राजनीति में कदम कदम पर राजनीति ही होती है. हर बात, हर एक्ट और हर कदम राजनीति से प्रेरित होता है, राजनीति का मकसद लिये होता है, और राजनीति के लिए ही होता है - बिहार में लालू यादव की इफ्तार पार्टी को लेकर कांग्रेस ने जो रवैया अपनाया उसमें भी राजनीति की ही झलक महसूस होती है.
ये ठीक है कि कांग्रेस की तरफ से अब साफ कर दिया गया है कि बिहार चुनाव वो महागठबंधन में रहकर ही लड़ेगी, पिछले चुनाव की तरह. लेकिन, इस घोषणा से ठीक एक दिन पहले कांग्रेस का इफ्तार पार्टी से दूरी बनाना काफी अजीब लगता है.
ऐसा भी नहीं कि कांग्रेस की तरफ से लालू यादव की इफ्तार पार्टी में कोई शामिल नहीं हुआ था. लेकिन, कांग्रेस विधायक प्रतिमा दास इफ्तार पार्टी में वैसे ही शामिल हुई थीं, जैसे जनवरी, 2024 में कुछ कांग्रेस नेता अयोध्या गये थे.
बिहार कांग्रेस के नये नवेले अध्यक्ष राजेश कुमार, प्रदेश प्रभारी कृष्णा अल्लावरु जैसे सभी नेता शाम तक पटना में ही थे, और उसके बाद मीटिंग के लिए दिल्ली रवाना हुए. कांग्रेस विधायकों ने भी बजट सत्र में हिस्सा लिया, लेकिन इफ्तार पार्टी की तरफ कोई झांकने तक नहीं गया - क्या ये सब इसलिए हुआ क्योंकि आरजेडी और कांग्रेस दोनो ही मुस्लिम वोट के दावेदार हैं?
बिहार कांग्रेस के नेताओं की दिल्ली में हुई बैठक के बाद राजेश कुमार ने बताया कि महागठबंधन के स्वरूप में किसी प्रकार का कोई बदलाव नहीं होगा, ‘महागठबंधन के रहकर हम 2025 का विधानसभा चुनाव लड़ेंगे.’
लेकिन, कांग्रेस एक सवाल का जवाब नहीं दे रही है - ‘क्या तेजस्वी यादव गठबंधन में मुख्यमंत्री का चेहरा होंगे?’
राहुल गांधी ने कदम पीछे खींचे या रणनीति ही यही थी?
1. दिल्ली विधानसभा चुनाव में जिस तरह राहुल गांधी ने खुद मोर्चा संभाला था, और उसी दौरान बिहार का जल्दी-जल्दी दो बार दौरा किया, और हाल ही में पश्चिम बंगाल को लेकर कांग्रेस का रुख सामने आया - ऐसा लग रहा था कि बिहार में भी कांग्रेस अकेले मैदान में उतरने का फैसला कर चुकी है.
2. लग रहा था, कांग्रेस संभावनाएं टटोल रही थी. फीडबैक लेने की कोशिश की जा रही थी. ऐसा समझा जा रहा था कि कांग्रेस अपने पुराने वोटर तक पहुंचने की कोशिश कर रही है, लेकिन बिहार में तो फिलहाल ये होल्ड हो गया है.
3. बिहार सरकार की तरफ से कराई गई जातिगत गणना को राहुल गांधी के फर्जी बता देने से भी लगने लगा था कि कांग्रेस चुनावों में आरजेडी से अलग होकर चलने वाली है, लेकिन अब तो ऐसी बातें भी अप्रासंगिक हो गई हैं.
4. अखिलेश यादव के बिहार में आरजेडी को सपोर्ट करने की घोषणा भी ऐसा ही एक फैक्टर था, जिससे लग रहा था कि कांग्रेस महागठबंधन से पक्के तौर पर दूसरी बनाने जा रही है.
अब तो लगता है, राहुल गांधी ये जो भी कर रहे थे, उसके पीछे लालू यादव के प्रभाव को कम करने का प्रयास भर था. और, चूंकि दिल्ली और बिहार की डेमोग्राफी में काफी फर्क है, और बिहार की जातीय राजनीति में दिल्ली जैसा प्रयोग संभव नहीं है, इसलिए कांग्रेस ने व्याहारिक तौर पर चीजों को समझा और राजनीतिक रूप से वही फैसला लिया है, जो पार्टी के हित में हो. न कि राहुल गांधी के मनमाफिक या जिद के लिहाज से ठीक लगता हो.
क्या लालू यादव दबाव बनाने में सफल हुए हैं?
कन्हैया कुमार बिहार में कांग्रेस के ‘पलायन रोको रोजगार दो’ यात्रा पर निकले हैं. वो 9 दिन में 8 जिलों की यात्रा पूरी कर चुके हैं. और अब सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है कि अप्रैल के पहले सप्ताह में राहुल गांधी बिहार जा सकते हैं, और कन्हैया कुमार की यात्रा में भी शामिल हो सकते हैं.
ऐसी यात्रा तो दिल्ली में भी स्थानीय कांग्रेस नेताओं ने निकाली थी, लेकिन राहुल गांधी, प्रियंका गांधी या मल्लिकार्जुन खड़गे जैसा कोई भी नेता शामिल नहीं हुआ - और ये भी मानकर चलना चाहिये कि लालू यादव को कन्हैया कुमार की यात्रा में राहुल गांधी का शामिल होना अच्छा नहीं लगेगा.
और, इसीलिए सवाल ये भी उठता है कि क्या राहुल गांधी अब भी लालू यादव की इतनी परवाह करेंगे?
कन्हैया कुमार और पप्पू यादव को लेकर लालू यादव का कांग्रेस नेतृत्व पर दबाव डालना और उसका असर देखा जा चुका है. हो सकता है, ममता बनर्जी को इंडिया ब्लॉक का नेता बना दिये जाने की लालू यादव की सलाह के पीछे बड़ी वजह यही हो - लेकिन, दिल्ली चुनाव में लालू यादव ने अखिलेश यादव या ममता बनर्जी जैसा रवैया तो नहीं ही अपनाया था.
कांग्रेस-आरजेडी में कई पेंच अब भी फंसे हुए हैं
सब ठीक हो गया है, ऐसा भी नहीं लगता. बिहार कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लावरु अब भी एक सवाल का जवाब नहीं दे रहे हैं - क्या तेजस्वी यादव गठबंधन में सीएम फेस होंगे?
कृष्णा अल्लावरु कहते हैं, इंडिया गठबंधन जब बैठेगा तब सीट, सीएम फेस सब पर चर्चा होगी… मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा, नहीं होगा, इस पर सामूहिक निर्णय लिया जाएगा.
मतलब, साफ है कि कांग्रेस ये जताने की कोशिश कर रही है कि मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में तेजस्वी यादव के नाम पर पर उसकी सहमति नहीं है. अभी तो नहीं है.
1. कृष्णा अल्लावरु के इस रुख में दो पहलू हैं. 2020 के चुनाव में राहुल गांधी ने ही तेजस्वी यादव को महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद का चेहरा बताया था, तब लालू यादव जेल में थे. बिहार से बाहर थे. और माना जा रहा था कि लालू यादव ने राहुल गांधी से एनडोर्समेंट लेकर दूर तक की कौड़ी खेल ली थी.
आपको याद होगा, कुछ दिन पहले ही लालू यादव ने ममता बनर्जी को इंडिया ब्लॉक का नेता बनाये जाने की मांग का सपोर्ट कर दिया था - क्या कांग्रेस अब उसी बात के लिए जैसे को तैसा वाली नीति अपना रही है?
2. कृष्णा अल्लावरु के सामने पप्पू यादव की कांग्रेस में को लेकर भी सवाल उठाया जाता है, तो भी जवाब घुमा फिरा कर ही मिलता है, जैसे कांग्रेस चुप्पी साध ले रही हो. पप्पू यादव के सवाल पर कृष्णा अल्लावरु का कहना है, जो भी बीजेपी के खिलाफ रहेगा, हम उनके साथ गठबंधन करेंगे.
बाकी आप आसानी से समझ सकते हैं. मान कर चलना चाहिये कि पप्पू यादव को कांग्रेस में लिये जाने पर लालू यादव का विरोध काम कर गया है. पप्पू यादव को कांग्रेस जो भी दे, अपने हिस्से से देगी. और, उसमें भी लालू यादव की मंजूरी पूर्णिया लोकसभा सीट की तरह जरूरी होगी.
3. कांग्रेस की इस बार भी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की दावेदारी रहेगी. और ये कांग्रेस की प्रेशर पॉलिटिक्स का हिस्सा है. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 70 में से सिर्फ 19 सीटों पर जीत हासिल की थी, जिसके बाद आरजेडी नेताओं ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को खूब खरी खोटी सुनाई थी.
तेजस्वी यादव ने भी माना था कि अगर कांग्रेस को कम सीटें दी गई होतीं तो बिहार में महागठबंधन की सरकार बन सकती थी.
बिहार पर दिल्ली मंथन से एक और बात सामने आ रही है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ कांग्रेस भी करीब करीब वैसी ही रणनीति अपनाने जा रही है, जो लालू यादव और तेजस्वी यादव ने अपना रखा है.
बिहार कांग्रेस अध्यक्ष राजेश कुमार बताते हैं, बिहार में बीजेपी सबसे बड़ी चुनौती है… वो सत्ता चुराकर यहां तक पहुंची है… सत्ता से उनको बाहर निकालने की रणनीति बनाई गई है.
ये तो पक्का हो गया है कि न तो आरजेडी और न ही कांग्रेस, कोई भी चुनावों में नीतीश कुमार को टार्गेट नहीं करेगा, निशाने पर सिर्फ बीजेपी होगी.
बिहार से एक वीडियो वायरल हुआ था. ज्यादा दिन नहीं हुए. वीडियो में बीजेपी के कई नेता बैठे हुए देखे जा सकते हैं. कुछ नेताओं को उनके कद-काठी और हाव-भाव से पहचाना भी जा सकता है. और, बातचीत में सुनने को मिलता है - ‘तेजस्वी यादव को टार्गेट नहीं करना है.’
बिहार विधानसभा के चुनाव कैंपेन का ये ट्रेलर है, पूरी पिक्चर रिलीज होने में भी कोई बहुत देर नहीं है.