसद से बीजेपी के नॉर्थ ईस्ट प्रभारी संबित पात्रा इंफाल पहुंचे. वहां रुके और कोई रास्ता निकालने की कोशिश की, लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए स्पीकर थोकचोम सत्यब्रत सिंह सहित किसी भी नाम पर सहमति नहीं बन सकी - और आखिरकार केंद्र को राष्ट्रपति शासन लागू करने को मजबूर होना पड़ा.
2022 में एन.बीरेन सिंह ने मणिपुर में सत्ता में वापसी की थी, और अभी तीन साल का विधानसभा का कार्यकाल बचा हुआ है. विधानसभा को अभी भंग नहीं किया गया है, लेकिन अब शासन की कमान मणिपुर के राज्यपाल अजय भल्ला को सौंप दी गई है.
नॉर्थ ईस्ट की समझ को लेकर ही आईएएस अफसर रहे अजय भल्ला को मणिपुर का राज्यपाल बनाया गया था. ऐसे भी समझा जा सकता है कि बीरेन सिंह पर मोदी-शाह का भरोसा भी कम होने लगा था, और इसीलिए अमित शाह के करीबी और भरोसेमंद अफसर को राज्यपाल बनाकर भेजा गया - और अब तो ये बातें सही लग रही हैं.
कुल मिलाकर ये समझने में कोई बुराई भी नहीं है कि बीरेन सिंह के मुख्यमंत्री रहते जो व्यवस्था थी, अजय भल्ला के हाथ में कमान होना उससे कहीं ज्यादा बेहतर है.
मणिपुर संकट का राजनीतिक हल खोजना होगा
मणिपुर में कुल जमा तीन पक्ष हैं - मैतेई, कुकी और नगा. कुकी समुदाय को लगता था कि बीरेन सिंह उनके साथ न्याय नहीं कर रहे हैं. और, यहां तक माना जाने लगा था कि वो मैतेई समुदाय को न सिर्फ हिंसा के लिए छूट दे रहे थे, बल्कि उनको बचा भी रहे थे.
एक ऑडियो क्लिप के जरिये दावा किया गया कि हिंसा भड़काने में बीरेन सिंह भी शामिल थे. इसी आरोप के साथ कुकी ऑर्गेनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स ट्रस्ट की तरफ से अदालत में याचिका दाखिल की गई है. सुप्रीम कोर्ट ने 3 फरवरी को मणिपुर हिंसा के सिलसिले में एक ऑडियो क्लिप की जांच रिपोर्ट तलब की है. सुप्रीम कोर्ट ने CFSL से सीलबंद लिफाफे में 6 हफ्ते में रिपोर्ट मांगी है.
बेशक मणिपुर में फिलहाल कानून-व्यवस्था ही सबसे बड़ी चुनौती है, लेकिन समस्या उससे भी कहीं ज्यादा गंभीर है - क्योंकि वहां कुकी और मैतेयी लोग एक दूसरे को फूटी आंख देखना नहीं चाहते.
ऐसे गंभीर हालात में राष्ट्रपति शासन की भूमिका टाइमपास से ज्यादा नहीं लगती. जब तक मणिपुर के दोनो, बल्कि तीनो ही, समुदायों के क्षेत्रीय प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करके समस्या का कोई ठोस हल नहीं निकाला जाता, किसी भी पहल या प्रयास का कोई भी फायदा नहीं होने वाला है.