लगभग 10 बरस पहले प्रशांत किशोर का नाम पहली बार राजनीतिक गलियारों में छिटपुट चर्चाओं में आया. 2013 में उनका प्रभाव दिखना शुरू हुआ और 2014 में नतीजा. प्रशांत किशोर एक ही झटके में स्टार भी बने और मैनेजर भी. उनपर कहीं से भी भाजपा का टीका नहीं लगा. प्रशांत किशोर अब राजनीतिक गलियारों में प्रशांत मैनेजर थे.
फिर 2015 में नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद से गठबंधन किया और प्रशांत किशोर को अपना चुनाव मैनेजर बनाया. एक धमाकेदार जनादेश के साथ नीतीश चुनाव जीते और प्रशांत किशोर चुनाव जिताने के एक कुशल मैनेजर के तौर पर स्थापित हो गए. पहले जो संदेह था वो अब यकीन में बदल चुका था. राजनीतिक पार्टियों को लगने लगा कि इस व्यक्ति के पास कोई वशीकरण मंत्र है ज़रूर. अपनी मेहनत पर कम भरोसा करने वालों की कतारें प्रशांत के दफ्तर पर दिखने लगीं. प्रशांत राजनीतिक खिलाड़ियों के कुशल कोच बनते चले गए.
यह शुद्ध रूप से एक बिजनेस है, मैनेजमेंट है, मार्केटिंग है. इसका राजनीति से कोई वास्ता नहीं... न विचारधारा से, न सिद्धांत से, न टिकने से और न संघर्ष से. एक बिजनेस डील होती है. इस डील से चुनाव का मैनेजमेंट होता है और फिर एक चेहरे को ऐसे मार्केट किया जाता है कि लोग उसपर भरोसा करके जिताने में लग जाते हैं.
प्रशांत इस मामले में कोलंबस नहीं हैं. इस चुनाव मैनेजमेंट की विधा का जन्म पश्चिम में बहुत पहले हो चुका था. अमेरिका और कई यूरोपीय देश चुनाव में प्रबंधन को घुसा चुके थे. भारत के लिए यह नया था. प्रशांत इसके पायनियर बने. ऐसा नहीं है कि उनसे पहले राजनीति केवल सिद्धांतों पर लड़ी-खड़ी होती रही. लेकिन पहले ये पार्टियों के आंतरिक अनुभवों और नेतृत्वकर्ताओं की दक्षता पर आधारित था. अब इसमें थर्ड पार्टी आ चुकी थी. अराजनीतिक थर्ड पार्टी.
लेकिन राजनीति में एक गजब का आकर्षण होता है. जीतने का, बदलने का, शक्ति का आकर्षण. यह बहुत स्वाभाविक है. इसमें कुछ भी गलत नहीं. बल्कि राजनीति में जितने पक्ष बनते हैं, राजनीति उतनी ही लोकतांत्रिक होती जाती है. बहुलकों की यह विविधता लोकतंत्र के विन्यास को और अधिक समावेशी और व्यापक बनाती है.
कुछ अशांत प्रश्न
अब से एक साल पहले लल्लनटॉप को दिए एक इंटरव्यू में प्रशांत किशोर ने कहा था कि वो जीवनभर रणनीतिकार नहीं रहना चाहते. वो सक्रिय राजनीति में आना चाहते हैं. अब कांग्रेस से जुड़ने की संभावनाओं का अंत होने के बाद उन्होंने जन सुराज का नारा दे दिया है और बिहार को अपनी प्रयोगशाला बनाते हुए सक्रिय राजनीति में आने की, जनमानस को समझने की घोषणा कर दी है.
हालांकि उन्होंने राजनीतिक पार्टी या उसका नाम घोषित नहीं किया है लेकिन इस घोषणा में बहुत कुछ ऐसा है जिसमें आगे एक पार्टी बनने के संकेत निहित हैं. मसलन, वो लोगों से मिलेंगे और अगर लोग कहेंगे कि पार्टी बनानी चाहिए तो पार्टी बनेगी. और लोग तो कहेंगे ही. यही पैटर्न कांशीराम का भी था, केजरीवाल और जगन रेड्डी का भी. वो अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत चंपारण से कर रहे हैं जो बिहार में महात्मा गांधी के आंदोलन का काशी है.
लेकिन प्रशांत अगर पिछले कुछ समय से अपनी राजनीति खुद खड़ी करने के प्रति इतने स्पष्ट थे तो फिर कांग्रेस के आंगन में अपनी प्रस्तुति क्यों दे रहे थे. प्रशांत अगर आज कांग्रेस का हिस्सा हो चुके होते तो क्या बिहार में राजनीति के प्रयोग करने और वहां की मरुभूमि को उर्वरक करने की तत्काल आवश्यकता टल जाती.
क्या प्रशांत कांग्रेस यह सोचकर जा रहे थे कि कांग्रेस और गांधी परिवार पूरी पार्टी की बागडोर और ऑब्सेल्यूट कंट्रोल उनके हाथों में सौंप देती और वहां वो अपनी मर्जी से राज्य, रणनीति और रणबांकुरे चुन पाते. निःसंदेह, प्रशांत के लिए कांग्रेस एक अहम मौका था. राज्यों में अपनी प्रबंधन क्षमता को साबित कर चुके प्रशांत राष्ट्रीय स्तर पर खुद को कांग्रेस के ज़रिए ही स्थापित कर सकते थे. सबसे ज्यादा घिरी और कमजोर पड़ती पार्टी में जान फूंकना उनको अजेय सेनापति बना सकता था. लेकिन इसके लिए कांग्रेस को समझने, पार्टी का विश्वास जीतने और पार्टी को साथ लेकर चलते की ज़रूरत होगी.
प्रशांत ने और कांग्रेस ने जिस दिन अलगाव की घोषणा की, उस दिन भी राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा थी कि प्रशांत अपनी पार्टी बना सकते हैं. वो तमाम राजनीतिक दलों से भटके, झटके हुए या असंतुष्ट हो चले लोगों को लामबंद करके एकसाथ लाने की कोशिश कर रहे हैं. तो क्या प्रशांत आखिर तक स्पष्ट नहीं थे कि उन्हें किसके साथ और कैसी राजनीति करनी है.
यह कैसा असमंजस है जो प्रशांत को एक तरफ कांग्रेस सुधार की संजीवनी घिसने के लिए प्रेरित करता है, दूसरी ओर वो केसीआर के केवट बनने को भी तैयार दिखते हैं और तीसरी ओर वो अपनी राजनीति खुद करने की तैयारी भी कर रहे होते हैं. बाहर खड़े राजनीतिक विश्लेषकों के पास ऐसे में एक ही सवाल होता है- पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है.
तो क्या यह प्रशांत की अतिमहत्वाकांक्षा है कि वो बहुत जल्दी बहुत कुछ बदल देने के लिए बेताब हैं. उन्होंने एक के बाद एक पार्टियों को चुनाव पार कराया. जदयू से मिले लेकिन अब प्रशांत का कहना है कि जदयू ने उन्हें पार्टी से निकाल बाहर किया. कांग्रेस से जुड़ने के प्रादेशिक और प्रबंधकीय अवसरों के बाद इसबार वो पार्टी से जुड़ने वाले थे. लेकिन वो चर्चा किसी नतीजे तक पहुंच नहीं पाई. इधर केसीआर से वो मिल ही चुके हैं. और अब बिहार को अपनी राजनीति की प्रयोगशाला की घोषणा उन्होंने कर दी है.
राजनीति में (तात्कालिक जातीय लाभ को छोड़ दें) समय देना पड़ता है. चाहे पार्टी बनाएं या किसी पार्टी में आएं. बहुत कुछ सीखना पड़ता है, संघर्ष करना पड़ता है. समझना पड़ता है. राजनीति घर के खाने जैसा है. यहां स्वाद, बर्तन और जगह जल्दी-जल्दी बदले नहीं जा सकते. प्रशांत की छवि इससे इतर स्विगी, ज़ोमैटो वाली है. उनका आकलन करने वाले उनमें राजनीतिक स्थिरता और स्पष्टता का अभाव पाते हैं.
राजनीति के किशोर
अभी तक बाहर से खेल रहे प्रशांत अब राजनीति के अखाड़े में उतरने की घोषणा कर चुके हैं. लेकिन मैनेजमेंट और बात है, राजनीति और. और राजनीति में कोई कितने भी आधुनिक और नए फार्मूले लेकर आए, कुछ एक बुनियादी चीजें बनानी ही पड़ती हैं.
सबसे पहली चीज है राजनीतिक होने की छवि. प्रशांत की बड़े राजनीतिक पतों से लेकर आमजन तक जो छवि है, वो एक चुनाव प्रबंधक की है. इस छवि से आगे बढ़कर प्रशांत को राजनीति करने वाले और नेतृत्व क्षमता वाले व्यक्ति की छवि बनानी होगी. राजनीति में चलने के लिए नेता बनना, नेता लगना ज़रूरी है.
दूसरी बड़ी बात है स्थिरता. प्रशांत को राजनीति करनी है तो स्थिरता लानी होगी. जो भी प्रयास वो शुरू करें, उसके प्रति आशान्वित रहना होगा. कठिन और कमज़ोर पलों में भी अपने विचार पर यकीन करना होगा, उसे समय देना होगा. किसी हार या व्यापार से विचलित हुए बिना अपने काम में लगे रहना होगा. स्थिरता के बिना न तो वो लंबी कूद के खिलाड़ी बन सकेंगे और न ऊंची कूद के.
प्रशांत अगर ये दो काम कर पाते हैं तो राजनीति उनके लिए एक मफीद, मुनासिब जगह है.