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'Everything is fair in love and war…'
इस क्लीशै सेइंग में यदि एक शब्द बदल दें यानी love and war की जगह Cricket कर दें तो भारतीय संदर्भ में अब ये सेइंग कुछ इस तरह की सियासी रंगत ले लेगी...
'Everything fair in cricket and cricket… '
क्रिकेटः रिलीजन और आइसब्रेकिंग का जरिया भी...
हमारे देश के बारे में एक बात कही जाती है कि यदि जनमानस समझना हो तो आपको क्रिकेट, बॉलीवुड और पॉलिटिक्स की बेसिक जानकारी होनी चाहिए. बस, ट्रेन, जहाज जहां कहीं भी दो अजनबी मिलेंगे उनकी आइसब्रेकिंग का जरिया इन तीन में से कोई एक विषय ही होगा. क्रिकेट यहां रिलीजन है. सचिन तेंडुलकर भगवान हैं. विराट कोहली इसके महाराजा हैं. इस देश में क्रिकेट पैसा-पावर-प्रसिद्धि की गारंटी है. और जहां पैसा-पावर-प्रसिद्धि की फुल गारंटी हो उस जगह से पॉलिटिशियन कैसे दूर रह सकते हैं भला?
तो हमारे देश में क्रिकेट की हैसियत ही ऐसी है. और इस हैसियत को पाने के लिए हर कोई पागल है. जोड़-तोड़ लगाता दिखाई देता है. जरा, ठहरिये... वैसे आपने शीर्षक तो पढ़ ही लिया होगा. तो अपनी कहानी का सिरा इसी मोड़ से पकड़ कर हम अपने विषय में जंप लगा लेते हैं. बात चल रही है कि पॉलिटिशियन क्यों नहीं इस फायदे के मैदान में कूदते दिखाई देंगे? तो इस बात को बढ़ाने से पहले आइए समझ लेते हैं कि आखिर क्रिकेट में हमारी हैसियत क्या है. किक्रेट की दुनिया में हम कैसे इसकी दशा-दिशा निर्धारित करने का रुतबा रखते हैं. इससे यह बात भी आसानी से समझ में आ जाएगी कि सियासतदानों में देश की क्रिकेट पर कब्जे की इतनी बैचेनी क्यों है...
यहां के हम सिकंदरः टीम इंडिया की क्रिकेटिंग पावर...
दुनिया में सबसे बड़ी क्रिकेट लीग आईपीएल है. 2023 से 2027 तक के IPL राइट्स 48,390 करोड़ रुपए में बिके थे. एक मैच के लिए BCCI को करीब 118 करोड़ रुपए मिलते हैं. दुनिया की सबसे बड़ी खेल लीग एनएफएल को एक मैच का 133 करोड़ रुपये मिलता है जबकि आईपीएल का एक मैच 118 करोड़ का होता है. यानी आईपीएल प्रति मैच के आधार पर दुनिया की दूसरे सबसे बड़ी लीग है. इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि बोर्ड के पास किस कदर पैसा है. दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआई है. साल 2022 में बीसीसीआई को 2367 करोड़ रुपये का सरप्लस मिला था, जो एक साल में ही 116 प्रतिशत बढ़ चुका है. IPL 2023 से कुल आय 11,769 करोड़ रुपये की कमाई हुई. यह पिछले साल की तुलना में 78 प्रतिशत की बढ़ोतरी है. क्रिकेट को संचालित करने वाली संस्था ICC को सबसे ज्यादा कमाई भारत में इवेंट से करती है. आईसीसी भारत में क्रिकेट से कितना कमाती है इसकी बानगी है. भारतीय बोर्ड को अगले चार साल आईसीसी से हर साल 230 मिलियन डॉलर मिलेंगे. यह उनके बजट का लगभग 38.4 प्रतिशत है. इंग्लैंड एवं वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ईसीबी) से छह गुना अधिक है, जिसे 6.89 प्रतिशत यानी 41 मिलियन डॉलर और क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया (सीए) को 37.53 मिलियन डॉलर (लगभग 6.25 प्रतिशत) मिलेंगे. इस हिसाब से इंग्लैंड कमाई के मामले में दूसरा और ऑस्ट्रेलिया तीसरे स्थान पर रहेगा. बीसीसीआई के पास अरबों के ब्रॉडकास्ट राइट्स हैं. भारत में कोई बड़ा क्रिकेट आयोजन होता है तो बीसीसीआई से लेकर आईसीसी तक की तिजोरियां लबालब हो जाती हैं. सबसे बड़े क्रिकेट स्टार हमारे पास हैं. रोनॉल्डो जैसे दुनिया के टॉप टेन खिलाड़ियों में विराट कोहली शुमार हैं. खिलाड़ियों के पास करोड़ों के कॉन्ट्रेक्ट हैं. इनकी समाज में हैसियत सुपर स्टार जैसी है. बॉलीवुड के बाद खिलाड़ियों की पॉपुलेरिटी आसमान छूती है. पैसा चारों ओर से बरसता है. ग्लैमर की चकाचौंध है. किसी खिलाड़ी के साथ चार बार दिख भर जाने से ही कोई आदमी खासा फेमस हो जाता है.
लेकिन कहां हो जाती है गुगली?
इसे मैनेज करने वाली संस्था के मैनेजमेंट में खिलाड़ियों का उतना दखल नहीं है. वे मैदान पर निर्णायक हैसियत में भले ही हों लेकिन उनके बारे में निर्णय का अधिकार किसी और को है. शुरुआत में बड़े बिजनेसमैन या इस खेल को चाहने वाले पावरफुल लोग इसे मैनेज करते थे. फिर इसमें पावर-पैसा-प्रसिद्धि को देखकर धीरे-धीरे पॉलिटिशियन की एंट्री होना शुरू हो गई. फिर बना एक गठजोड़. और पैदा हुआ एक सियासी मॉडल...
मी, माई फैमिली फिर माई डियर करीबी का मजबूत मॉडल...
कई दिग्गज पॉलिटिशन ने पहले इस फील्ड में डायरेक्ट एंट्री ली फिर परिवार से सदस्यों को उतारने का क्रम शुरू किया. मामला यहां ही नहीं रुका...अब तो लेटरर एंट्री के जरिये करीबियों को उतारा जा रहा है. यानी क्रिकेट में घनघोर परिवारवाद...लेटरल एंट्री के जरिये जबर्दस्त अवसरवाद... सबसे अमीर BCCI पर कब्जे की जंग में करीबियों या खास बंदों का जलवा जलाल... उद्देश्य सिर्फ एक है कि ऐन-केन प्रकारेण क्रिकेट पर कब्जा रहे. और पैसा-पावर के गेम पूरा दखल रहे. भले ही योग्यता के नाम पर किसी ने बल्ला तक ना उठाया हो लेकिन बल्ला चलाएगा कौन?, बॉल करेगा कौन? यह तय करेंगे हम...पैसा कहां-कैसे खर्च होगा, बताएंगे हम...हम..हम..के इसी खेल के मैदान से असली खिलाड़ी गोल हैं...
परिवारवाद-लेटरलवाद की एक मिसाल...
यह लगभग निश्चित है कि जय शाह ICC चेयरमैन चुनाव में खड़े होंगे. यदि वे चुनाव में खड़े होते हैं तो उनके चुने जाने की संभावना सौ फीसदी है. क्योंकि उन्हें ICC के पक्के सदस्य 16 देशों में से लगभग 14 सदस्यों का समर्थन हासिल है. उनकी ICC में जाने की बात से ही यह चर्चा छिड़ गई कि BCCI में उनकी जगह कौन लेगा? अब जो शुरुआती नाम सामने आए उन पर गौर कीजिए..
1. आशीष शेलार, मुंबई भाजपा के अध्यक्ष और BCCI के कोषाध्यक्ष हैं.
2. रोहन जेटली, जेटली दिल्ली एवं जिला क्रिकेट संघ (डीडीसीए) अध्यक्ष हैं. लेकिन उनका सबसे बड़ा परिचय है कि वे भाजपा दिग्गज अरुण जेटली के बेटे हैं. उनका नाम बीसीसीआई के सचिव पद की रेस में सबसे आगे है.
3. अरुण धूमल, हिमाचल के दिग्गज भाजपा नेता पूर्व मुख्यमंत्री प्रेमकुमार धूमल के बेटे और पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष अनुराग ठाकुर के छोटे भाई. अरुण इंडियन प्रीमियर लीग IPL के चेयरमैन भी हैं. और BCCI के कोषाध्यक्ष भी रह चुके हैं.
4. देवजीत सैकिया, यह असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा के करीबी हैं. बीसीसीआई के संयुक्त सचिव हैं.
5. राजीव शुक्ला, कांग्रेसी नेता और बोर्ड के उपाध्यक्ष. पहले भी बोर्ड में कई महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं.
ज़रा इन नामों पर गौर कीजिए...कौन हैं ये? पॉलिटिकल खेल प्रशासक! दिग्गज-बेटे-करीबी!!
परिवारवाद-लेटरलवाद!!! बस बीट हो गए ना… क्या करें पिच ही जरा दूसरी है. ये बॉल भी जरा घूमती सी है. तो इस घूमती पिच पर एक एक बॉल को ठहरकर खेलिए...
पहले बॉलिंग स्टाइल समझ लीजिए...
पहले ओवर के तौर पर एक राज्य का जायजा लीजिए...बहती गंगा में हाथ धोने में कोई पीछे नहीं...
- राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत आरसीए या राजस्थान क्रिकेट संघ के अध्यक्ष रहे हैं. पिछले साल कांग्रेस सरकार हार गई तो राजसमंद क्रिकेट संघ के कोषाध्यक्ष के रूप में जम गए.
- कांग्रेसी मंत्री रहे प्रमोद जैन भाया के बेटे यश जैन पिछले साल नवम्बर में ही बारां क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बने थे. अभी भी इसी पोस्ट पर हैं.
- चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर के पुत्र धनंजय सिंह खींवसर नागौर क्रिकेट संघ के अध्यक्ष हैं. फिलहाल धनंजय RCA के एक्जीक्यूटिव प्रेसीडेंट हैं. हालांकि वहां भी मामला कुछ अटका सा है.
- भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेन्द्र राठौड़ के बेटे पराक्रम सिंह राठौड़ चूरू क्रिकेट संघ के अध्यक्ष हैं. हालांकि चूरू में चुनाव की वैधता को लेकर विवाद चल रहा है.
- शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के पुत्र पवन दिलावर को बारां जिला क्रिकेट एसोसिएशन का कोषाध्यक्ष चुना गया है।
- पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी राजसमंद क्रिकेट संघ के अध्यक्ष हैं. राजस्थान क्रिकेट संघ के संरक्षक भी रह चुके हैं.
वैसे DRS मैथड से भी नहीं आ सकता है इस उतार-चढ़ाव वाले मैच का रिजल्ट?
कुल कहानी का लब्लोलुआब यह है कि जहां पैसा है वहां सियासतदान इस पर अधिकार करने के लिए जरूर आएंगे. जब वे आएंगे तो इस तरह की संस्था पर अधिकार भी जमाए रखने की कोशिश करेंगे. इस दिशा में खुद तो फिर परिवार फिर करीबी इन संस्थाओं में नज़र आएंगे. और इस तरह आप सियासत के बाद की देश की क्रिकेट संस्थाओं में दिखेगा सियासी परिवारवाद...लेटरलवाद...! तो रिजल्ट क्या रहा? फिलहाल तो मैच ड्रॉ ही दिख रहा है...