नीतीश कुमार जोरदार झटके धीरे से ही देते हैं. ऐसा अक्सर वो तात्कालिक साथियों के साथ ही करते हैं. जिसके साथ रहते हैं, उनके बीच अपनी अहमियत बनाये रखने में नीतीश कुमार को ये रणनीति अक्सर फायदा ही पहुंचाती है. आमतौर पर नीतीश कुमार की ये स्टाइल प्रेशर पॉलिटिक्स कही जाती है.
बीजेपी को लेकर नीतीश कुमार का ताजा बयान विपक्षी गठबंधन INDIA के साथियों के लिए ही लगता है. हो सकता है, थोड़ा संदेश उसमें बीजेपी के लिए भी हो. लेकिन ये समझ में नहीं आता कि जब अमित शाह और जेपी नड्डा बार बार दोहरा रहे हों कि नीतीश कुमार के लिए बीजेपी में कोई जगह नहीं बची है, तो बिहार के मुख्यमंत्री ऐसा क्यों कर रहे हैं?
मोतिहारी में महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के पहले दीक्षांत समारोह में पहुंचे नीतीश कुमार ने मुख्य रूप से तीन बातें कही है. एक बात, बीजेपी नेताओं से दोस्ती को लेकर है. दूसरी बात, मनमोहन सिंह सरकार की आलोचना से जुड़ी है - और तीसरी बात, 2014 में आयी नरेंद्र मोदी सरकार की तारीफ को लेकर है.
और अब वही नीतीश कुमार 2014 में आयी सरकार की खुलेआम तारीफ कर रहे हैं. वो भी तब जबकि INDIA गठबंधन 2024 में मोदी और बीजेपी को मजबूत टक्कर देने की कोशिश कर रहा है.
लेकिन INDIA गठबंधन में रहते हुए नीतीश कुमार ने मनमोहन सरकार की आलोचना क्यों की? कहीं शशि थरूर के बयान नाराज तो नहीं हैं? हाल ही में शशि थरूर ने कहा है कि बहुत मजबूत संभावना है कि 2024 में NDA को पछाड़ कर INDIA गठबंधन सत्ता में आ जाये - और हो सकता है मल्लिकार्जुन खड़गे या राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री बन जायें!
2014 के दर्द की दवा मिल गयी क्या?
2014 में चुनाव जीत कर केंद्र में आयी नरेंद्र मोदी सरकार तो नीतीश कुमार के राजनीतिक जीवन का सबसे दर्दनाक हादसा है. भले ही नीतीश कुमार 2014 से पहले एनडीए में किसी और के लिए बैटिंग कर रहे हों, लेकिन प्रधानमंत्री पद के एक दावेदार तो वो भी थे.
लेकिन बीजेपी ने नरेंद्र मोदी का नाम आगे बढ़ा दिया, और नीतीश कुमार के लिए ये बहुत बड़ा झटका था. नीतीश कुमार ने तत्काल प्रभाव से एनडीए छोड़ देने का फैसला किया. 2014 के लोक सभा चुनाव के नतीजे आये तो डबल झटका लगा. अपनी सीटें तो 2 पर सिमट गयी थीं, और बीजेपी की जीत के बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले थे. नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी, और जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया - ये सब इसीलिए तो किया ताकि मुख्यमंत्री रहते नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री बन चुके नरेंद्र मोदी को फेस न करना पड़े.
अभी साल भर पहले की ही तो बात है. एनडीए छोड़ कर महागठबंधन का मुख्यमंत्री बनते ही नीतीश कुमार ने डंके की चोट पर कहा था, '14 में जो आये थे, वो 24 तक आगे रह पाएंगे कि नहीं...'
नीतीश कुमार उसी यूनिवर्सिटी का किस्सा सुना रहे थे जिसके दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आमंत्रित थीं. ये बताते हुए कि महात्मा गांधी ने इसी धरती से शिक्षा की अलग जगाई, नीतीश कुमार ने कहा कि 2009 में बार बार मांग करने के बावजूद तत्कालीन केंद्र सरकार यूनिवर्सिटी खोलने को राजी नहीं हुई. बोले, मैंने तत्कालीन शिक्षा मंत्री से मुलाकात की... वो खाना तो खिलाये लेकिन मोतिहारी में केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलने से मना कर दिया... मैं बार बार कहता रहा, लेकिन वो नहीं माने.'
और फिर नीतीश कुमार ने ये भी समझाया कि कैसे 2014 में केंद्र में आई नई सरकार ने इस दिशा में कदम उठाया - और 2016 में यहां काम शुरू हुआ.
ये दोस्ती कहां तक ले जाएगी?
बीजेपी को लेकर लेकर नीतीश कुमार का एक और बयान काफी चर्चित रहा है, 'मुझे मर जाना कबूल है, लेकिन बीजेपी के साथ जाना नहीं.'
लेकिन अभी तो वो ऐसी बातें कर रहे हैं जैसे आशिक और माशूका जन्म जन्म तक साथ जीने मरने टाइप बातें किया करते हैं. देखा जाये तो नीतीश कुमार के लिए बीजेपी से दोस्ती की बात करने का कोई मौका नहीं था. देश की राष्ट्रपति के साथ यूनिवर्सिटी का कार्यक्रम था. ज्यादा से ज्यादा केंद्र सरकारों का बिहार के साथ रवैये का जिक्र करके भी रुक सकते थे - बीजेपी नेताओं से दोस्ती का बखान करने की बिलकुल भी जरूरत नहीं थी.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और बीजेपी सांसद राधामोहन सिंह की तरफ इशारा करते हुए नीतीश कुमार कह रहे थे, 'ये जितने लोग हैं, सब साथी हैं... कौन कहां है, छोड़िए न भाई... छोड़ो न एकरा से का मतलब है? हमारा त दोस्ती कहियो खत्म होगा? जब तक हम जीवित रहेंगे... आप लोगों के साथ भी मेरा संबंध रहेगा... चिंता मत करिये.'
नीतीश कुमार के दोस्ती वाले बयान पर जब सांसद राधा मोहन सिंह से पूछा गया, तो वो मुस्कुराते हुए बोले, 'नीतीश कुमार के बोलने के क्या मायने हैं... ये तो वही बता सकते हैं.'
यही सवाल जब बिहार बीजेपी प्रमुख सम्राट चौधरी से पूछा गया तो उनका कहना था, बीजेपी की व्यक्तिगत लड़ाई किसी के साथ नहीं है... नीतीश कुमार से भी हमारी व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है... सैद्धांतिक तौर पर बीजेपी देश के लिए कुर्बानी दे सकती है... नीतीश कुमार से व्यक्तिगत झगड़ा नहीं है - केवल राजनीतिक मुद्दे हैं.
और ठीक उसी सवाल पर बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने भी कोई अलग प्रतिक्रिया नहीं दी, 'संबंध सबका होता है... जब भी हम लोग मिलते हैं, तो सब एक दूसरे का हाल जानते हैं... मुख्यमंत्री ने मोतिहारी में सही कहा है कि संबंध सबसे होता है.'
लेकिन बीजेपी के दरवाजे पर तो ताला लटका है
बिहार की ही एक रैली में अमित शाह ने साफ तौर पर कह दिया था कि नीतीश कुमार के लिए बीजेपी के दरवाजे बंद हो चुके हैं. रैली में नीतीश कुमार सहित जेडीयू नेताओं संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा था, 'मैं एक बात आज फिर स्पष्ट कर देता हूं... किसी के भी मन में ये संशय हो कि चुनाव के परिणामों के बाद नीतीश कुमार को भाजपा एनडीए में लेगी... तो स्पष्ट कहना चाहता हूं कि आप लोगों के लिए भाजपा के दरवाजे हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं.'
एनडीए में नीतीश कुमार की वापसी की अटकलों के बीच हाल ही में जेपी नड्डा ने कहा था कि एनडीए में उनकी वापसी नहीं होगी. एक कार्यक्रम में पहुंचे जेपी नड्डा ने कहा, अब भाजपा किसी को अपने कंधे पर बैठाकर सरकार नहीं बनाने देगी.
नीतीश कुमार की प्रेशर पॉलिटिक्स चलती रहती है
1. अगस्त, 2022 में नीतीश कुमार के एनडीए छोड़ देने के बाद बीजेपी के किसी नेता से बातचीत होने की बात नहीं सुनने को मिल रही थी, तभी बिहार में नये राज्यपाल की नियुक्ति हुई. और नीतीश कुमार को मौका मिल गया, ये बताने का कि अमित शाह के साथ उनकी बातचीत बंद नहीं हुई है. नीतीश कुमार कुछ ऐसे बताया, '...हमको सूचना दी थी गृहमंत्री जी ने... उन्होंने ही बताया था... हमने कहा कि ठीक है कीजिए.'
मतलब, कोई ये न समझे कि एनडीए छोड़ कर महागठबंधन में आने के बाद से बीजेपी नेतृत्व के साथ उनका कोई संपर्क नहीं रहा - मतलब, ये कि मोदी-शाह के साथ उनका संवाद कभी खत्म नहीं हुआ.
2. G20 सम्मेलन के दौरान जब राष्ट्रपति की तरफ डिनर का न्योता मिला तो नीतीश कुमार खुशी खुशी दिल्ली पहुंच गये. पत्रकारों से बातचीत में बोले भी, राष्ट्रपति ने आने का निमंत्रण दिया था कि आना चाहिये, इसलिए हम लोग आ गये.
नीतीश कुमार के इस कदम पर बिहार में सुराज अभियान चला रहे प्रशांत किशोर का कहना था, नीतीश कुमार के राजनीति करने का अपना तरीका है. एक दरवाजे को खोलते हैं, और पीछे से खिड़की और रोशनदान दोनों खोलकर रखते हैं. कहते हैं, 'किसकी कब जरूरत पड़ जाये, अपना रास्ता खोले हुए हैं.' उससे पहले राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह के जरिये नीतीश कुमार के बीजेपी नेतृत्व के संपर्क में होने की बातें भी चल रही थीं.
3. और अभी पिछले ही महीने की बात है. नीतीश कुमार हंसते हंसते दीन दयाल उपाध्याय के कार्यक्रम में पहुंच गये. वहां तो तेजस्वी यादव को भी सरकारी कार्यक्रम के नाम पर लेते गये. जिस दिन ये कार्यक्रम था, उसी दिन हरियाणा के कैथल में विपक्षी दलों के नेताओं की रैली थी, लेकिन नीतीश कुमार ने दूरी बना ली थी.