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'इमोशनल' पशुपति कुमार पारस NDA छोड़ कर बिहार में क्या हासिल कर पाएंगे?

पशुपति कुमार पारस का NDA छोड़ना कहीं से भी राजनीतिक निर्णय नहीं लगता, बल्कि वो भावनाओं में बह गये लगते हैं. बीजेपी ही नहीं, चिराग पासवान का भी वो शायद ही कुछ खास नुकसान कर पायें - बल्कि खुद उनके बिहार का शिवपाल यादव बन कर रह जाने का खतरा पैदा हो गया है.

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लोकसभा चुनाव 2024 की घोषणा हो गई है, और पशुपति कुमार पारस ने मोदी कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया है. मतलब, NDA से भी नाता तोड़ लिया है - और कुल मिला कर कह सकते हैं कि पशुपति कुमार पारस ने अब बीजेपी का साथ भी छोड़ दिया है. 

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ये नहीं भूलना चाहिये कि पशुपति कुमार पारस बीजेपी के साथ होने की बदौलत ही केंद्रीय मंत्री बन पाये थे. और इस मुगालते में भी उनको नहीं रहना चाहिये कि बीजेपी ने उनकी किसी राजनीतिक ताकत की वजह से साथ दिया था - और उनको लोक जनशक्ति पार्टी के संसदीय दल का नेता बनाया जाना भी वक्त की नजाकत और जरूरत थी. 

वो तो तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों का फायदा उठाने में सफल रहे. बीजेपी तक मामला पहुंचने से पहले तो पशुपति कुमार पारस को ज्यादा मदद नीतीश कुमार से ही मिली थी. नीतीश कुमार को चिराग पासवान से बदला लेना था, और वो पशुपति कुमार पारस का इस्तेमाल कर लिये. इस्तेमाल तो पशुपति कुमार पारस का बीजेपी ने भी किया है. 

पशुपति कुमार पारस का केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा काफी हैरान करने वाला है. जिस दौर में हर नेता बीजेपी के साथ जाने के लिए आतुर हो, किसी नेता के साथ छोड़ कर जाने का कोई मतलब नहीं बनता. खुन्नस की बात और है, लेकिन ये राजनीतिक फैसला तो नहीं समझ में आता. 

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देखने में तो ऐसा लगता है, जैसे पशुपति कुमार पारस ने भी हरसिमरत कौर की तरह ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट से विरोध जताते हुए इस्तीफा दिया है, लेकिन दोनों मामलों में बहुत बड़ा फर्क है. हरसिमरत कौर ने कृषि कानूनों के विरोध में यानी एक खास मकसद के लिए इस्तीफा दिया था, और NDA से नाता तोड़ा था - पशुपति कुमार पारस का तो महज निजी स्वार्थ देखा जाएगा. 

ऐसा भी तो नहीं है कि वो अपने वोटर को जाकर बतायें कि दलित हितों की लड़ाई लड़ने के लिए उन्होंने NDA छोड़ा है. न ही वो दलितों के साथ किसी तरह के भेदभाव का आरोप बीजेपी पर लगा पाएंगे. 

अगर किसी के धोखा देने की बात बोले तो उलटे उनको ही सुनने पड़ेंगे - भले ही बीजेपी ने कभी नहीं पूछा हो, लेकिन लोग तो पूछेंगे ही कि आखिर चिराग के साथ उनके व्यवहार को कैसे देखा जाये?

जब भावनाएं हावी हों तो फैसले राजनीतिक नहीं हो पाते

राजनीति में कोई धोखा खा ले अलग बात है, लेकिन कभी कोई ऐसा निर्णय नहीं लिया जाता जिसमें पहले से ही घाटा नजर आ रहा हो. हां, अगर भविष्य में फायदा नजर आये तो फौरी तौर पर राजनीति में घाटे का सौदा भी चलता है - सवाल है कि पशुपति पारस ने NDA छोड़ने का निर्णय किस हिसाब से लिया है? 

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यूपी में शिवपाल सिंह यादव का जो हाल हुआ, जाहिर है पशुपति कुमार पारस भी पूरी तरह वाकिफ होंगे. पहले भी उनके मन में ये भावना तो आती ही होगी कि लोक जनशक्ति पार्टी को खड़ा करने से लेकर मुख्यधारा में बनाये रखने में वो शिद्दत से मेहनत करते रहे, लेकिन वारिस तो बेटा ही बनेगा, भाई को पूछता कौन है. 

जैसे शिवपाल यादव, मुलायम सिंह यादव के प्रतिनिधि के रूप में समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच बने रहते थे, पशुपति कुमार पारस भी रामविलास पासवान की राजनीति में मजबूत स्तंभ की भूमिका में होते थे. मुलायम सिंह यादव तो यूपी में ही रहते थे, लेकिन रामविलास पासवान तो पूरी तरह दिल्ली के ही होकर रह गये थे, और ऐसे में पशुपति कुमार पारस ही बिहार में उनकी मौजूदगी का एहसास कराते थे.

लेकिन अस्पताल जाने से पहले ही रामविलास पासवान ने चिराग पासवान के हवाले सब कुछ कर दिया था, और अस्पताल से लौटे ही नहीं कि पशुपति कुमार पारस मन की कोई बात कह पाते. सारा कामकाज चिराग पासवान देखने लगे - और पशुपति कुमार पारस हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे. 

मौके की ताक में तो रहे ही, मौका मिल भी गया और मजबूत साथ भी. नीतीश कुमार को भी चिराग पासवान से विधानसभा चुनावों का बदला लेना था - सारे जरूरी इंतजाम कर देने के बाद हांडी चूल्हे पर चढ़ा दी गई. मुश्किल ये है कि अब तो पशुपति कुमार पारस को नीतीश कुमार की मदद भी नहीं मिल सकती, वो तो अभी NDA के साथ हैं. 

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पशुपति कुमार पारस अगर अपनी राजनीतिक हैसियत की ठीक ठीक पैमाइश कर पाते तो बीजेपी का ऑफर बड़े ही सहज भाव से स्वीकार कर सकते थे. राज्य सभा भेजने या किसी स्टेट में राज्यपाल बना देने का ऑफर कोई बुरा नहीं था.

पशुपति कुमार पारस का गुस्सा बीजेपी और चिराग पासवनान से बराबर हो सकता है. बीजेपी ने पशुपति कुमार पारस की बात नहीं मानी है, और चिराग पासवान उसकी सबसे बड़ी वजह हैं - ये तो ऐसा लगता है, जैसे वो चिराग पासवान के खिलाफ राजनीतिक नहीं बल्कि पट्टीदारी की लड़ाई लड़ने के लिए मैदान में कूद पड़े हों. 

भूमिका वोटकटवा से ज्यादा तो नहीं होने वाली

हो सकता है, पशुपति कुमार पारस भी सिर्फ छह सीटों पर ही अपने उम्मीदवार खड़ा करें, अगर वो अकेले अपनी पार्टी से चुनाव लड़ते हैं. अगर महागठबंधन के साथ मैदान में उतरते हैं तो जो सीटों बंटवारे में हिस्से में आएंगी, चुनाव तो उन्ही पर लड़ना होगा. 

हो सकता है, गुस्से के बावजूद वो बीजेपी के बजाय सिर्फ चिराग पासवान के उम्मीदवारों के खिलाफ ही चुनाव लड़ने का फैसला लें - लेकिन असर तो सीधे सीधे बीजेपी पर भी पड़ेगा ही. अगर चिराग पासवान और उनके उम्मीदवार चुनाव हार जाते हैं, तो नंबर तो बीजेपी का ही कम होगा जिसके लिए वो लड़ रही है. अबकी बार 400 पार.

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देर से ही सही, चिराग पासवान की चुनावी भूमिका का पेमेंट अटका हुआ था,  लेकिन अब मिल गया है - बीजेपी की तरफ से पशुपति कुमार पारस जो मिल रहा था, किसी और से उससे ज्यादा क्या मिलेगा?

क्या हाजीपुर में तेजस्वी यादव का साथ मिलेगा?

सुना है, पशुपति कुमार पारस भी महागठबंधन और INDIA कैंप के संपर्क में हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या उनको भी उतनी ही तवज्जो मिल रही होगी, जितना चिराग पासवान के लिए था. चिराग पासवान को तो 10 सीटों का ऑफर सुना गया था. बिहार की जीती हुई छह सीटों के अलावा दो और, और यूपी में भी दो सीटें. 

ऐसे में जबकि चिराग पासवान के साथ हाथ मिलाने में तेजस्वी यादव को फायदा नजर आ रहा हो, भला उनके खिलाफ वो पशुपति कुमार पारस का साथ देंगे? 

और कुछ हो न हो. चिराग पासवान को उपचुनावों में नाकामी ही हाथ लगी हो, लेकिन अब तो चिराग पासवान ने साबित कर ही दिया है कि वो अपने पिता रामविलास पासवान के रास्ते पर चल पड़े हैं. बीजेपी ने भी चिराग पासवान की ताकत को देखते हुए साथ लिया है, अगर वो विरोधी खेमे में चले जाते तो नुकसान उठाना पड़ सकता था.

दिल्ली में बीजेपी से दोस्ती कायम रखने के साथ साथ चिराग पासवान ने बिहार की राजनीति में लगातार सक्रिय रह कर ये संकेत भी दे दिया है कि आने वाले दिनों में वो रामविलास पासवान और नीतीश कुमार के डबल रोल में रहेंगे. 

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