अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का उद्घाटन संपन्न हो चुका है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर राम मंदिर उद्घाटन समारोह का राजनीतिक लाभ उठाने का आरोप लगातार विपक्ष लगा रहा है. इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है कि बीजेपी को इस समारोह का राजनीतिक लाभ आने वाले लोकसभा चुनावों में मिलेगा ही. बीजेपी राम मंदिर को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ती रही है अगर इस मुद्दे पर वह वोट मांगती है तो इसके लिए उसकी आलोचना करने का कोई तुक नहीं रह जाता है. लोकतंत्र में राजनीतिक जीत-हार के लिए इस तरह के मुद्दों को राजनीतिक पार्टियां भुनाती रही हैं. 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस ने भी उनकी शहादत को इसी तरह भुनाय था. राम जन्मभूमि का मुद्दा तो करोड़ों हिंदुओं के श्रद्धा से जुड़ा है. जाहिर है कि 500 वर्षों के संघर्ष के बाद मिली इस सफलता को बीजेपी ने जश्न में बदल दिया है. अयोध्या में हुए समारोह को देश के गांव-गांव से जोड़ दिया गया है. हर जाति, हर भाषा, हर संप्रदाय, हर क्षेत्र के लोगों को इस समारोह में शामिल होने का मौका देकर राजनीतिक संदेश देने की भी कोशिश हुई है. फिलहाल अयोध्या के इस समारोह ने 5 राजनीतिक संदेश दिए हैं जो भविष्य में बीजेपी और देश की दिशा तय करने वाले हैं.
1- बीजेपी के दक्षिण विजय की रूप रेखा तैयार
भारतीय जनता पार्टी उत्तर भारत में अपना विजय पताका फहरा चुकी है. दक्षिण में लाख कोशिशों के बावजूद बीजेपी अपना स्थान नहीं बना पा रही है. कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हारने के बाद से दक्षिण में बीजेपी की बची-खुची प्रतिष्ठा भी खत्म हो चुकी है. तेलंगाना में भी बीजेपी को इस बार विधानसभा चुनावों में अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने अब सबसे बड़ा लक्ष्य बीजेपी को दक्षिण में मजबूत करना है.इसके लिए राम मंदिर समारोह को नरेंद्र मोदी ने तुरुप के पत्ते की तरह इस्तेमाल किया है. पीएम अपने चुनाव क्षेत्र में लगातार तमिल संगमम करा रहे हैं. पर राम मंदिर उद्घाटन समारोह से पहले उन्होंने जिस तरह दक्षिण के मंदिरों के चक्कर लगाएं हैं वो उनके दक्षिण विजय के स्टे्टजी का ही अहम हिस्सा रहा है.
पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं दक्षिण के लोगों में मंदिरों को लेकर एक अलग तरह की श्रद्धा भक्ति है. साऊथ के लोगों को पहली बार कोई ऐसा नेता मिला है जो उनकी जनभावनाओं के हिसाब से एक सामान्य आदमी की तरह से मंदिरों में अपनी भक्ति भाव को प्रदर्शित कर रहा है. इसका संदेश बहुत दूर तक जाने वाला है. इसके अलावा राम अलावा मंदिर निर्माण शैली, मूर्ति की रूप रेखा, गर्भगृह आदि में कहीं न कहीं से दक्षिण की स्टाइल और तौर-तरीकों को भी महत्व दिया गया है. राम की मूर्ति में जो पत्थर इस्तेमाल हुआ है, राम की मूर्ति के मूर्तिकार , राम की मूर्ति का रूप रंग सभी कुछ दक्षिण से प्रेरित है.
प्रधानमंत्री ने प्राण प्रतिष्ठा समारोह के बाद अपने भाषण में कहा, 'अपने 11 दिन के व्रत अनुष्ठान के दौरान मैंने उन स्थानों का चरण स्पर्श करने का प्रयास किया, जहां प्रभु श्रीराम के चरण पड़े थे, चाहे नासिक हो, केरल हो, रामेश्वरम हो या फिर धनुषकोडी, मेरा सौभाग्य है कि सागर से सरयू तक की यात्रा का अवसर मिला.' यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दक्षिण के लोगों को संदेश है कि बीजेपी उत्तर या दक्षिण में भेदभाव नहीं करती है. बल्कि धार्मिक मामलों में दक्षिण को प्राथमिकता में रखती है. अगले लोकसभा चुनावों में इस रणनीति का फल देखने को मिलेगा.
2- योगी आदित्यनाथ का भविष्य उज्ज्वल है
जिस तरह अयोध्या में राम मंदिर समारोह को पीएम के समकक्ष नेताओं को समारोह से बाहर रखा गया वह आश्चर्यजनक नहीं था. अयोध्या समारोह से गृहमंत्री अमित शाह, बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा तक दूर रहे. आम तौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां होते हैं वहां सिर्फ वही होते हैं. आश्चर्यजनक ये था कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गर्भगृह में पीएम मोदी के साथ मौजूद थे. क्या इसे एक तरह का राजनीतिक संदेश देने की कोशिश समझा जाए. गर्भ गृह में पूजा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के अलावा दूसरे राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी रही केवल इतना ही नहीं है, खास यह भी है कि योगी आदित्यनाथ को बोलने का मौका भी दिया गया. वह भी संक्षिप्त नहीं विस्तार से. क्या इसका मतलब यह नहीं निकाला जा सका है कि संघ का आगे का प्लान तैयार है?
क्योंकि अगर सिर्फ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में उनकी मौजूदगी को दिखाना होता तो वो केवल मौजूद रहते शायद उनको स्पीच देने का मौका नहीं मिलता. फिलहाल अयोध्या समारोहों में योगी की सक्रियता और उनको मिलने वाला महत्व ये रेखांकित करता है कि बीजेपी की अंदरूनी राजनीति में अभी योगी आदित्यनाथ की स्थिति मजबूत रहने वाली है.
3- लोकसभा चुनाव में 1984 की तरह साफ हो जाएगा विपक्ष
राम मंदिर समारोह को देशभर में मिले समर्थन ने यह तय कर दिया है कि आने वाले लोकसभा चुनावों में बीजेपी का नारा 'अबकी बार 400 पार' पूरी तरह चरितार्थ होने वाला है. जिस तरह कांग्रेस शासित राज्यों और आम आदमी पार्टी, झामुमो आदि ने राम मंदिर समारोह को समर्थन दिया है उससे तो यही लगता है कि विपक्ष नतमस्तक हो चुका है. ठीक 1984 वाली स्थिति है देश के सामने. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में इंदिरा की डेडबॉडी टीवी स्क्रीन पर कई दिनों तक लगातार दिखाई गई. कांग्रेस ने प्रचार के लिए गांव कस्बों में अस्थिकलश ठेले पर रखकर मातम धुन के साथ घुमाती रही. इंदिरा की शहादत को कांग्रेस ने इस तरह भुनाया कि बड़े बड़े नेता चुनाव हार गए थे.
उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर बलिया से, हेमवती नंदन बहुगुणा इलाहाबाद से चुनाव हार गए थे. मध्य प्रदेश में अटल बिहारी वाजपेयी और गुजरात में लाल कृष्ण आडवाणी चुनाव हार गए थे. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को 85 लोकसभा सीटों में 83 सीटों पर विजय मिली थी. केवल चौधरी चरण सिंह अपनी लोकसभा सीट बागपत बचा सके थे. राममंदिर समारोह को लेकर जिस तरह देश भर में दिवाली मनाई गई है, राम मंदिर के रेप्लिका , पीले अक्षत बांटे गए हैं उससे 1984 वाली कांग्रेस की स्ट्रेटजी याद आ गई है. निश्चित है कि चुनाव परिणाम भी वैसे ही आने वाले हैं.
4- हिंदुओं में समानता का संदेश
बीजेपी ने हिंदुत्व को पहले ओबीसी तक पहुंचाया. एक ब्राह्मण और बनियों की पार्टी ने खुद को पिछड़ों का पार्टी बनाया. अब राम मंदिर समारोह के बाद पार्टी दलितों को भी अपने साथ जोड़ने में सफल होने वाली है. जिस तरह राम मंदिर समरोह में दलितों को महत्व मिला है वह एक राजनीतिक संदेश है कि देश का हिंदू अब बदल रहा है. दलित वोटों की राजनीति भी अब बदलने वाली है. गर्भगृह में मुख्य पूजा के दौरान राम मंदिर का शिलान्यास करके चर्चा में आने वाले दलित कामेश्वर चौपाल का मौजूद रहना अपने हिंदू धर्म के लिए बहुत खास है. राम मंदिर के पुजारियों में 2 दलितों को शामिल करना और 15 खास जोड़े जो यजमान की भूमिका में थे उनमें काशी के डोमराजा सहित कई दलित और पिछड़ी जातियों के लोगों को शामिल करके ये संदेश देने की कोशिश की गई है कि हिंदू एक हैं. यह समारोह हिंदुओं में ऊंच नीच के भेदभाव को कम करने के लिए इतिहास में याद रखा जाएगा.
5-संवैधानिक रूप से नहीं पर कार्यकारी रूप में भारत अब हिंदू राष्ट्र है
अब तक देश का हर कार्यक्रम वैदिक मंत्रोच्चार शुरू तो होता था पर सरकार इसमें इन्वॉल्व नहीं रहती थी. पर राम मंदिर समारोह के लिए जिस तरह पीएम मोदी ने 11 दिन का व्रत रखा और सभी धार्मिक रीति रिवाजों को संपन्न किया, जिस तरह पीएम मोदी और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ लगातार इस कार्यक्रम को सफल बनाने में लगे रहे उससे एक संदेश यह भी जाता है कि हिंदू धर्म संवैधानिक रूप से नहीं पर कार्यकारी रूप से भारत का ऑफिशियल धर्म बन चुका है. यह सही है कि भारत में हिंदू धर्म को लेकर कोई संगठित चर्च जैसी सत्ता नहीं है इसलिए राजा से ऊपर किसी धार्मिक पुरोहित के होने की आशंका भी नहीं है. भारत में सभी धर्मों के साथ समानता का भाव है और आगे भी रहेगा इतना तो तय है. पर सभी धर्मों के बीच सनातन के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकेगा. सनातन की बलि पर अब दूसरे धर्मों को फलने फूलने का मौका नहीं मिलने वाला है. ये केवल बीजेपी की सरकार तक ही नहीं, हाल फिलहाल में दूसरे दलों की सरकार बनने पर भी नहीं बदलने वाला है.