कांग्रेस ने पहले बिहार के चुनाव मैदान में अकेले उतरने के संकेत दिये थे, लेकिन जल्दी ही साफ कर दिया कि वो महागठबंधन के बैनर तले ही बिहार विधानसभा चुनाव लड़ेगी.
जाहिर है महागठबंधन में आरजेडी के साथ चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस को लालू यादव और तेजस्वी यादव की शर्तें भी माननी होंगी - और शर्तों में प्रमुख फैक्टर हैं राहुल गांधी के पसंदीदा नेता कन्हैया कुमार और पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव.
लालू यादव शुरू से ही दोनो नेताओं को कांग्रेस में लेने के पक्ष में नहीं रहे हैं. क्योंकि, वो कन्हैया कुमार को तेजस्वी यादव के लिए प्रतियोगी मानते हैं, और पप्पू यादव को पसंद नहीं करते. लोकसभा चुनाव में तो पप्पू यादव को हराने के लिए तेजस्वी यादव पूर्णियां में डेरा ही डाल दिये थे, लेकिन फेल हो गये. 2019 की ही तरह 2024 में भी तेजस्वी यादव ने कन्हैया कुमार को महागठबंधन के बैनर तले बेगूसराय से चुनाव नहीं ही लड़ने दिया था.
लोकसभा चुनाव जैसी दिक्कत तो नहीं आने वाली, लेकिन राहुल गांधी के लिए कन्हैया कुमार और पप्पू यादव की भूमिका पर लालू यादव और तेजस्वी यादव को राजी करना निश्चित रूप से मुश्किल चुनौती होगी, और ये सब राहुल गांधी के बिहार दौरे से ही शुरू होने वाला है. राहुल गांधी 7 अप्रैल को फिर बिहार जाने वाले हैं - देखें तो 2025 में ये उनका तीसरा दौरा होगा.
कन्हैया के लिए बेगूसराय तक जा सकते हैं राहुल गांधी
सुनने में आया है कि राहुल गांधी पटना के बाद कन्हैया कुमार को सपोर्ट करने बेगूसराय भी जा सकते हैं. कन्हैया कुमार फिलहाल कांग्रेस की ‘पलायन रोको, नौकरी दो’ यात्रा पर निकले हुए हैं.
अपने तीसरे बिहार दौरे में राहुल गांधी महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह की याद में श्रीकृष्ण मेमोरियल हाल में संविधान सुरक्षा सम्मेलन में हिस्सा लेंगे, और सामाजिक कार्यकर्ताओं से बातचीत करेंगे.
एक रिपोर्ट के मुताबिक, पटना से राहुल गांधी बेगूसराय भी जा सकते हैं. बताते हैं कि राहुल गांधी का हेलीकॉप्टर उतारने के लिए स्थानीय प्रशासन से परमिशन ली जा चुकी है. कन्हैया कुमार बेगूसराय के ही रहने वाले हैं, और 2019 में सीपीआई के टिकट पर चुनाव भी लड़ चुके हैं. लेकिन, बीजेपी के गिरिराज सिंह ने कन्हैया कुमार को हरा दिया था.
कांग्रेस की ‘पलायन रोको, नौकरी दो’ यात्रा पश्चिम चंपारण के भितिहरवा आश्रम से शुरू हुई थी, जहां से 1917 में महात्मा गांधी ने चंपारण सत्याग्रह शुरू किया था. कन्हैया कुमार की यात्रा में कांग्रेस के बड़े नेताओं के हिस्सा लेने की संभावना पहले ही जताई गई थी, और राहुल गांधी का शामिल होना तो खास मायने रखता है. दिल्ली कांग्रेस के नेताओं ने भी चुनाव के दौरान ऐसी यात्रा की थी, लेकिन न तो राहुल गांधी, न ही कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ही शामिल हुए - बिहार यात्रा में राहुल गांधी का शामिल होना कांग्रेस की गंभीरता का संकेत माना जाना चाहिये.
बिहार में जिला स्तर पर कांग्रेस का जातीय समीकरण
बिहार दौरे से पहले राहुल गांधी 4 अप्रैल को बिहार कांग्रेस के जिलाध्यक्षों से भी मिलने वाले हैं, जो दिल्ली पहुंच रहे हैं. 1 अप्रैल को देर रात कांग्रेस नेतृत्व ने बिहार में 40 अध्यक्षों की नियुक्ति की घोषणा की थी.
सवर्ण नेता को हटाकर बिहार कांग्रेस की कमान दलित फेस राजेश कुमार के देने के बाद संगठन में सवर्णों का दबदबा फिर से देखने को मिला है. नये बनाये गये जिलाअध्यक्षों में बाकियों के मुकाबले दलितों की संख्या काफी कम है.
बिहार के 40 जिलाध्यक्षों की सूची में 21 नये चेहरों को जगह दी गई है. 19 जिलाध्यक्षों को दोबारा मौका दिया गया है. जातियों के हिसाब से देखें तो सबसे ज्यादा 14 सवर्ण जिला अध्यक्ष बनाये गये हैं. सवर्णों में भी 6 भूमिहार, 4 ब्राह्मण, 3 राजपूत और एक कायस्थ है. सवर्णों के बाद नंबर आता है ओबीसी का. 10 जिलाध्यक्ष पिछड़े वर्ग के बनाये गये हैं, जिनमें 5 यादव, 3 कुशवाहा और 2 कुर्मी तबके से आते हैं.
7 अल्पसंख्यकों को भी मौका दिया गया है, जिनमें 6 मुसलमान और एक सिख कांग्रेस नेता शामिल है - लेकिन सिर्फ 5 दलित नेताओं कोे जिलाध्यक्ष बनाया गया है.
4 अप्रैल को कांग्रेस नेता राहुल गांधी सभी जिलाध्यक्षों के साथ बैठक करेंगे। विधानसभा चुनाव से पहले ये बैठक काफी अहम मानी जा रही है। इस दौरान संगठन विस्तार, पार्टी की मजबूती और विधानसभा चुनाव पर चर्चा होगी।
महागठबंधन की शर्तें तो माननी ही होंगी
कन्हैया कुमार को लेकर कांग्रेस का क्या प्लान है, ये तो अभी नहीं बताया गया है, लेकिन पप्पू यादव को तो विधानसभा चुनाव नहीं ही लड़ना है. कन्हैया कुमार अब तक दो बार लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं. 2024 में कांग्रेस ने कन्हैया कुमार को बीजेपी के मनोज तिवारी के खिलाफ मैदान में उतारा था, लेकिन वो फिर चूक गये.
कन्हैया की बिहार में भूमिका कैंपेन तक ही सीमित लगती है, वरना आरजेडी और कांग्रेस में समझौते का सवाल ही पैदा नहीं होता. वैसे कांग्रेस की तरफ से तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री पद का चेहरा होना मंजूर न किया जाना कयासों के लिए जगह तो छोड़ ही रहा है. 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में तो तेजस्वी यादव को महागठबंधन का मुख्यमंत्री चेहरा कांग्रेस नेता की मौजूदगी में ही घोषित किया गया था, और राहुल गांधी ने एनडोर्स भी किया था.
बिहार कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लावरु ने कार्यकर्ताओं से कहा है, अभी हम चुनाव और जनता के मुद्दों पर फोकस कर रहे हैं… महागठबंधन में अभी सीटों पर चर्चा नहीं हुई है… बातचीत शुरू होने पर आप लोगों को जानकारी दी जाएगी… सब ऑल इज वेल है.
बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश कुमार का कहना है कि मजबूती से एकजुट होकर चुनाव लड़ेंगे. बात ठीक है, लेकिन कन्हैया कुमार अगर कैंपेन में उतरते हैं तो तेजस्वी यादव से तुलना तो होगी ही. जैसे 2019 में दोनो नेताओं की शिक्षा-दीक्षा पर बहस चलती रही - और कोई नहीं तो प्रशांत किशोर तो बवाल करेंगे ही.
चुनाव कैंपेन में भी कन्हैया कुमार और पप्पू यादव की भूमिका कांग्रेस तय करते वक्त ये ध्यान रखना होगा कि तेजस्वी यादव से टकराव की नौबत न आये - और राहुल गांधी के लिए बिहार में ये सबसे बड़ा चैलेंज होगा.