अयोध्या में 22 जनवरी को राम लला की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है, लेकिन उससे पहले ही 14 जनवरी से कांग्रेस नेता राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा पर निकल रहे हैं. ये राहुल गांधी की इस तरह की दूसरी लंबी यात्रा है, जो आम चुनाव के ऐन पहले शुरू हो रही है.
कांग्रेस सहित विपक्ष के पूरे INDIA ब्लॉक ने राम मंदिर उद्घाटन समारोह का ये कहते हुए बहिष्कार कर दिया है कि ये कोई धार्मिक आयोजन न होकर, भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय कार्यक्रम है. प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 दिन का अनुष्ठान शुरू कर चुके हैं, और कांग्रेस समारोह का न्योता ससम्मान अस्वीकार करने के बाद अपने फैसले को सही साबित करने में जुट गई है.
अयोध्या समारोह को लेकर सोशल मीडिया साइट X पर कांग्रेस की तरफ से कई सवाल पूछे गये हैं, 'हम जानना चाहते हैं... मंदिर में कौन आएगा और कौन नहीं, ये बताने वाले आप कौन हैं? प्राण प्रतिष्ठा में VVIP एंट्री लगाने वाले आप कौन हैं? कैमरों की फौज लेकर आधी-अधूरी प्राण प्रतिष्ठा करने वाले आप कौन हैं? विज्ञापन में भगवान राम को उंगली पकड़ाकर चलाने वाले आप कौन हैं? क्या आप भगवान से ऊपर हैं?'
पहले ये यात्रा इम्फाल के पैलेस ग्राउंड से शुरू होनी थी. लेकिन, राज्य की बीजेपी सरकार की इजाजत न मिलने के कारण अब ये यात्रा मणिपुर के ही थौबल जिले के खोंगजोम से शुरू होने जा रही है. पहले तो सरकार ने यात्रा की अनुमति देने से ही इनकार कर दिया था, लेकिन बाद में सशर्त परमिशन दे दी है.
यात्रा को लेकर राहुल गांधी एक फेसबुक पोस्ट में लिखते हैं, 'मेरे प्यारे बब्बर शेरों और शेरनियों, कमर कस कर तैयार हो जाओ - अन्याय के विरुद्ध, ये है न्याय का युद्ध.' और उसके साथ ही मिस्ड कॉल देकर भारत जोड़ो यात्रा से जुड़ने की अपील की है.
राहुल गांधी ने यात्रा पर निकलने से पहले ये भी समझाने की कोशिश की है कि वो भारत जोड़ो न्याय यात्रा किसे इंसाफ दिलाने के लिए कर रहे हैं. राहुल गांधी यात्रा के मकसद के तीन आयाम बताया है.
1. आर्थिक न्याय: बेरोजगार युवाओं, कर्ज में डूबे किसानों और महंगाई की मार के बीच पढ़ाई, कमाई और दवाई के लिए संघर्ष करते गरीबों के साथ न्याय.
2. सामाजिक न्याय: वंचितों के अधिकारों और बेटियों के आत्मसम्मान के साथ न्याय.
3. राजनीतिक न्याय: स्वतंत्रता, समानता और मानवीय गरिमा के आदर्शों के साथ न्याय.
पहले लगा था कि राहुल गांधी सिर्फ मणिपुर में हिंसा के शिकार लोगों को इंसाफ दिलाने के लिए यात्रा पर निकल रहे हैं, लेकिन अब लग रहा है कि इसमें 2024 के आम चुनाव का पूरा एजेंडा शामिल किया गया है. उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में सबसे ज्यादा वक्त गुजारने के फैसले के पीछे भी यही वजह लगती है.
INDIA ब्लॉक के सहयोगी दल भारत जोड़ो न्याय यात्रा को लेकर नाराज बताये जाते हैं. विपक्षी गठबंधन के प्रमुख सहयोगी दल जेडीयू के नेता केसी त्यागी तो कांग्रेस की मंशा पर ही सवाल उठाते देखे गये. केसी त्यागी का कहना था कि चुनाव के ऐन मौके पर ऐसी यात्रा अकेले निकाल कर कांग्रेस नेतृत्व क्या जताने की कोशिश कर रहा है? क्या ये यात्रा INDIA ब्लॉक की तरफ से नहीं निकाली जा सकती थी? आखिर कांग्रेस ने यात्रा फाइनल करने से पहले सहयोगी दलों से राय मशविरा क्यों नहीं किया?
1. विपक्ष के अभियान के लिए यात्रा लॉन्चपैड हो सकती है
कांग्रेस के विपक्षी साथी अभी जो भी कहें, लेकिन राहुल गांधी की पिछली भारत जोड़ो यात्रा के बाद से देश की राजनीति में जिस तरह से माहौल बदला है, माना जा सकता है कि ये यात्रा भी फायदेमंद होगी - और हां, इस बार फायदा अकेले कांग्रेस को नहीं मिलने जा रहा है.
राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान ही कांग्रेस की हिमाचल प्रदेश में सरकार बनी थी, और उसके बाद दक्षिण के दो राज्यों कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस चुनावी जीत हासिल कर आत्मविश्वास से लबालब है - मणिपुर से शुरू होने जा रही न्याय यात्रा पूरे विपक्ष के लिए फायदेमंद हो सकती है.
पिछली बार ये देखने को मिला था कि विपक्ष के कुछ चुनींदा दलों के नेता ही राहुल गांधी के साथ यात्रा में शामिल हुए. डीएमके नेता स्टालिन ने तो यात्रा को रवाना ही किया था, बाद में भी अपनी बहन और सांसद कनिमोड़ी को यात्रा में शामिल होने के लिए भेजा था. वैसे ही महाराष्ट्र में सुप्रिया सुले और आदित्य ठाकरे से लेकर फारूक अब्दुल्ला तक जगह जगह शामिल होते रहे, लेकिन अखिलेश यादव और नीतीश कुमार ने घोषित तौर पर दूरी बना ली थी.
न्याय यात्रा के जरिये तो लगता है राहुल गांधी ने ऐसे विपक्षी नेताओं के पाले में ही गेंद डाल दी है. अगर अखिलेश यादव और नीतीश कुमार जैसे नेता पहले की तरह ही फिर परहेज करते हैं, तो मैसेज तो यही जाएगा कि विपक्ष एकजुट नहीं है - क्या INDIA ब्लॉक के लिए ये चुनावी लिहाज से नुकसान पहुंचाने वाला नहीं होगा?
एक बार सीटों का बंटवारा हो जाने के बाद तो सब कुछ ठीक हो जाना चाहिये - अगर चुनाव काल में गिले-शिकवे किनारे रख कर विपक्षी दलों के नेता एक बार सड़क पर साथ उतरने को तैयार हो जायें तो सबका कल्याण हो सकता है.
2. राहुल गांधी INDIA ब्लॉक को सुर्खियों में तो बनाये ही रखेंगे
2024 के आम चुनाव से पहले शुरू होने जा रही इस यात्रा सबसे ज्यादा फायदा तो विपक्ष को ये मिलेगा कि राहुल गांधी किसी न किसी बहाने अपनी यात्रा को लगातार सुर्खियों में बनाये रखेंगे, और बीजेपी की तरफ से प्रतिक्रिया आती रहेगी.
जैसे पहले वाली भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गांधी कभी किसी को गले लगाते, कभी जूते के फीते बांधते देखे गये थे, आगे भी वैसा ही करेंगे - और मान कर चलना चाहिये कि मीडिया में ऐसी चीजों की चर्चा तो होगी ही.
जगह जगह राहुल गांधी प्रेस कांफ्रेंस भी करेंगे, और कुछ न कुछ ऐसा तो बोलेंगे ही कि बीजेपी को प्रतिक्रिया देनी पड़े - देखा जाये तो रोजाना कुछ देर के लिए एजेंडा तो राहुल गांधी ही सेट करेंगे - और बीजेपी हमले के बहाने ही सही, जवाब में सफाई दे रही होगी.
3. राहुल गांधी वोट तो विपक्ष के लिए ही मांगने वाले हैं
विपक्षी दलों के एकजुट होने में फिलहाल सबसे बड़ा रोड़ा तो सीटों का बंटवारा ही लग रहा है. लेकिन एक बार सीट शेयरिंग का मामला सुलझ जाये तो मिल कर साथ चलने में किसी को कोई दिक्कत तो नहीं होनी चाहिये.
कुछ ही दिनों में चुनावी माहौल जोर पकड़ चुका होगा. हो सकता है चुनाव तारीखों की घोषणा भी कर दी जाये, और वैसे माहौल में ये यात्रा तो चुनावी रोड शो जैसी ही होगी. रास्ते भर राहुल गांधी लोगों से केंद्र की बीजेपी और नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ ही तो वोट मांग रहे होंगे.
अब ऐसा तो होने से रहा कि राहुल गांधी किसी ऐसे इलाके से गुजर रहे हैं जो कांग्रेस नहीं बल्कि विपक्ष के किसी और राजनीतिक दल के उम्मीदवार का चुनाव क्षेत्र हो. तब भी राहुल गांधी वोट तो विपक्षी उम्मीदवार के पक्ष में ही मांगेंगे - ऐसा तो नहीं ही कहेंगे कि अगर कांग्रेस का उम्मीदवार नहीं है तो लोग बीजेपी को वोट दे दें!
4. कांग्रेस ज्यादा फायदा जरूर मिल सकता है
राहुल गांधी की न्याय यात्रा कांग्रेस के लिए तो हर हिसाब से फायदेमंद होगी. जैसे भारत जोड़ो यात्रा से कांग्रेस कार्यकर्ताओं का जोश हाई हो गया था, एक बार फिर वैसी ही संभावना जताई जा सकती है.
ये ठीक है कि हिमाचल प्रदेश से लेकर तेलंगाना तक चुनाव नतीजों के पीछे अलग अलग कई फैक्टर रहे, लेकिन नतीजे अलग भी तो हो सकते थे. कर्नाटक में अगर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में मल्लिकार्जुन खरगे के अध्यक्ष बन जाने से कुछ सकारात्मक संदेश गया तो तेलंगाना में भी जोश में इजाफा देखने को मिला.
उत्तर प्रदेश कांग्रेस के नेताओं से बातचीत में तो राहुल गांधी तेलंगाना के नेताओं की मिसाल दे रहे थे कि कैसे वहां कई नेताओं में मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रही. निश्चित रूप से चुनाव जीतने में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का बढ़ा हुआ हौसला एक कारण तो होगा ही.
कांग्रेस कार्यकर्ता सक्रिय होंगे और काम में जुट जाएंगे तो संगठन मजबूत होगा - और चुनावी राजनीति संगठन का मजबूत होना तो सबसे बड़ी ताकत होती है.
5. बीजेपी के खिलाफ हमले की धार तेज होगी
राहुल गांधी तो वैसे भी पूरे साल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ हमलावर देखे जाते हैं, ऐसे मौकों पर तो आक्रामक होना स्वाभाविक ही है. वो तो मौके बेमौके प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना का बहाना ढूंढ ही लेते हैं - चुनावों में तो पूरे विपक्ष का ये हक बनता है.
विपक्ष के हिसाब से देखें तो राम मय हो चुके देश में ये न्याय यात्रा बीजेपी के खिलाफ INDIA ब्लॉक के अखंड ज्योति की लौ की तरह अलग जगाने जा रही है - अब विपक्ष इसका फायदा उठा पाता है या वक्त जाया होने देता है ये उसकी नीयत जाने और नीति जाने.