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'राम-मय' मोदी के अगले 11 दिन क्या ठंडा कर देंगे अयोध्या न्‍योते की राजनीति को?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने हर काम को एक खूबसूरत इवेंट बदलने के लिए जाने जाते हैं. राम मंदिर तो उनके और 140 करोड़ भारतीयों का सपना रहा है. जाहिर है कि इस इवेंट पर तो उनके इस गुण का सर्वोत्तम रूप देखने को मिलना तय ही है. आज का 11 मिनट का संदेश अगले 11 दिनों की रूपरेखा से क्म नहीं है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले 11 दिनों में देश के माहौल को राममय बना देंगे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले 11 दिनों में देश के माहौल को राममय बना देंगे.

अब लगभग ये तय हो गया है कि अयोध्‍या के राम मंदिर समारोह में कौन आएगा और कौन नहीं. भाजपा और विपक्ष के बीच अयोध्‍या न्‍योते पर खींच-तान चलती रहेगी. लेकिन अब प्रधानमंत्री मोदी ने 11 मिनट का इमोशनल ऑडियो संदेश जारी करके अपने 11 दिन के एजेंडे को सार्वजनिक करके साफ कर दिया है कि वे अब लोगों को राजनीतिक कड़वाहट  से ध्‍यान हटाना चाहते हैं. इसका अपना फायदा है...

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सबसे पहले विपक्ष को न्योता दिया गया . विपक्ष राम मंदिर उद्घाटन समारोह में न आकर बीजेपी की चाल में ट्रैप हो गई. राजनीतिक बहसों के बीच पीएम मोदी एक समानांतर रणनीति पर काम करते रहे. वे माहौल को राममय बनाने के लिए लगातार कई राम भजनों और उनके गायकों को अपने ट्वीटर हैंडल पर प्रोमोट करते रहे. नतीजा ये हुआ कि पूरे देश में राम भजन बजने लगे हैं. लोग रील्स बना रहे हैं. यहां तक कि रैप में भी राम भजन सुनने को मिल रहा है. माहौल को भक्तिमय बनाने के लिए अब पीएम का अगला स्टेप है पूजा अर्चना शुरू करना. अपने 11 मिनट के ऑडियो संदेश में पीएम ने जो कुछ कहा है, आइये देखते हैं कि उसके क्या निहितार्थ निकल रहे हैं-

'जय-जय श्रीराम' से 'जय सिया राम' का सफर

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बीजेपी पर आरोप लगता रहा है कि उसने राम नाम को रेडिक्लाइज कर दिया है. कहा गया कि जय सियाराम को बीजेपी ने जय श्रीराम के युद्धघोष में बदल दिया है.  कांग्रेस नेता राहुल गांधी तो आरोप लगाते हैं कि बीजेपी-आरएसएस के लोग जय सियाराम के बजाय जय श्री राम बोलकर सीता देवी का अपमान करते हैं. जय सिया राम बोलने से भगवान राम और सीता देवी दोनों का सम्मान होता है. राहुल और कांग्रेस इस संबंध में कई बार बयानबाजी करते रहे हैं पर बीजेपी शुरू से ही दोनों नारों का इस्तेमाल करती रही है. मंदिर आंदोलन में जय श्रीराम का नारा बीजेपी के लिए विजयघोष था, जबकि जय सियाराम बोलना एक दूसरे के लिए अभिवादन रहा है. आज अपने 11 मिनट के ऑडियो संदेश की शुरुआत और समापन में पीएम मोदी ने करीब चार बार जय सियाराम बोलकर किया. जब तक राम मंदिर की लड़ाई के लिए जोश और जज्बे का सवाल था जयश्रीराम बोलकर रामभक्तों में ऊर्जा का संचार किया जाता रहा. मंदिर बन जाने पर तो जय सियाराम ही काफी है.

उपवास का संदेश

भारत में उपवास की अपनी महत्ता रही है. खासतौर से महिलाओं की आस्‍था में यह विशेष स्‍थान रखता है. राष्ट्रपिता गांधी जी ने तो उपवास को अपना हथियार बना लिया था. अंग्रेजी सरकार को अपने उपवासों से ही उन्होंने हिला दिया. उन्होंने अपने जीवनकाल में करीब 18 बार उपवासों का इस्तेमाल हथियार के रूप में किया. पीएम नरेंद्र मोदी को हमने नवरात्रि में नौ दिन का उपवास करते देखा है. अब राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में यजमान बनने के चलते वो 11 दिन का उपवास करने जा रहे हैं. जाहिर है कि उनके इस उपवास का संदेश बहुत दूरगामी होने वाला है. अब तक भारत में जितने भी प्रधानमंत्री हुए उन्होंने खुद को आधुनिक दिखाने के लिए किसी भी तरह के धार्मिक कर्मकांड से अलग रखा. पर नरेंद्र मोदी ने अपने भक्ति भाव को कभी छुपाया नहीं. उन्हें इस बात का डर नहीं रहा कि जनता क्या कहेगी, उल्टे उन्होंने इसे प्राइड के तौर पर लिया. उनका यह अंदाज हिंदुओं को उनके और नजदीक ले आता है. उन्होंने 11 दिन के उपवास के बारे में कहा, 

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'जैसा हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है, हमें ईश्वर के यज्ञ के लिए, आराधना के लिए, स्वयं में भी दैवीय चेतना जाग्रत करनी होती है. इसके लिए शास्त्रों में व्रत और कठोर नियम बताए गए हैं. जिन्हें प्राण प्रतिष्ठा से पहले पालन करना होता है. इसलिए आध्यात्मिक यात्रा की कुछ तपस्वी आत्माओं और महापुरुषों से मुझे जो मार्गदर्शन मिला है, उन्होंने जो यम नियम सुझाए हैं, उसके अनुसार मैं आज से 11 दिन का विशेष अनुष्ठान आरंभ कर रहा हूं. इस पवित्र अवसर पर मैं परमात्मा के श्रीचरणों में प्रार्थना करता हूं. ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों का पुण्य स्मरण करता हूं, और जनता जर्नादन, जो ईश्वर का रूप है, उनसे प्रार्थना करता हूं कि आप मुझे आर्शीवाद दें. ताकि मन से, वचन से, कर्म से, मेरी तरफ से कोई कमी न रहे.'

नमो एप पर लिखित में आशीर्वाद दें

पीएम अयोध्या में राम पूजन करने तो अकेले ही जाएंगे पर वो देश की 140 करोड़ जनता को अपने साथ जोड़ने का हर उपक्रम कर रहे हैं. अपने संदेश में जनता जनार्दन को ही वो ईश्वर का साकार रूप मान रहे हैं. इसलिए आम लोगों से आशीर्वाद मांग रहे हैं. ताकि किसी को ये न लगे कि राम मंदिर का कार्यक्रम सरकारी कार्यक्रम है, और यह कुछ खास लोगों या देश के बड़े लोगों का ही कार्यक्रम है. इसे जन जन का कार्यक्रम बनाने में उनका संदेश बहुत काम करने वाला है. अपने संदेश में देशवासियों से कहते हैं कि वो 22 जनवरी को नवनिर्मित राम मंदिर के गर्भगृह में 140 करोड़ देशवासियों की ऊर्जा के साथ प्रवेश करेंगे. मोदी कहते हैं कि 'साथियों हम सब इस सत्य को जानते हैं कि ईश्वर निराकार होता है.... पर जनता जनार्दन का रूप ही ईश्वर का साकार रूप होता है. यें मैने साक्षात देखा है. जब ईश्वर रूपी जनता शब्दों में अपनी भावनाएं व्यक्त करेगी तो मुझमें नई ऊर्जा का संचार होगा. आज मुझे आपके आशीर्वाद की आवश्यकता है. इसलिए मेरी प्रार्थना है कि मुझे आशीर्वाद के लिए शब्दों में या लिखित में अपनी भावनाएं जरूर  प्रकट करें. मुझे आशीर्वाद जरूर दें. आपके अशीर्वाद का एक एक शब्द मेंरे लिए शब्द नहीं  मंत्र है...आप अपने शब्दों को अपने भावों को सीधे नमो एप के माध्यम से मेरे पास सीधे भेज सकते हैं.'

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500 साल का धैर्य और बलिदानियों की याद

प्रधानमंत्री मोदी एक चतुर राजनेता हैं. वे किसी भी मुद्दे पर बात करते हुए बातों का बेस्‍ट कॉम्बिनेशन बनाना जानते हैं. एक ओर वे राम मंदिर समारोह के लिए अनुष्‍ठान की बात करते हैं. देशवासियों से इस कार्यक्रम से जुड़ाव रखने की अपील करते हैं. इस कार्यक्रम को लेकर अपनी धार्मिक निष्‍ठा बयान करते हैं. वहीं बिना देर किये वे मंदिर आंदोलन का जिक्र करना नहीं भूलते. जन्‍मभूमि पर मस्जिद बनने से अब तक के 500 साल के अतीत की याद दिला ही जाते हैं. अपने भाषण में 'बलिदानी घटनाओं' का जब वे जिक्र करते हैं तो सहज ही इस बात पर ध्‍यान दिला जाते हैं कि लालू यादव और मुलायम सिंह सरकारों में कारसेवकों के साथ क्या क्या हुआ था.

मौजूदा राजनीति का जरा भी उल्लेख नहीं

राम मंदिर आंदोलन का अतीत याद दिलाने के साथ पीएम मोदी इस बात की सावधानी बरतते हैं कि वे किसी भी आज की राजनीतिक बहसों का हिस्‍सा न बनें. परोक्ष या अपरोक्ष रूप से ही कहीं भी कोई राजनीतिक संदेश नहीं दिया. उन्‍होंने इस बात का जरा भी इशारा नहीं दिया कि मंदिर समारोह में शामिल होने से इनकार कर रही पार्टियों को लेकर वे क्‍या सोचते हैं. आवाज में भी इस तरह का भक्तिभाव सुनाई दिया मानो उनका रोम रोम राम-मय हो गया है. अपने संदेश में जाति, धर्म, लिंग, भाषा और दलगत हितों की गंध नहीं आ रही थी. समझा जा सकता है कि वे मंदिर समारोह के प्रमुख यजमान होने के नाते खुद को और पूरे आयोजन को किसी भी तरह की विघ्‍न-बाधा से दूर करने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं. आज नासिक में पंचवटी स्‍थान से जिस तरह उन्‍होंने राम से जुड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों की शुुरुआत की है, वे अगले 11 दिन इस बात पर लोगों का ध्‍यान बनाए रखेंगे कि उनके राज में ही 'राम-राज' की झलक दिखाई दे. क्‍या वे इसमें कामयाब हो पाते हैं, समय ही बताएगा.

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