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मां-बहन की गालियां और ड्रम-सूटकेस की घटनाएं... क्या नवरात्र जैसे पर्वों से हम कुछ नहीं सीख रहे?

नवरात्र और इसके पहले दिन शैलपुत्री दिवस का यही अर्थ है कि समाज अपनी और हर किसी की पुत्री में एक देवी को देखे, उसका सम्मान करे. अगरी किसी से कोई निजी लड़ाई या मतभेद है, असंतोष है तो उस मामले में किसी की बेटी को न घसीट लाएं. नौ दिन तक व्रत रख कर मां की आराधना की जाती है. इसलिए इस नवरात्र में यह भी व्रत लिया जा सकता है कि आप बेटियों का सम्मान करें.

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नवरात्र की पूजा और उपासना के सही अर्थ को समझने की जरूरत है
नवरात्र की पूजा और उपासना के सही अर्थ को समझने की जरूरत है

नवरात्र का समय चल रहा है और ये नौ दिन मातृशक्ति की आराधना के लिए समर्पित हैं. नवरात्र का यह पर्व बताता है कि स्त्री, जिसके भीतर प्रकृति के कई स्वरूप समाहित हैं, या कहें कि प्रकृति का हर स्वरूप एक स्त्री का ही प्रतिबिंब है, वास्तव में उसे जननी, देवी और प्रथम शक्ति बनाता है. पुराण कथाओं में हर जगह यह दर्ज है कि जननी का स्थान सबसे ऊंचा है, और एक स्त्री, जो जननी होने के साथ-साथ संसार का आधार भी है, यहां तक कि ब्रह्मांड सहित सृष्टि का निर्माण और प्रलय दोनों उसके ही हाथों में हैं.

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नवरात्र का पर्व मनाने के पीछे एक अवधारणा यह भी है कि स्वभाव से दयालु, कोमल और ममता का रूप होने के बावजूद स्त्री और माता को कमजोर समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए. ऐसे समय में यह जरूरत तब और बढ़ जाती है, जब हमारे सामने समाज का सबसे विकृत रूप दिखाई दे रहा है. यह वह समय है, जब नीले ड्रम, फ्रिज और सूटकेस सुर्खियों में हैं. हिंसा और हिंसक ताकतों से भरे अपराध का ये सिलसिला अब लैंगिक भेद में नहीं बंटा रह गया है, बल्कि स्त्री हो या पुरुष जिस पर हिंसा का दानव हावी हो रहा है, वह ऐसे अपराधों को अंजाम दे रहा है.    

त्योहारों के सही अर्थ समझने की जरूरत

आज के इस माहौल में जब हमारा परिवेश बदल रहा है तो जरूरी हो गया है कि हम अपने पर्वों-त्योहारों को और अधिक गहराई से समझें और उनके रहस्य को पहचानें. नवरात्र केवल आराधना-पूजा का पर्व नहीं है, बल्कि पारिवारिक-सामाजिक ढांचे को समझने की परंपरागत प्रक्रिया है. देवी के नौ रूप इसी सामाजिक परंपरा को समझने का माध्यम हैं. उनका पहला स्वरूप शैलपुत्री का है, जो एक बेटी का रूप है.

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देवी शैलपुत्री यह बताने की कोशिश करती हैं कि समाज में पुत्रियों का का खास स्थान है. पुराणिक आख्यानों में दर्ज है कि नवरात्र का पहला दिन देवी शैलपुत्री को समर्पित है. शैल यानी पत्थर-पर्वत. देवी ने हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया था. इसलिए वह शैलपुत्री कहलाईं. इन्हीं का दूसरा नाम पार्वती है, जो कि महादेव की अर्धांगिनी बनीं. पर्वत पर रहने के कारण और हिमालय के घर जन्म लेने के कारण ही देवी को पार्वती कहा गया है. देवी पुत्री स्वरूपा हैं. यानी कि संसार की सभी पुत्रियों में देवी का वास है, लेकिन क्या वाकई समाज शैलपुत्री होने का अर्थ समझ पाया है?

देवी दुर्गा

देवी शैलपुत्री की पूजा और बेटी-बहन की गालियां क्यों

देवी शैलपुत्री की आराधना सिर्फ मंत्रों से होना ही काफी नहीं है, बल्कि शैलपुत्री के पूजन के असल अर्थ को समझना काफी है. दुखद है कि हमारा सहनशील समाज कई तरह की बुराइयों से भी ग्रसित है. आज के दौर में हमारी-आपकी वाणी जिस तरह से प्रदूषित हुई है उसकी कोई हद ही नहीं है. देवी को पुत्री के रूप में पूजने वाला समाज असल में पुत्रियों के लिए कितना घातक बन जाता है, यह इस समाज की सच्चाई रही है. आज कन्या भ्रूण हत्या जैसे मामलों में भले ही कमी आई है, लेकिन वाणी-बोली से हम अभी भी बेटियों को सम्मान नहीं दे पाए हैं. सामान्य बातचीत के दौरान, हंसी-मजाक के बीच भी आम आदमी बेटियों के लिए बेहद ही बुरी और गाली युक्त विशेषण प्रयोग कर देता है.

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राह चलते, यार-दोस्तों से मिलते, किसी के लिए गुस्सा जाहिर करते हुए, या ऐसी ही किसी नाराजगी वाली स्थिति में हम एक झटके में बेटियों को जोड़कर बनाई हुई गालियां प्रयोग कर जाते हैं. अब सोचिए, आपने नौ दिन का अनुष्ठान किया, देवी की पूजा पुत्री स्वरूप में की, उनकी आराधना की और अगले ही पल आपने किसी बेटी के लिए विकृत मानसिकता से भरे शब्दों का इस्तेमाल किया. ऐसे में देवी की पूजा का क्या अर्थ रहा.

नवरात्र और इसके पहले दिन शैलपुत्री दिवस का यही अर्थ है कि समाज अपनी और हर किसी की पुत्री में एक देवी को देखे, उसका सम्मान करे. अगर किसी से कोई निजी लड़ाई या मतभेद है, असंतोष है तो उस मामले में किसी की बेटी को न घसीट लाएं. नौ दिन तक व्रत रखकर मां की आराधना की जाती है. इसलिए इस नवरात्र में यह भी व्रत लिया जा सकता है कि आप बेटियों का सम्मान करें.

ठीक इसी तरह देवी का एक स्वरूप स्कंदमाता का है. इस रूप में देवी संसार की सभी माताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं, बल्कि ऐसा कह लीजिए की सभी माताएं देवी स्कंदमाता का ही एक रूप हैं. स्कंद भगवान कार्तिकेय का एक नाम है. इसलिए माता के पांचवें स्वरूप की पूजा स्कंदमाता के तौर पर की जाती है. यह स्वरूप संसार में वंशवृद्धि की इच्छा, नए संसार और समाज के सृजन और नए जीवन के संरक्षण का प्रतीक है. यह संरक्षण हमें माता ही दे सकती है, इसलिए ही वह पूजनीय है.

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देवी दुर्गा

क्यों महान होती है माता?

गरुण पुराण कहता है कि, माता इसलिए भी पूज्य है, क्योंकि वह जीवात्मा को नर्क से बाहर निकालती है. गरुण पुराण में जिस रौरव नाम के भयानक और वीभत्स नर्क का वर्णन किया गया है, वह गर्भ जैसा ही है. इसमें जीवात्मा को रक्त, मांस, कफ, मल आदि के बीच रहकर अपने पाप का फल भोगना होता है. मां उस आत्मा को नए जीवन के रूप में जन्म देकर संसार में लाती है और तब उस नर्क की आग से मुक्ति मिलती है. हर जीव को उसकी मां इसी नर्क से मुक्ति दिलाती है, इसलिए मां का दर्जा भगवान से ऊपर हो जाता है.

लेकिन, नवरात्र में मां के स्वरूप की पूजा के बावजूद हम अपनी पूजा वैसे ही व्यर्थ कर लेते हैं, जैसे बेटियों से जुड़ी गाली देकर शैलपुत्री देवी की पूजा का अर्थ निरर्थक कर लेते हैं. मां से जुड़ी गालियां भी हमारे समाज में बेहद आम हैं और राह चलते, सामान्य बातचीत में और किसी खराब स्थिति में यह हमारी पहली शाब्दिक प्रतिक्रिया का हिस्सा बन चुकी हैं. आश्चर्य है कि इसी समाज में 'यज्ञ नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता' (जहां नारी सम्मान, वहीं देवता निवास) का मंत्र सिखाया-बताया जाता है, बावजूद मां-बहन की गालियां इसी समाज का हिस्सा हैं और दुखद रूप से खतरनाक सच भी.

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अब चलते हैं समाज की दूसरी समस्या की ओर यह दूसरी समस्या असल में श्रेष्ठता और बराबरी की बहस से उपजी है. कभी-कभी यह उस स्तर पर पहुंच जाती है, जहां से इसका जिम्मेदार धर्म, पंथ और पौराणिक कथाओं को मान लिया जाता है. भारतीय समाज में पितृसत्ता के वर्चस्व के आरोप लगते रहे हैं और इसका आधार सनातन परंपराओं को बताया जाता रहा है. नवरात्र का पर्व ऐसे हर भ्रम को मिटाने का काम करता है. देवी की उपासना के ग्रंथ मार्कंडेय पुराण में श्रीदुर्गा सप्तशती में ऐसा जिक्र मिलता है कि संसार की आद्या शक्ति, यानी पहली शक्ति देवी दुर्गा ही हैं और यह शक्ति हर प्राणी की चेतना में है.

देवी दुर्गा

सभी देवताओं की सम्मिलित शक्ति हैं देवी दुर्गा

जब देवी दुर्गा को मानवीय रूप में प्रकट करना हुआ तो सभी देवताओं ने मिलकर अपनी चेतना शक्ति और बल का आह्वान किया और इससे जो शक्ति प्रकट हुई, वह एक स्त्री थी. इस कथा में कितनी असलियत है और कितना चमत्कार इस प्रश्न में न उलझते हुए यह देखें कि यह कथा स्त्री और पुरुष के बीच सामंजस्य का कितना सुंदर उदाहरण है. इसके अलावा उसी देवी को असुरों से युद्ध करने के लिए सभी देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र दिए. यह स्त्री-पुरुष के बीच सहायता और बराबरी की बात को दिखाता है.

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फिर सभी ने अपनी-अपनी शक्तियों से एक-एक स्त्री शक्ति को प्रकट किया. ब्रह्मा ने ब्राह्मी, विष्णु ने वैष्णवी, शिव ने शिवानी, इंद्र ने ऐंद्री, वरुण ने वारुणी, सूर्य ने सावर्णि और ऐसे ही अनेक देवताओं के स्त्री शक्ति वाली देवियों के नाम उदाहरण में मिलते हैं. इस तरह देवी दुर्गा की जो सेना तैयार हुई, वह देवताओं की सहायता से तैयार हुई. इसलिए सवाल इस बात का नहीं है कि कौन बड़ा कौन छोटा. बल्कि असल रहस्य यह है कि स्त्री और पुरुष दोनों ही मिलकर किसी समस्या और संकट का हल कैसे निकाल रहे हैं.

भारतीय समाज में पति-पत्नी के रिश्ते का आधार

यही एक बात, भारतीय समाज में स्वस्थ दांपत्य का आधार है. शिव-पार्वती, विष्णु-लक्ष्मी, इंद्र-शचि, राम-सीता, राधा-कृष्ण जैसी युगल छवियां इसी का उदाहरण हैं और इसीलिए इन्हें प्रेम का सबसे उच्च प्रतिमान कहा गया है. जहां अर्धनारीश्वर हो जाते हैं, लक्ष्मीनारायण, शचींद्र, सियाराम, और राधेकृष्ण जैसे शब्द युग्म मिलते हैं. जहां प्रेम में देवता भी अपना देवत्व भूल जाते हैं और प्रेम में ही समाहित हो जाते हैं.

बात जब प्रेम और दांपत्य की हो रही है तो भारतीय समाज में रिश्तों की टूटती डोर वाले मामले आश्चर्य में भी डालते हैं और परेशान भी करते हैं. जिस समाज में पति शिव है और पत्नी पार्वती, प्रेमी कृष्ण है और प्रेमिका राधा, वहां ये घटनाएं क्यों हो रही हैं? इसका हल कैसे निकले? ये सारे सवाल अनुत्तरित ही हैं. इनका ये जवाब भी नहीं दिया जा सकता है कि हम अपने सनातनी पर्वों के महत्व  को भूल रहे हैं.

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ये मामला अपराध करने से न लगने वाले डर का है, और साथ ही यह मामला अपने आत्म अहंकार के बढ़ जाने का है. जरूरी है कि हम सिर्फ खुद तक सीमित न रहे, खुद की ही इच्छाओं को ऊपर न रखें और अपनी सीमा को भी पहचानें. यह पहचान लेंगे तो प्रेम की भावना, सहयोग का भाव और एक-दूसरे पर विश्वास अपने आप पनपेगा. इसी विश्वास की कमी के कारण ड्रम, फ्रीज और सूटकेस जैसी घटनाएं होती हैं. यह समझने की जरूरत है कि न ही पुरुष बहुत बलवान है और न ही स्त्री अबला या कमजोर.

केवल दोनों की शारीरिक संरचनाएं अलग-अलग है, लेकिन दोनों में क्षमताएं एक जैसी है. यह क्षमता समाज में नवजागरण और नया परिवर्तन भी ला सकती है और ऐसे अपराध भी कर सकती है, जो प्रलय की स्थिति बना दे. जरूरत है तो इस क्षमता को पहचानने और इस शक्ति को सही जगह खपाने की. केवल यही नहीं हो पा रहा है, जिससे समाज की दिशा भटकी हुई है.

सिर्फ पूजा उपासना का पर्व नहीं है नवरात्र

नवरात्र का पर्व सिर्फ पूजा-उपासना तक सीमित नहीं है. यह सामाजिकता के शुद्धिकरण का भी पर्व है. प्रतीकों के सही अर्थ को समझने का मौका है. जरूरी है कि देवियों के अलग-अलग स्वरूपों की उपासना के साथ हम उनके नाम, कार्य और अर्थ के महत्व को समझने की कोशिश करें और इसी के उदाहरण से प्रेरणा लेते हुए अपने जीवन का कार्य-व्यवहार बदलें. सही मायनों में तभी हमारा यह सनातनी व्रत सफल भी हो सकेगा.

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