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स्पाईवेयर को किसी के कंप्यूटर या मोबाइल में डालना भी साइबर क्राइम

इस सॉफ्टवेयर को डेवलप करने वाली कंपनी का कहना है वो सिर्फ सरकार और सरकारी एजेंसियों को ये सॉफ्टवेयर उपलब्ध करवाती है. ये स्पाईवेयर आतंक और अपराध से लड़ने के लिए उपलब्ध करवाया जाता है. प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों ने जांच के जरिए नई चीजों को पेश किया है.

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Pawan Duggal Cover
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हाल ही में पेगासस विवाद ने कई नए सवाल खड़े किए हैं जिन पर विचार करने की जरूरत है. इसमें टारगेट व्यक्ति के फोन में स्पाईवेयर डालकर फोन को इन्फेक्ट कर दिया जाता है. इससे टारगेट व्यक्ति के डिवाइस को स्पाई डिवाइस बना दिया जाता है. इससे टारगेट यूजर की गतिविधि पर नजर रखी जाती है. 

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ये एक्ट ग्रे जोन में आता है. इस सॉफ्टवेयर को डेवलप करने वाली कंपनी का कहना है वो सिर्फ सरकार और सरकारी एजेंसियों को ये सॉफ्टवेयर उपलब्ध करवाती है. ये स्पाईवेयर आतंक और अपराध से लड़ने के लिए उपलब्ध करवाया जाता है. 
प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों ने जांच के जरिए नई चीजों को पेश किया है. भारत के संदर्भ में पेगासस मामला कई सवाल खड़े करता है. इसको लेकर सबसे पहला सवाल तो यही आता है क्या भारत में स्पाईवेयर अवैध है. इसका सीधा जवाब हां में है. 

ऐसा इसलिए है क्योंकि इन गतिविधियों का सीधा उद्देश्य बिना किसी यूजर की परमिशन के उनके कंप्यूटर और कम्यूनिकेशन सिस्टम में गलत तरीके से प्रवेश करना है. सभी स्पाईवेयर से जुड़ी गतिविधियां सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के सेक्शन 43 रीड विथ सेक्शन 66 तहत गैर-कानूनी है. 

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स्पाईवेयर को किसी के कंप्यूटर या मोबाइल में डालना भी साइबर क्राइम है. भारत में स्पाइवेयर अवैध है, इसलिए स्पाइवेयर के माध्यम से इंटरसेप्शन करना भी अवैधता के दायरे में आता है. केंद्र सरकार के पास किसी भी कंप्यूटर रिसोर्स में किसी भी इलेक्ट्रॉनिक जानकारी को इंटरसेप्ट करने का निर्देश देने का अधिकार है. 

ये निर्देश तब दिए जा सकते हैं जब ये भारत की संप्रभुता या अखंडता, भारत की रक्षा के हित में है.  इसके अलावा इसके निर्देश राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध या सार्वजनिक व्यवस्था या उपरोक्त से संबंधित किसी भी संज्ञेय अपराध के कमीशन को रोकने के लिए या किसी अपराध की जांच के लिए दिए जा सकते हैं. ये सिर्फ कानूनी तरीके से ही किया जा सकता है. यहां पर पेगासस के केस में ये अवैध है. 

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 को इसलिए ड्राफ्ट नहीं किया गया था कि सरकार स्पाईवेयर की मदद से सर्विलांस करें. इस तरह के उपकरणों का उपयोग सरकारें गुप्त और प्रत्यक्ष दोनों गतिविधियों के लिए करती है. लेकिन भारत जैसे देश में जहां लोगों को निजता का मौलिक अधिकार है, इस टूल का इस्तेमाल अपने आप में निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ के मामले में भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार के रूप में निजता के अधिकार को स्पष्ट रूप से माना हे चूंकि इस अधिकार का भारत का संविधान गारंटी देता है इसलिए ये सरकार पर निर्भर है कि वह अपने नागरिकों की व्यक्तिगत और डेटा गोपनीयता की रक्षा के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों उपाय करें. 

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जमीनी हकीकत बहुत तेजी से बदल रही है और लोगों को अपनी गहरी नींद से जागने की जरूरत है। अपनी पुस्तक "न्यू साइबर वर्ल्ड ऑर्डर पोस्ट कोविड -19" में, मैंने साइबर स्पेस पर कोविड -19 के अपरिवर्तनीय प्रभाव का विश्लेषण किया है और यह भी तर्क दिया है कि जब तक राष्ट्र वर्तमान और अन्य बाद की लहरों के खिलाफ अपनी लड़ाई में विजयी होते हैं. दुनिया नए साइबर स्पेस में प्रवेश करेगी और न्यू साइबर वर्ल्ड ऑर्डर में भी. इस नई विश्व व्यवस्था में, राज्यों के अधिक शक्तिशाली होने की संभावना है और व्यक्तियों की डिजिटल स्वतंत्रता संभावित रूप से खतरे और हमले के अधीन होने की संभावना है.

इसका मतलब सरकार को ऐसे डिवाइस का उपयोग नहीं करना चाहिए जो लोगों के निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता हो. सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वो लोगों जासूसी रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाएगी.  

पवन दुग्गल

लेखक सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं. ये साइबर लॉ और साइबर सिक्योरिटी लॉ में एक्सपर्ट हैं. दुनिया में चार टॉप साइबर लॉयर में इनका भी स्थान है. साइबर लॉ पर इंटरनेशनल कमिशन के ये चेयरमैन भी हैं. 


 

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