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रमेश बिधूड़ी होना गिरावट नहीं है, हकीकत तो उससे भी नीचे है

बीजेपी सांसद रमेश बिधूड़ी का अपराध बस इतना ही है कि सड़क वाली भाषा संसद पहुंच कर बोल दी है. ट्रोल्स भी जनता के बीच सड़क से ही आते हैं. बिधूड़ी जनप्रतिनिधि हैं. ट्रोल्स जैसे बर्ताव ज्यादा करते हैं. चूंकि असंसदीय भाषा का इस्तेमाल बड़ा अपराध माना जाता है, लिहाजा रमेश बिधूड़ी निशाने पर आ गये हैं.

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मनमाफिक हंसी वाली बातें हों - और कहा जाये कि हंसना मना है! तो कोई क्या करे?
मनमाफिक हंसी वाली बातें हों - और कहा जाये कि हंसना मना है! तो कोई क्या करे?

रमेश बिधूड़ी का अपराध आपको कम नजर आएगा, अगर बीजेपी के दो और सांसदों की हरकत देखें. खबर आयी है कि लोक सभा में जब दक्षिण दिल्ली से बीजेपी सांसद रमेश बिधूड़ी के बीएसपी सांसद दानिश अली के बारे में भला-बुरा कह रहे थे, बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद और बीजेपी सांसद डॉक्टर हर्षवर्धन हंस रहे थे. 

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कोई चाहे तो रमेश बिधूड़ी के साथ साथ हर्षवर्धन और रविशंकर प्रसाद को भी बराबर का दोषी मान सकता है. लेकिन तीनों ने अलग से क्या किया है? फर्ज कीजिये तीनों सांसद लोक सभा की जगह किसी और जगह होते. और जब रमेश बिधूड़ी ऐसी बातें कह रहे होते, तो क्या हर्ष वर्धन और रविशंकर प्रसाद की कोई अलग प्रतिक्रिया होती?

अब जबकि रमेश बिधूड़ी की हरकत को लेकर बीजेपी के सीनियर नेता राजनाथ सिंह खेद जता चुके हैं. स्पीकर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दे चुके हैं. बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा कारण बताओ नोटिस भेज चुके हैं. रविशंकर प्रसाद खामोशी अख्तियार कर चुके हैं. हर्षवर्धन कह रहे हैं कि सोशल मीडिया पर बिना मतलब उनका नाम घसीटा जा रहा है, तो बचता क्या है? वैसे 'कड़ी निंदा' तो मायावती ने भी कर दी है. हालांकि, उनकी निंदा के शब्‍द देखकर पता नहीं दानिश अली को कैसा लग रहा होगा?

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बीएसपी सांसद दानिश अली लोक सभा स्पीकर को पत्र लिख कर रमेश बिधूड़ी की सदस्यता रद्द करने की मांग कर रहे हैं. कांग्रेस की तरफ से भी एक्शन की मांग की गयी है. स्पीकर ओम बिड़ला ने भी रमेश बिधूड़ी से बात की है. 

इसे रमेश बिधूड़ी की बदकिस्मती नहीं तो और क्या कहेंगे. वे बस निशाने पर आ गये हैं. कोई ये भी कह सकता है कि भरी संसद में पकड़े गये हैं. स्पीकर को भी बहुत बुरा लगा है. तभी तो चेतावनी भी देनी पड़ी है. जो कुछ रमेश बिधूड़ी ने बीएसपी सांसद दानिश अली के लिए कहा है, अगर दोबारा ऐसी हरकत की तो एक्शन लिया जाएगा - लेकिन क्या फर्क पड़ेगा?

एक साथी सांसद के लिए रमेश बिधूड़ी ने जो कुछ कहा है, सोशल मीडिया पर तो ये सब दिन भर देखने को मिलता है. अगर रमेश बिधूड़ी किसी सांसद का नाम नहीं होता तो लोग उनको एक आम ट्रोल मान लेते - और इग्नोर कर देते. जैसे बाकी ट्रोल के साथ करना पड़ता है.

अव्वल तो रमेश बिधूड़ी ने बस इतना ही किया है कि सड़कों की भाषा को संसद तक पहुंचा दिया है. वैसे भी ये तो किसी भी जन प्रतिनिधि के कर्तव्य का ही हिस्सा है. ट्रोल्स भी तो जनता के बीच से ही आते हैं. चूंकि सड़कों की भाषा का संसद में इस्तेमाल बड़ा अपराध माना जाएगा, लिहाजा रमेश बिधूड़ी निशाने पर आ गये हैं. 

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सड़क छाप भाषा के हम्माम में शब्दों का खास मतलब नहीं रह गया है

रमेश बिधूड़ी का बयान देखें तो फर्क परदा हटने भर का ही है. बवाल तो बीजेपी नेता गिरिराज सिंह के बयान पर भी मचा था कांग्रेस नेता सोनिया गांधी पर उनकी टिप्पणी वायरल हो गयी थी, लेकिन वो वाकय संसद से बाहर का था. 

ये ठीक है कि हर्षवर्धन को लोगों ने सोशल मीडिया पर टारगेट किया है. उनके रिएक्शन से ऐसा लगता है जैसे वो ज्यादा आहत हुए हैं, बनिस्बत रमेश बिधूड़ी को मिली चेतावनी के मुकाबले - और बीएसपी नेता मायावती की प्रतिक्रिया से तो ऐसा लगता है जैसे रस्मअदायगी निभाई हो. 

बीजेपी सांसद रमेश बिधूड़ी ने सदन में जो कहा है, कोई अलग से कही गयी बात तो नहीं लगती. कुछ ही दिन पहले कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने भी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी की थी, सस्पेंड भी हुए थे. रमेश बिधूड़ी बाल बाल बचे हैं. सजा सुनाने का पैमाना विवेकाधिकार का मोहताज हो तो ऐसा ही होता है. 

अपवादों को छोड़ दें तो नेताओं के लिए राजनीतिक जीवन में या उससे इतर कोई भाषाई मर्यादा बची तो है नहीं. रमेश बिधूड़ी ने जो कुछ कहा है, भाषा और संबोधन के गिरते स्तर का भी नहीं माना जा सकता - वो तो उससे भी कहीं ज्यादा नीचे पहुंच चुका है. 

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और ये भी लगता है जैसे जनता ने भी स्वीकार कर लिया है. पूरे अवाम को तो नहीं कह सकते, लेकिन एक बड़ी आबादी को तो ऐसी चीजों से कोई फर्क नहीं ही पड़ रहा है. जो उनके नेता ने बोल दिया, मान लिया - अगर ऐसा नहीं होता तो केंद्रीय मंत्री वीके सिंह के एक बार प्रेस्टिट्युट बोल देने भर से लोग उसे पैमाना मान लेते. और मीडिया को लेकर एकतरफा टिप्पणी करते?

असंसदीय भाषा और शब्दों का कार्यवाही के रिकॉर्ड से हटाया जाना

जैसे वीके सिंह अपने समर्थकों के नेता हैं. जैसे रमेश बिधूड़ी अपने समर्थकों के नेता हैं - वैसे ही दोनों नेताओं के भी तो नेता हैं. उनके नेता प्रधानमंत्री हैं. और नरेंद्र मोदी कोई अकेले प्रधानमंत्री भी नहीं हैं जिनका बयान कार्यवाही के रिकॉर्ड से हटाया गया हो. 

2018 में राज्य सभा उपसभापति के चुनाव नतीजे आने के बाद प्रधानमंत्री मोदी का भाषण चल रहा था. बातों बातों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस उम्मीदवार बीके हरिप्रसाद के नाम को ट्विस्ट कर मजाक उड़ा दिया - और स्पीकर को उसे रिकॉर्ड से हटाना पड़ा था. ऐसा ही वाकया 2020 में भी हुआ था जब प्रधानमंत्री मोदी NPR को लेकर विपक्ष को कठघरे में खड़ा कर रहे थे.

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2020 में शिवसेना सांसद संजय राउत कंगना रनाउत को न जाने क्‍या क्‍या कह गए थे, और जब पत्रकारों ने उनके द्वारा कहे गए शब्‍द पर सवाल किया तो समझाने लगे कि अरे उसका मतलब तो नॉटी होता है. संजय राउत ने जिस शब्‍द को कहकर बात दबाने की कोशिश की थी, वही शब्‍द लोकसभा में एक बहस के दौरान महुआ मोइत्रा ने कह दिया. बाद में मोइत्रा ने भी एक प्राइम टाइम टीवी शो में आकर कुछ सफाई दी थी.

2013 में बीजेपी नेता अरुण जेटली को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन की कुछ बातें रिकॉर्ड से हटानी पड़ी थी. 2022 में जुमलाजीवी शब्दों के इस्तेमाल पर संसद में पाबंदी लगाये जाने के बाद स्पीकर की तरफ से सफाई भी आयी थी. उनका कहना था कि कोई शब्द बैन नहीं किया गया है, 1100 पन्नों की एक किताब है जिसमें ऐसे कुछ शब्द जोड़े जाते रहे हैं. ये परंपरा है. 

अब तो लगता है चुनाव आयोग भी ऐसी शिकायतों को कोई तवज्जो नहीं देने वाला है. आखिर दिल्ली चुनावों के दौरान अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा और रमेश बिधूड़ी की भाषा में कितना अंतर है, मामूली ही ना.

संसद से सड़क तक आलम एक जैसा ही है... राजनीतिक जीवन में संसदीय और असंसदीय भाषा जैसी कोई लक्ष्मण रेखा नहीं बची है. ऐसे असंसदीय शब्दकोश मतलब ही क्या रह जाता है?

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