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प्रशांत किशोर को केजरीवाल समझने की भूल मत कीजिये, पिक्‍चर अभी शुरू हुई है

राजनीति में कदम रखने वाले हर नये खिलाड़ी में अरविंद केजरीवाल का अक्स ही नजर आता है. प्रशांत किशोर के साथ भी ऐसा हो रहा है. अरविंद केजरीवाल से सभी को बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन लोग निराश हुए - अब किसी बुरे अनुभव की आशंका से प्रशांत किशोर को मौका दिये जाने से वंचित रखना भी तो अच्छा नहीं होगा.

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प्रशांत किशोर को लेकर अभी निराश होने की कोई जरूर नहीं है. अरविंद केजरीवाल से सबक लेने का उनके पास पूरा मौका है.
प्रशांत किशोर को लेकर अभी निराश होने की कोई जरूर नहीं है. अरविंद केजरीवाल से सबक लेने का उनके पास पूरा मौका है.

प्रशांत किशोर अब प्रत्यक्ष राजनीति में कदम रखने जा रहे हैं. अभी तक परदे के पीछे से काम कर रहे थे. चेहरा कोई और होता था, तैयारियां और जरूरी इंतजामात वो खुद करते थे. कभी 'बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार हैं' का नारा देने वाले प्रशांत किशोर की मानें तो अब सब कुछ वो खुद ही करेंगे, लेकिन चेहरा नहीं बनेंगे. चेहरा अब भी कोई और होगा, और सिर्फ एक ही चेहरा नहीं होगा, बल्कि चेहरे बदलते रहेंगे.  

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10 साल पहले देश के सबसे बड़े चुनाव रणनीतिकार के तौर पर सामने आये प्रशांत किशोर 2 अक्टूबर 2022 को बिहार में जन सुराज यात्रा पर निकले थे - और ठीक दो साल बाद 2 अक्टूबर को ही वो जन सुराज के नाम से राजनीतिक दल के रूप में लॉन्च करने जा रहे हैं. 

जन सुराज के संस्थापक के रूप में अपनी पदयात्रा के दौरान प्रशांत किशोर गांव-गांव पहु्ंचकर, बिहार के लोगों से मिलकर लगातार युवाओं के पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ स्थानीय मुद्दे भी उठा रहे हैं - और इस दौरान अक्सर ही बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आरजेडी नेता लालू यादव का परिवार खासकर तेजस्वी यादव उनके निशाने पर देखे गये हैं. 

पीके के नाम से मशहूर देखा जाये तो प्रशांत किशोर भी राजनीति में बिलकुल नये खिलाड़ी के तौर पर आ रहे हैं, जैसे कभी अरविंद केजरीवाल आये थे. अरविंद केजरीवाल भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के रास्ते राजनीति में आये थे, और प्रशांत किशोर भी अपनी यात्रा को आंदोलन के तौर पर ही पेश कर रहे हैं - दोनो में एक बात कॉमन है दोनो ही राजनीति और उसकी मदद से हालात बदलने की बात कर रहे हैं. 

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औरों से कितना अलग होगी प्रशांत किशोर की राजनीतिक पार्टी

हाल ही में इंडिया टुडे के साथ बातचीत में प्रशांत किशोर ने कहा था, 'मैं लिखित में दे देता हूं... 2025 के चुनावों में जनसुराज अपने दम पर जीत कर आएगा... और अगर न आये तब भी आप मुझसे पूछ लीजिएगा.'

प्रशांत किशोर जो भी दावा करें, ये काम तो अरविंद केजरीवाल भी नहीं कर पाये थे. अरविंद केजरीवाल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को चुनाव में हरा जरूर दिया था, लेकिन आम आदमी पार्टी अपने दम पर बहुमत नहीं हासिल कर पाई थी. बीजेपी के बाद दूसरे नंबर पर थी, और तीसरे नंबर पर आई कांग्रेस के साथ पहली बार सरकार बनाई थी. 

जनसुराज यात्रा के दौरान पूरे बिहार ने अपना संगठन खड़ा करने के बाद प्रशांत किशोर ने जन सुराज के पदाधिकारियों से कह रहे थे, आप सभी हमसे मिलने नहीं आए हैं, क्योंकि हम आपसे आपने गांवों में आपके घर पर मिले थे. 

प्रशांत किशोर के मुताबिक, करीब एक करोड़ सदस्य 2 अक्टूबर को गांधी जयंती को मौके पर जन सुराज की नींव रखेंगे. पहले दिन 1.50 लाख लोगों को पदाधिकारी नामित करने के साथ शुरुआत होगी. जनसुराज के अध्यक्ष का कार्यकाल एक साल का होगा - और पांच साल की अवधि में अलग अलग तबके से 5 अध्यक्ष चुने जाएंगे. जिनमें पहला अध्यक्ष दलित समाज से होगा.

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ध्यान देने वाली बात ये है कि प्रशांत किशोर ने नेतृत्व की दौड़ से खुद को अलग कर लिया है. बताते हैं कि अध्यक्ष पद का दावा वे लोग ही कर सकते हैं, जो पार्टी में 5000 लोगों को लाने में सक्षम हैं. जन सुराज की 7 सदस्यों वाली अधिकार प्राप्त समिति इस पर अंतिम फैसला लेगी. 

प्रशांत किशोर का कहना है कि समाज में 5 समूह हैं सामान्य, ओबीसी, ईबीसी, एससी, एसटी और मुस्लिम. दलित समुदाय सबसे अधिक वंचित हैं, इसलिए जन सुराज का पहला अध्यक्ष दलित वर्ग से ही आएगा. 

केजरीवाल के पास आंदोलन के नेतृत्व का अनुभव था, पीके के पास नहीं है

जन सुराज कार्यकर्ताओं से प्रशांत किशोर कहते हैं, आपने खुद को उन लोगों के साथ जोड़ लिया है जो बिहार के लिए बेहतर विकल्प के लिए आंदोलन कर रहे थे, लेकिन विकल्प के अभाव में वे एक साथ आ गये हैं.

ये ठीक है कि अरविंद केजरीवाल ने जेपी की तरह जेल भरो आंदोलन नहीं चलाया, और न ही इमरजेंसी जैसे हालात का सामना किया, लेकिन राजनीति में एंट्री से पहले सड़क पर आंदोलन तो खूब किये थे. 

प्रशांत किशोर दो साल से यात्रा कर रहे हैं. लोगों के बीच बने हुए हैं. उनको वस्तुस्थिति से अवगत करा रहे हैं. समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व उनको बारे में कुछ नहीं सोच रहा है. उनके बच्चों के भविष्य के बारे में नहीं सोच रहा है. 

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प्रशांत किशोर के भाषणों में ज्यादा जोर नीतीश कुमार के उम्रदराज होने, कांग्रेस के किसी काम का न होने और तेजस्वी यादव के नौवीं फेल होने जैसे बातें सुनने को मिलती हैं - लोगों को ये सब सुनना अच्छा लगता है, लेकिन वोट देने का ये आधार नहीं बनता - हां, प्रशांत किशोर ने बदलाव की बात की है, लेकिन अरविंद केजरीवाल की तरह अब तक सपनों जैसी कोई उम्मीद नहीं जगाई है. 

पीके के सामने राजनीतिक विश्वसनीयता का संकट जरूर है

अरविंद केजरीवाल जब राजनीति में आये थे, तब तक लोगों को उन पर बहुत भरोसा हो चुका था. प्रशांत किशोर के मामले में अभी ऐसा नहीं कहा जा सकता. पीके के बारे में लोग मानते हैं कि वो पैसे लेकर नेताओं का काम करते हैं. और काम के लिए बहुत पैसा लेते हैं. चुनाव कैंपेन करके बहुत कमाई की है. पीके को कितने पैसे मिले, या कहां से मिले, लोगों के मन में हमेशा ये सवाल रहता है - और मान कर चलना चाहिये कि चुनावों में ये सवाल जरूर पूछा जाएगा और पीके को जवाब भी देने होंगे. 

एक बार प्रशांत किशोर ने कहा था, जब वो जेडीयू के उपाध्यक्ष हुआ करते थे, अगर मैं सीएम और पीएम बनने में मदद कर सकता हूं, तो बिहार में युवाओं को मुखिया और एमएलए, एमपी भी बना सकता हूं. उनके बयान के बाद जेडीयू के नेता उन पर टूट पड़े थे, लेकिन वो गलत क्या बोल रहे थे. यही तो उनकी यूएसपी है - और ये बात वो हमेशा याद रखें तो ही अच्छा रहेगा. 

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ठीक है पीके अध्यक्ष नहीं होंगे, लेकिन जन सुराज का चेहरा कौन होगा?

पीके का कहना है जन सुराज की अगुवाई वो नहीं करेंगे, बल्कि नेता अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्र से चुने जाएंगे, जो राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए लोगों की ताकत को मजबूत करेंगे.

व्यावहारिक तौर पर ये ठीक भी है. एक बात तो तय है पीके के लिए खुद मुख्यमंत्री बनना मुश्किल होगा. पीके को पहले ही मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करना होगा. चुनाव लड़ना और लड़ाना काफी अलग होता है. अभी तक पीके नेताओं के नाम पर सफल होते आये हैं. हो सकता है बिहार में हालात वैसे ही हों, जैसी परिस्थितियों में पीके अपने क्लाइंट को चुनाव जिताते रहे हैं, लेकिन चेहरा बहुत महत्वपूर्ण होगा.

अगर बीजेपी और कांग्रेस ऐसा करते हैं तो भी लोगों के सामने मोदी या राहुल गांधी का चेहरा होता है, या फिर उनके स्थानीय नेता भी मोर्चे पर दिखाई देते हैं और लोगों को लगता है, उनमें से ही कोई होगा. 

बिहार और दिल्ली की राजनीतिक परिस्थितियां बिलकुल अलग हैं

दिल्ली में भी पूर्वांचल के लोग हैं, लेकिन देश भर से आये अलग अलग तरीके के लोग रहते हैं. बिहार में जातिवाद की जड़ें गहराई तक जुड़ी हैं. वहां जाति के आधार पर ही राजनीतिक समीकरण बने हुए हैं, और धर्म का भी प्रभाव है.

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अब तक बिहार में लालू यादव के एम-वाई समीकरण और नीतीश कुमार के लव-कुश समीकरण का बोलबाला रहा है. प्रशांत किशोर के लिए ब्राह्मण होकर लालू यादव और नीतीश कुमार के किले को भेद पाना मुश्किल है. लालू की जगह अब तेजस्वी मैदान में उतर चुके हैं. और नीतीश के कंधे के सहारे बीजेपी पैर जमाने की कोशिश कर रही है. 

ये तो नहीं कह सकते कि अरविंद केजरीवाल के आने से दिल्ली में कुछ भी नहीं बदला, लेकिन ये भी सच है कि जो सपने दिखाये थे, जो अपेक्षाएं थीं, जो उम्मीदें थी वैसा कुछ भी नहीं हुआ. अरविंद केजरीवाल ने भी परंपरागत राजनीति की राह पकड़ ली - और नतीजा सामने है. 

जरूरी नहीं कि प्रशांत किशोर भी अरविंद केजरीवाल की तरह निराश करें, इसलिए जरूरी हो जाता है कि प्रशांत किशोर को भी मौका मिलने से पहले ही खारिज नहीं करना चाहिये. 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में पुष्पम प्रिया भी मिसाल हैं, और मणिपुर की आयरन लेडी कही जाने वाली इरोम शर्मिला भी आपको याद होंगी ही - निश्चित तौर पर आगे बढ़ने से पहले प्रशांत किशोर को भी उनके अनुभवों से सीखने की कोशिश करनी चाहिये.
पीके का आइडिया अच्छा है. लेकिन लोगों को समझ में आने में थोड़ा वक्त लगेगा. हम अपने और अपने बच्चों के लिए एक ऐसे सिस्टम तैयार करेंगे, जिससे लोग आश्चर्यचकित रह जाएंगे. ऐसा इसलिए, क्योंकि जिन्हें पहले 'बिहारी' कहकर अपमानित किया जाता था, वे ही शानदार सिस्टम को तैयार कर सकते थे.

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