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बीजेपी के साथ नई पारी में क्या हैं नीतीश कुमार के फायदे-नुकसान

नीतीश कुमार के लिए बीजेपी के साथ नई पारी में काम करना मुश्किल तो होगा, लेकिन लोकसभा चुनाव तक कोई दिक्कत नहीं लगती. हां, चुनाव बाद INDIA ब्लॉक के मुकाबले बीजेपी का साथ बेहतर भविष्य की अपेक्षा जरूर कर सकते हैं.

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नीतीश कुमार की नई पारी में पाला बदलने का असर लोक सभा चुनाव के बाद महसूस होगा
नीतीश कुमार की नई पारी में पाला बदलने का असर लोक सभा चुनाव के बाद महसूस होगा

नीतीश कुमार वक्त की नजाकत को अच्छी तरह समझते हैं. जरूरतों को भी वो अच्छी तरह समझते हैं - और जरूरत के हिसाब से ही फैसले लेते हैं. राजनीतिक गठबंधन का उनका हर फैसला वक्त के हिसाब से बिलकुल सही होता है. 

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अपने साथ साथ नीतीश कुमार को दूसरों की भी जरूरतों की अच्छी समझ हो चुकी है, तभी तो बिहार के हर खांचे में फिट बैठ जाते हैं. जैसे राजनीतिक दल बीती बातें भूल कर नीतीश कुमार को गले लगा लेते हैं, जनता भी तो सिर आंखों पर ही बिठाये हुए है. 

अगर बिहार की जनता नीतीश कुमार के साथ नहीं होती, तो भला उनका गठबंधन चुनाव कैसे जीत पाता? जब से बिहार के मुख्यमंत्री बने जिस भी गठबंधन के साथ चुनाव लड़े, जीत उसी की हुई.

आखिर बिहार विधानसभा चुनावों में हार उसी गठबंधन की क्यों होती है, जिसमें नीतीश कुमार नहीं होते हैं? 2005 से अब तक हुए सारे ही चुनावों के नतीजे मिसाल हैं. 2013 में बीजेपी को छोड़ दिये तब भी 2015 में महागठबंधन के नेता के रूप में चुनाव जीत गये. 2017 में महागठबंधन छोड़कर 2020 में एनडीए के नेता के रूप में चुनाव जीतने में सफल रहे. 

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नीतीश कुमार में ऐसी खासियत तो है ही कि पिछले एक दशक में बीजेपी और और लालू यादव की पार्टी आरजेडी को हरदम उनकी जरूरत बनी रहती है. अभी अभी वो बीजेपी के साथ चले गये हैं, लेकिन राष्ट्रीय जनता दल को अब भी उनकी शिद्दत से जरूरत है. 

बीजेपी के साथ जाने से नीतीश कुमार को नुकसान तो हो सकते हैं, लेकिन फायदे भी बहुत लगते हैं. अभी तो हर कोई मान कर चल रहा है कि नीतीश कुमार के पाला बदलने का ये अंतिम वाकया है, लेकिन अब भी कोई गारंटी नहीं दे सकता कि भविष्य में मौका मिला तो वो चूक जाएंगे.

1. बीजेपी के साथ काम करना अब मुश्किल हो सकता है

मौजूदा विधानसभा की बात करें तो नीतीश कुमार तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं. और अब तक 9 बार. बिहार में रिकॉर्ड है. 2020 के चुनाव नतीजे आने के बाद, फिर 2022 में एनडीए छोड़ कर महागठबंधन में चले जाने पर - और अब 2024 में फिर से एनडीए के मुख्यमंत्री के रूप में.

2020 के मुकाबले बीजेपी के साथ नई पारी देखने में काफी मुश्किल लगती है. माना तो तब भी जाता रहा कि बीजेपी के साथ नीतीश कुमार के लिए काम करना मुश्किल हो रहा था, लेकिन इस बार ज्यादा दिक्कत लगती है. 

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तब भी बीजेपी ने नीतीश कुमार के दोनों तरफ दो डिप्टी सीएम बिठाये थे, लेकिन इस बार दो ऐसे नेता हैं जो नीतीश कुमार के खिलाफ हमेशा ही आक्रामक रुख अपनाये हुए देखे गये हैं. 

सरकारी फैसले लेने में नीतीश कुमार को दिक्कत तो पिछले चुनाव बाद मुख्यमंत्री बनने पर भी हो रही थी, लेकिन अब तो लगता है हर काम मुश्किल हो जाएगा - लेकिन ये नौबत आम चुनाव खत्म हो जाने के बाद आएगी. हाल फिलहाल दूसरी बातों की चिंता होनी चाहिये, लेकिन इस मामले में तो सब ठीक ही लगता है.  

2. सीटों का बंटवारा भी पहले जैसा नहीं होने वाला

2019 का लोक सभा चुनाव बीजेपी और जेडीयू 17-17 सीटों पर लड़े थे. चुनाव से पहले काफी दिनों तक दोनों तरफ से दबाव बनाने की कोशिशें भी होती रहीं. बड़ा सवाल यही होता कि बड़े भाई की भूमिका में कौन होगा? मुद्दा तब तक खत्म नहीं हुआ जब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंजूरी नहीं मिल गई - और बीजेपी नेता अमित शाह की तरफ से नीतीश कुमार के ही एनडीए का नेता होने की सार्वजनिक घोषणा नहीं हुई.

इस बार तो लोक सभा सीटों के बंटवारे की बात आई तो भी बीजेपी अपनी ही चलाएगी, और बंटवारा बराबरी पर तो कतई नहीं होने वाला है - 2024 की लोक सभा सीटों के बंटवारे का आधार 2020 के विधानसभा चुनाव के नतीजे हो सकते हैं, और उससे ज्यादा गुंजाइश नहीं लगती. 

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बीजेपी अपने हिस्से में सीटें तो ज्यादा रखेगी ही, नीतीश कुमार के अलावा भी दावेदार कई हैं. चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस ही नहीं, जीतनराम मांझी के अलावा उपेंद्र कुशवाहा भी दावा पेश करेंगे - और ऐसा संभव भी हुआ तो सभी की हिस्सेदारी नीतीश कुमार के कोटे से ही पूरी की जाएगी.

3. बीजेपी ने बिहार में भी महाराष्ट्र जैसी स्थिति बना ली है 

नीतीश कुमार की नई पारी में ऊपर से तो थोड़ी ही भूमिका बदली हुई लगती है. तेजस्वी यादव की जगह सम्राट चौधरी को मिल गई है, लेकिन उनका रोल अलग होगा, ऐसा मान कर चलना चाहिये. काफी हद तक महाराष्ट्र जैसी व्यवस्था समझ लेनी चाहिये.
 
नीतीश कुमार के कैबिनेट में सम्राट चौधरी की भूमिका भी महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस जैसी ही मान कर चलना चाहिये - बीजेपी नेतृत्व का मिजाज तो सबको मालूम है ही.

4. नीतीश कुमार बेहतर भविष्य की उम्मीद कर सकते हैं

INDIA ब्लॉक के मुकाबले बीजेपी के साथ नीतीश कुमार की स्थिति बेहतर हो सकती है. मुख्यमंत्री तो वो 2025 तक ही रहने वाले हैं, बशर्ते लोक सभा चुनाव के बाद भी बीजेपी नेतृत्व का दया भाव बना रहे. अभी तो राजनीतिक मजबूरी है, बीजेपी की भी. आम चुनाव होने तक वो कुछ भी डिस्टर्ब नहीं करना चाहेगी.

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नीतीश कुमार को उम्मीद जरूर होगी कि बीजेपी के साथ आ जाने से कम से कम बिहार से सम्मानजनक विदाई हो सकेगी. सत्ता की राजनीति के हिसाब से देखें तो बुढ़ापे में पेंशन की तरह किसी राज भवन में भी जगह भी मिल सकती है. 

5. क्या ये मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार की आखिरी पारी है?

ये सबसे बड़ा सवाल है - क्योंकि नीतीश कुमार के पास कोई छुपी हुई स्कीम हो तो किसी को नहीं मालूम. जिस तरह से नीतीश कुमार अभी लालू परिवार के खिलाफ नरम रुख अपनाये हुए हैं, साफ है वो वापसी का स्कोप बंद नहीं करना चाहते. लोक सभा चुनाव के बाद आरजेडी की भी हैसियत मालूम हो जाएगी. 

साथ नहीं होने पर लालू परिवार नीतीश कुमार को भले ही पलटू राम कहता रहे, लेकिन कुछ ही अंतराल पर ऐसी नौबत आ ही जाती है कि दोनों गले मिल जाते हैं. आगे भी कौन दावा कर सकता है कि हाथ मिलाने का मौका बना तो वे ऐसा नहीं होने देंगे. 

नीतीश कुमार के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी तो वैसे भी 2025 तक ही निश्चित लग रही है, लेकिन किसी को क्या मालूम. वो बिहार की राजनीति के चाणक्य हों न हों, लेकिन नीतीश कुमार तो हैं ही. और नीतीश कुमार के पाला बदलने वाली हुनर का तो कोई सानी है नहीं

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