मणिपुर हिंसा को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच एक बार फिर आरोप-प्रत्यारोप का माहौल गरम है. दरअसल मणिपुर के मुख्यमंत्री बिरेन सिंह ने मंगलवार को खेद व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य में जो कुछ हुआ, उसके लिए मैं खेद व्यक्त करना चाहता हूं. कई लोगों ने अपने प्रियजनों को खो दिया और कई लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा. बिरेन सिंह ने बहुत शालीनता और सहृदयता के साथ अपनी बात रखी और दिल का उद्गगार व्यक्त किया. उनकी इस पहल को शांति स्थापना के लिए एक पवित्र भावना की तरह लेना चाहिए. पर कांग्रेस की ओर से जिस तरह की प्रतिक्रिया आई उससे तो यही लगता है कि शायद उसे शांति स्थापित करने में रुचि ही नहीं है.
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक्स पर एक पोस्ट के माध्यम से सिंह की माफ़ी का जवाब देते हुए कहा, प्रधानमंत्री मणिपुर क्यों नहीं जा सकते और वहां भी यही बात क्यों नहीं कह सकते? उन्होंने जानबूझकर 4 मई, 2023 से राज्य का दौरा करने से परहेज किया है, जबकि वे देश और दुनिया भर में यात्रा कर रहे हैं. मणिपुर के लोग इस उपेक्षा को बिल्कुल समझ रहे हैं. जयराम रमेश के इस हमले के बाद बिरेन सिंह भी कहां चुप रहने वाले थे. वे भी कांग्रेस पर हमलावर हो गए. उन्होंने कहा कि राज्य में चल रही अशांति के लिए कांग्रेस के पिछले पाप जिम्मेदार हैं.उन्होंने बर्मीज शरणार्थियों को बार-बार बसाने जैसे कारणों को हिंसा का आधार बताया. सवाल यह है कि इतने गंभीर मसले पर कांग्रेस नेता क्यों इस तरह की बचपना कर रहे हैं.
1-बिरेन सिंह ने माफी मांग ली तो अब नरेंद्र मोदी से माफी की मांग क्यों?
मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने राज्य के लोगों से माफी मांगते हुए कहा कि यह पूरा साल बहुत दुर्भाग्यपूर्ण रहा. 3 मई 2023 से लेकर आज तक जो कुछ हो रहा है उसके लिए मुझे पछतावा हो रहा है. मैं माफी मांगता हूं. लेकिन अब, मुझे उम्मीद है कि पिछले तीन से चार महीनों में शांति की दिशा में जो प्रगति हुई है, उसे देखते हुए मेरा मानना है कि 2025 में राज्य में सामान्य स्थिति बहाल हो जाएगी. सीएम की यह माफी महीनों बाद आई है. जाहिर है कि सवाल तो उठेंगे ही कि क्या मणिपुर की जनता उन्हें माफ कर पाएगी?
मणिपुर में 3 मई 2023 से बहुसंख्यक मैतेई और कुकी समुदाय के बीच आरक्षण और सरकारी योजनाओं के लाभ को लेकर हिंसक घटनाएं हुईं, जिनमें 200 से अधिक लोगों की मौत हो गई. हिंसा की वजह से हजारों परिवार पलायन कर गए. हालात को काबू में करने के लिए केंद्र सरकार को पहाड़ी और घाटी की सीमाओं सेना तैनात करनी पड़ी है. इसके बाद हिंसा की घटनाओं में कमी आई है. हालांकि वहां दोनों समुदायों के बीच तनाव अभी भी बरकरार है.
2-क्या मोदी के माफी मांगने से विवाद हल हो जाएगा
राज्य में दोनों समुदायों मैतेई और कुकी के बीच विवाद काफी पुराना है. जो अब नस्ली बन चुका है. इसलिए सरकार के हाथ में सख्ती के अलावा और कोई चारा नहीं रह गया है. मणिपुर के 10 प्रतिशत हिस्से पर मैतेई समुदाय का दबदबा है. यह समुदाय इम्फाल वैली में रहता है. बाकी 90 प्रतिशत पहाड़ी इलाके में अन्य जनजातियां हैं. मैतई समुदाय चाहता है कि उन्हें भी अन्य समुदायों की तरह जनजाति का दर्जा दिया जाए. उन्होंने हाईकोर्ट में गुहार लगाई थी. कुकी लोगों का दावा है कि जब 1949 में मणिपुर का भारत में विलय हआ तो उससे पहले मैतेई को जनजाति का दर्जा मिला हुआ था. जबकि स्थानीय लोगों का कहना है कि कुकी लोग संपन्न हैं और वो घाटी में भी फैलना चाहते हैं.
मणिपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कहा था कि उन्हें मैतेई समुदाय को जनजाति का दर्जा देने पर विचार करना चाहिए. सरकार ने इस मुद्दे पर कोई जवाब नहीं दिया.कहीं से अचानक ये खबर फैल गई कि हााईकोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है सरकार आदेश लागू नहीं कर रही है. फिर जो बवाल मचा आज तक शांत नहीं हो सका. जाहिर है कि नरेंद्र मोदी के माफी मांगने से या यहां का दौरा करने से कुछ नहीं होने वाला है. जिस दिन पीएम मोदी को यह लगेगा कि उनके जाने से मणिपुर शांत हो जाएगा वो जरूर जाएंगे. क्योंकि कौन सा नेता नहीं चाहेगा कि उसके एक कदम से किसी जटिल समस्या का हल निकल जाए. ये सचाई भी है कि जब लोग खून के प्यासे होते हैं तो उन्हें कोई अपना पराया नजर नहीं आता है. इसलिए पीएम अगर मणिपुर की यात्रा भी करते हैं तो यहां के लोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाले हैं.
3-कांग्रेस 91-92 के लिए माफी क्यों नहीं मांगती
जयराम रमेश के सवाल उठाने के बाद मणिपुर के सीएम बिरेन सिंह ने ताबड़तोड़ कई सवाल कांग्रेस से किए हैं. मुख्यमंत्री ने पूछा कि क्या पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव और आईके गुजराल सहित कांग्रेस नेताओं ने अपने कार्यकाल के दौरान मणिपुर में हुई हिंसा के लिए माफ़ी मांगने के लिए कभी मणिपुर का दौरा किया था. दरअसल इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि कांग्रेस इस मुद्दे को सुलझाने की बजाय इसका राजनीतिक इस्तेमाल करने की ज्याद इच्छुक लगती है.
बिरेन सिंह पहले भी चिदंबरम पर निशाना साधते रहे हैं. वो आरोप लगाते हैं कि मणिपुर संकट की जड़ें 2008 में चिदंबरम द्वारा ज़ोमी रिवोल्यूशनरी आर्मी के साथ किए गए सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन समझौते में निहित हैं. उन्होंने मणिपुर में हिंसा के लिए पी चिदंबरम की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया था. वर्तमान संकट का मूल कारण भी पी चिदंबरम ही हैं. जब वो तत्कालीन कांग्रेस सरकार में गृह मंत्री थे और ओकराम इबोबी सिंह (मणिपुर के) सीएम थे तो वो म्यांमार के जोमी रिवोल्यूशनरी आर्मी के अध्यक्ष थांगलियानपाउ गुइते को मणिपुर लेकर आए थे. यह संगठन म्यांमार में प्रतिबंधित है.
4- कुकी जो चाहते हैं उसे बीजेपी ही नहीं स्थानीय कांग्रेस इकाई भी नहीं चाहती है
कुछ दिनों पहले चिदंबरम ने ट्वीट करके मणिपुर के विभिन्न जातीय समुदायों के लिए राज्य के भीतर क्षेत्रीय स्वायत्तता की वकालत की थी. चिदंबरम ने लिखा था कि मणिपुर में 5000 अतिरिक्त केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल तैनात करना समस्या का समाधान नहीं है. उन्होंने लिखा था कि इसके बजाय, अधिक समझदारी की जरूरत है, यह स्वीकार करना चाहिए कि मुख्यमंत्री एन. बिरेन सिंह इस संकट की जड़ हैं और उन्हें तुरंत हटाया जाना चाहिए. जरूरत है कि मैतेई, कुकी-जो और नागा एक राज्य में तभी रह सकते हैं जब उन्हें वास्तविक क्षेत्रीय स्वायत्तता मिले. इसके साथ ही यह भी लिखा कि माननीय प्रधानमंत्री अपनी जिद छोड़ें, मणिपुर जाएं, वहां के लोगों से विनम्रता के साथ बात करें और उनके दुख-दर्द और आकांक्षाओं को समझें.
पर चिदंबरम के लिए यह ट्वीट उल्टा पड़ गया. मणिपुर के 10 कांग्रेस नेताओं, जिनमें वर्तमान विधायक, पूर्व मंत्री और पूर्व मणिपुर कांग्रेस अध्यक्ष शामिल हैं, ने खड़गे को पत्र लिखकर चिदंबरम की पोस्ट पर नाराजगी जाहिर की थी. कांग्रेस की स्थानीय इकाई ने लिखा कि यह पोस्ट मणिपुर के इस संवेदनशील समय में बिलकुल अनुचित भाषा और भावनाओं को व्यक्त करता है. कांग्रेस पार्टी हमेशा मणिपुर की एकता और क्षेत्रीय अखंडता के पक्ष में खड़ी रही है. हम एआईसीसी से अनुरोध करते हैं कि वे पी. चिदंबरम के खिलाफ तत्काल उचित कार्रवाई करें और उन्हें यह पोस्ट तुरंत हटाने का निर्देश दें. मणिपुर कांग्रेस प्रमुख के. मेघाचंद्र ने भी चिदंबरम की पोस्ट के नीचे टिप्पणी की थी कि कृपया इसे डिलीट करें. मणिपुर में स्थिति ठीक नहीं है और यह बहुत संवेदनशील मामला है. पूर्व मुख्यमंत्री ओक्राम इबोबी सिंह ने चिदंबरम के बयान से राज्य इकाई को अलग करते हुए कहा कि यह उनकी व्यक्तिगत राय है. खड़गे ने तुरंत चिदंबरम से बात की और उन्होंने यह पोस्ट डिलीट कराई थी. मतलब साफ है कि मणिपुर में कांग्रेस कार्यकर्ता भी मैतेई समूह के साथ हैं. क्योंकि मणिपुर में कोई नहीं चाहता कि कुकी समुदायों को क्षेत्रीय स्वायत्ता मिले. ऐसी दशा में दिल्ली में बैठक मणिपुर के हितों की बात करना कही से भी देश के लिए फायदेमंद नहीं है.