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राहुल गांधी गांठ बांध लें - ये 5 मुद्दे तो 2024 चुनाव में भी नहीं चलने वाले

राहुल गांधी ने विधानसभा चुनावों में जातिगत जनगणना का मुद्दा जोर शोर से उठाया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ निजी हमले जारी रखे. 'पनौती' से लेकर उद्योगपति गौतम अडानी से जोड़ते हुए 'जेबकतरा' तक बता डाला. अब तो साफ हो चुका है, 2024 में तो ये सब बिलकुल नहीं चलेगा.

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राहुल गांधी के लिए बेहतर यही होगा कि मोदी पर निजी हमलें से बचें - 2024 में तो बिलकुल नहीं चलेगा
राहुल गांधी के लिए बेहतर यही होगा कि मोदी पर निजी हमलें से बचें - 2024 में तो बिलकुल नहीं चलेगा

राहुल गांधी ने जैसे 2018 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत का क्रेडिट लिया था. जिस तरीके से 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस की हार की जिम्मेदारी ली थी, 2023 के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों ने क्रेडिट के साथ जिम्मेदारी लेने का भी मौका दे दिया है. 

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राहुल गांधी चाहें तो तेलंगाना में कांग्रेसी की जीत का क्रेडिट ले सकते हैं, और वैसे ही राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की हार की जिम्मेदारी भी वो ले सकते हैं - अब ये राहुल गांधी पर ही निर्भर करता है कि वो क्रेडिट ज्यादा लेते हैं या जिम्मेदारी? 

चुनावों से पहले जब संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण बिल आया था, तभी राहुल गांधी ने ओबीसी आरक्षण का मुद्दा उठाया, केंद्र सरकार में तैनात ओबीसी सचिवों की संख्या पर सवाल खड़े किये - और पूरे चुनाव के दौरान जातिगत जनगणना की मांग करते रहे. 

राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फिर से निजी तौर पर टारगेट किया, और 'पनौती' से लेकर 'जेबकतरा' तक बता डाला. चुनाव नतीजे बता रहे हैं कि लोगों ने ऐसी बातों पर बिलकुल भी ध्यान नहीं दिया है - 2024 के चुनाव के हिसाब से राहुल गांधी के लिए ये सबसे बड़ी नसीहत है.

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1. जातिगत जनगणना में लोगों की दिलचस्पी नहीं 

बिहार में हुई जातिगत गणना की रिपोर्ट आने के बाद बीजेपी काफी दबाव में देखी गयी थी. वैसे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये बोल कर रिपोर्ट को खारिज कर दिया था कि देश में सबसे बड़ी जाति गरीब है. मोदी ने एक बार फिर वही बात दोहरायी है, लेकिन उसमें गरीबी के साथ नौजवानों, महिलाओं और किसानों को भी अगल अलग जाति के रूप में बताया है. 

ये भी खबर आयी थी कि नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की जातिगत गणना से शुरू हुई राजनीति को काउंटर करने के लिए बीजेपी ओबीसी सर्वे लाने पर विचार कर रही है. बिहार जाकर जब केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने कहा था कि बीजेपी को जातिगत जनगणना से कोई आपत्ति नहीं है, तभी समझ में आ गया था कि बीजेपी इस मुद्दे को लेकर कितना चिंतित है - लेकिन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने तो जैसे इस मुद्दे की हवा ही निकाल दी है. 

संसद के विशेष सत्र के बाद तेजस्वी यादव और राहुल गांधी ने जातिगत जनगणना कराने की जोर शोर से मांग की थी. कांग्रेस ने तो कार्यसमिति की बैठक में प्रस्ताव पारित कर जातिगत जनगणना का चुनावी वादा भी कर डाला था.

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राहुल गांधी अपनी रैलियों में सत्ता में आने पर जातिगत जनगणना कराने का वादा करना नहीं भूल रहे थे. ये चुनावी वादा राज्यों के साथ साथ केंद्र की सत्ता में आने की सूरत में भी लागू होता, ये भी लगे हाथ समझाना नहीं भूलते थे.

हो सकता है, तेलंगाना में कांग्रेस की सरकार बनने पर जातिगत गणना करायी भी जाये, लेकिन आगे के लिए तो ये मुद्दा खत्म ही लग रहा है - 2024 के आम चुनाव आते आते तो बिलकुल नहीं लगता कि ये मुद्दा प्रासंगिक भी रह पाएगा. 

हो सकता है, आरजेडी और समाजवादी पार्टी जैसे क्षेत्रीय दल जातिगत गणना के मुद्दे को उठायें, लेकिन कांग्रेस के लिए तो जरा भी स्कोप नहीं नजर आ रहा है. अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव ये चाहते हैं कि 2024 में मंडल बनाम कमंडल की लड़ाई हो, लेकिन क्या कांग्रेस भी ऐसा करने वाली है - देखना होगा. 

2. अडानी के बहाने मोदी को टारगेट करना बेकार 

उद्योगपति गौतम अडानी को लेकर राहुल गांधी 2014 से ही मोदी सरकार के खिलाफ अभियान चला रहे हैं. हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद संसद में भी राहुल गांधी ने जोरदार भाषण दिया था, लेकिन विपक्ष के एकजुट न हो पाने के कारण कांग्रेस की जेपीसी से जांच कराने की मांग धरी की धरी रह गयी. 

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राजस्थान में चुनाव प्रचार के आखिर में पहुंचे राहुल गांधी ने जेबकतरों की कहानी सुनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी नेता अमित शाह दोनों को गौतम अडानी के साथ लपेटने की कोशिश की - और राहुल गांधी ने लोगों को बीजेपी से बच कर रहने की सलाह दी. 

महुआ मोइत्रा के मुद्दे पर अडानी ग्रुप के कारोबार के प्रति ममता बनर्जी ने भले ही स्टैंड बदल लिया हो, लेकिन राहुल गांधी के अडानी-अडानी करने से मोदी और बीजेपी का कुछ नहीं बिगड़ने जा रहा है, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव नतीजों ने ये तो साबित कर ही दिया है - और 2024 में इस मुद्दे का बहुत असर रहेगा, अभी तो ऐसा नहीं लगता.

3. मोदी पर निजी हमले बैकफायर होने की गारंटी है

अब तो कांग्रेस नेतृत्व को अच्छी तरह समझ लेना चाहिये कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निजी हमलों से कोई फायदा नहीं मिलने वाला है. एक बार की कौन कहे, बार बार ये साबित हो रहा है कि ऐसा करने से कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है. 

2007 के गुजरात विधानसभा में कांग्रेस अध्यक्ष रहीं, सोनिया गांधी ने 2002 के दंगों को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को 'मौत का सौदागर' बताया था, लेकिन कांग्रेस के बुरी तरह चुनाव हार जाने के बाद फिर कभी उनके बारे में सोनिया के मुंह से ऐसा सुनने को नहीं मिला. 

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2019 के आम चुनाव में राहुल गांधी घूम घूम कर रैलियों में 'चौकीदार चोर है' का नारा लगवाते रहे, लेकिन कांग्रेस की हार हुई, और बीजेपी की सत्ता में वापसी हो गयी. हार के बाद राहुल गांधी ने जिम्मेदारी लेते हुए कांग्रेस अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया था. बाद में सोशल साइट ट्विटर (अब X) पर इस्तीफा शेयर करते हुए भी कहा था कि वो अपने स्टैंड पर कायम हैं. 

अब तो राहुल गांधी को मान लेना चाहिये कि 'चौकीदार' न तो 'पनौती' है, न 'जेबकतरा' - क्योंकि जनता का मैंडेट ठीक यही है.

4. 'एकला चलो...' की राह चलना तो अब संभव नहीं है

कांग्रेस के उदयपुर मंथन शिविर से राहुल गांधी ने विचारधारा का नाम लेकर क्षेत्रीय दलों को नकारने की मुहिम चला दी. कर्नाटक से लेकर बिहार तक क्षेत्रीय दलों की तरफ से राहुल गांधी के बयान पर कड़ा विरोध जताया गया. 

भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भी राहुल गांधी ने वही बात दोहरायी और यात्रा में राहुल गांधी को कुछ चुनिंदा क्षेत्रीय दलों का ही साथ मिल सका - और विपक्षी गठबंधन INDIA के गठन के बावजूद विधानसभा चुनावों में जो हाल दिखा, नतीजे आने से पहले ही हाल नजर आने लगा था. 

अखिलेश यादव को लेकर मध्य प्रदेश में कमलनाथ ने भी राहुल गांधी वाला ही तेवर दिखाया, और 'अखिलेश वखिलेश' बोल कर झिड़क देने जैसा व्यवहार किया. तब तो सिर्फ दिग्विजय सिंह ने ही अखिलेश यादव के साथ हुए व्यवहार पर नाराजगी जतायी थी - क्या राहुल गांधी को अब भी ये चीज समझ में नहीं आ रही होगी?

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हर राज्य की अपनी अलग परिस्थिति होती है. मध्य प्रदेश का रिजल्ट देख कर ऐसा तो नहीं लगता कि INDIA गठबंधन मिल कर भी चुनाव लड़ता तो बीजेपी को रोक पाता, लेकिन कुछ बेहतर तो हो ही सकती थी - और आजमाये हुए नुस्खे 2024 के आम चुनाव में बेहतर नतीजे दे सकते थे. 

5. मोहब्बत की दुकान खोलने का वादा भी कारगर नहीं लगता

बीजेपी पर समाज में नफरत फैलाने का आरोप तो राहुल गांधी देश से बाहर जाकर भी कर चुके हैं. लंदन के एक कार्यक्रम में राहुल गांधी ने देश भर में केरोसिन छिड़क डालने का बीजेपी पर इल्जाम लगाया था. विधानसभा चुनावों में भी जगह जगह ये मुद्दा राहुल गांधी और कांग्रेस नेताओं की तरफ से उठाये गये. 

भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कांग्रेस की तरफ से नफरत फैलाने वालों के खिलाफ राहुल गांधी की तरफ से देश भर में 'मोहब्बत की दुकान' खोले जाने का ऐलान किया गया. मुद्दे की बात ये है कि विधानसभा चुनावों में तो लोगों को ये कोई चुनावी मुद्दा नहीं समझ में आया - फिर क्या गारंटी है कि 2024 के आम चुनाव में लोग मोहब्बत की दुकान को गंभीरता से लेंगे?

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