रामलीला मैदान से सारे अपडेट आ रहे हैं, बस एक जानकारी नहीं मिल पा रही है, और वो है अरविंद केजरीवाल काे सवाल का जवाब - ‘दूल्हा कौन है?’
ये बात अलग है कि अरविंद केजरीवाल के सवाल का जवाब दिये बगैर ही बीजेपी ने दिल्ली की गद्दी पर काबिज होने का लाइसेंस हासिल कर लिया है, लेकिन, अब भी सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं समझ रही है.
सुना है कि शपथग्रहण समारोह के लिए 30 हजार मेहमानों को न्योता भेजा जा रहा है. और ऐसे में हर शख्स का एक ही सवाल है - अगर फ्रंटरनर प्रवेश वर्मा या मीडिया में जिनके नाम लिये जा रहे हैं, वे नहीं तो सरप्राइज नाम कौन है? मुख्यमंत्री पद की रेस में डार्क हार्स कौन है? मतलब वही है, बाराती तैयार हैं, लेकिन ‘दूल्हा कौन है?’
और सवाल ये भी है कि प्रवेश वर्मा ही दूल्हा क्यों नहीं हैं? अगर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की तरह सरप्राइज की जगह देवा भाऊ के नाम से महाराष्ट्र चुनाव कैंपेन में चर्चित रहे देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है, तो दिल्ली में प्रवेश वर्मा को क्यों नहीं?
क्या प्रवेश वर्मा की ताकत ही उनकी कमजोरी बन रही है?
एक अपडेट और भी आया है. पहले बताया जा रहा था कि शपथ ग्रहण समारोह 20 फरवरी को शाम 4.30 बजे होगा, लेकिन अब समय बदल गया है, और बताते हैं कि शपथ ग्रहण अब सुबह 11 बजे होगा.
आखिर प्रवेश वर्मा में कोई कमी है क्या?
महाराष्ट्र और दिल्ली के राजनीतिक समीकरण में काफी फर्क है. महाराष्ट्र में बीजेपी पहले से ही गठबंधन सरकार का हिस्सा था, लेकिन दिल्ली में ठीक से विपक्ष में भी नहीं बैठ पा रही थी.
महाराष्ट्र में तख्तापलट होने के बाद बीजेपी ने शिवसेना के बागी एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनने दिया, और मुख्यमंत्री रहे देवेंद्र फडणवीस को उनकी मर्जी के खिलाफ डिप्टी सीएम बना दिया था. मुख्यमंत्री होने के नाते एकनाथ शिंदे कुर्सी को लेकर करीब करीब आश्वस्त थे, लेकिन चुनावों के दौरान ही अमित शाह ने समझा दिया कि एकनाथ शिंदे तो तात्कालिक परिस्थितियों में ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हुए हैं, चुनाव बाद मिलजुल कर फैसला लिया जाएगा - और तभी संदेश साफ हो गया था, ये बात अलग है कि एकनाथ शिंदे को अब भी चीजें हजम नहीं हो पा रही हैं, और तनावपूर्ण किंतु नियंत्रण में वाले हालात बने हुए हैं.
ऐसी बातें, संदेश, तो 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी अमित शाह के मुंह से सुनने को मिल रही थीं. तब अगर बीजेपी चुनाव जीत गई होती तो प्रवेश वर्मा ही मुख्यमंत्री बने होते. चुनाव के दौरान कई बार अमित शाह ने अरविंद केजरीवाल को प्रवेश वर्मा से बहस की चुनौती भी दी थी, जबकि वो दिल्ली विधानसभा का चुनाव भी नहीं लड़ रहे थे. तब वो दिल्ली से बीजेपी के सांसद थे.
दिल्ली के ही एक और सांसद मनोज तिवारी तब प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष हुआ करते थे, लेकिन अमित शाह के मुंह से अरविंद केजरीवाल के मुकाबले उनका नाम नहीं सुनने को मिलता था.
और इसीलिए ये सवाल उठ रहा है कि अगर तीन बार की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को हराकर अरविंद केजरीवाल तीन बार मुख्यमंत्री बन सकते हैं, तो एक बार प्रवेश वर्मा क्यों नहीं बन सकते?
ऐसा भी तो नहीं कि वो शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे या रमन सिंह की तरह पुरानी वाली बीजेपी के नेता रहे हैं. मान लेते हैं कि प्रवेश वर्मा पुरानी वाली बीजेपी और दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे साहिब सिंह वर्मा के बेटे हैं, लेकिन वो तो बीते दिनों की बात हो चुकी है. प्रवेश वर्मा तो 2014 के बाद दो बार दिल्ली के सांसद भी रह चुके हैं. यूपी चुनाव के दौरान में पश्चिमी इलाके में जाटों को साधने की बात आई तो मदद के लिए प्रवेश वर्मा का ही नाम सबसे पहले नजर आया.
तब न सही, लेकिन बाद में तो जयंत चौधरी एनडीए में आ भी गये, जबकि राज्यसभा तो उनको अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने भेजा है.
अगर अमित शाह को प्रवेश वर्मा पर भरोसा नहीं होता तो मनोज तिवारी के दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष रहते वो अरविंद केजरीवाल को प्रवेश वर्मा से बहस करने की चुनौती बार बार क्यों दे रहे थे?
प्रवेश वर्मा के मुख्यमंत्री बनने से दिल्ली से अच्छा संदेश जाएगा
दिल्ली की आबादी वैसे तो कॉस्मोपॉलिटन कैटेगरी में आती है, फिर भी कई फैक्टर अहम रोल निभाते हैं. जाट और गुर्जर से लेकर पंजाबी और पूर्वाचली समुदाय तक, सबकी अलग अलग अहमियत और भूमिका है.
जाट समुदाय से आने वाले प्रवेश ने दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे अरविंद केजरीवाल को नई दिल्ली सीट पर 4099 वोट से शिकस्त दी है. वो पश्चिमी दिल्ली लोकसभा सीट से दो बार सांसद भी रहे हैं. 2019 के चुनाव में प्रवेश वर्मा ने 5.78 लाख वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी, जिसे दिल्ली के इतिहास में सबसे बड़ी जीत माना जाता है.
बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे प्रवेश वर्मा अब तक तक कोई चुनाव नहीं हारे हैं. प्रवेश वर्मा को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी चाहे तो जाटों और किसानों दोनो की नाराजगी भी दूर कर सकती है.
दिल्ली से पहले बीजेपी ने हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी भारी जीत हासिल कर चुकी है, लेकिन दिल्ली की बात और है. दिल्ली की जीत से बीजेपी लंबे समय तक पूरे देश में संदेश देना चाह रही होगी. अब अगर बीजेपी प्रवेश वर्मा को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाती है तो हरियाणा, राजस्थान और पश्चिम यूपी के जाट समुदाय के बीच भी मजबूत संदेश जाना तय है.
दिल्ली में काम की बदौलत बीजेपी के मन में केजरीवाल मॉडल की यादें मिटाने की कोशिश वाले ख्याल जरूर होंगे. वैसे भी भगवंत मान आम आदमी पार्टी के बाकी नेताओं से अलग अब पंजाब मॉडल की बात करने लगे हैं.
देखा जाये तो सोशल मीडिया पर भी प्रवेश वर्मा ट्रेंड का हिस्सा बने हुए हैं, और अरविंद केजरीवाल को हराने के बाद दूल्हा बनने की पूरी योग्यता रखते हैं, लेकिन होगा तो वही जो मोदी-शाह के मन में चल रहा होगा, और संघ को भी मंजूर होगा.