दिल्ली की राजनीति को लेकर चल रहे सोशल मीडिया ट्रेंड को देश के बाकी राज्यों से अलग रख कर देखा जा सकता है. अन्य राज्यों में सोशल मीडिया पर वोटर हो ही, ये जरूरी नहीं होता, लेकिन दिल्ली के मामले में ये चीज संभव हो भी सकती है.
दिल्ली में चुनाव जीतने के बीजेपी को मुख्यमंत्री के नाम पर फैसला लेने में महाराष्ट्र चुनाव जैसे ही वक्त लेना पड़ा. करीब करीब वैसे ही जैसे लोकसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में देखने को मिला था.
दिल्ली चुनाव के नतीजे आने के बाद के 10 दिनों में सबसे ज्यादा चर्चा में प्रवेश वर्मा ही थे, और उसकी एक वजह नई दिल्ली सीट पर दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को शिकस्त देना भी था.
प्रवेश वर्मा को लेकर एक मास अपील नजर आई. बीजेपी संसदीय बोर्ड और विधायक दल की बैठक से पहले प्रवेश वर्मा और रेखा गुप्ता दोनो के नाम ट्रेंड कर रहे थे, लेकिन आखिरी बाजी रेखा गुप्ता के हाथ लगी है. और, उसके कई कारण माने जा सकते हैं.
फर्ज कीजिये रेखा गुप्ता की जगह कोई पुरुष होता या प्रवेश वर्मा की पोजीशन में कोई महिला होती, तो क्या मुख्यमंत्री के नाम पर बीजेपी लीडरशिप के लिए फैसला लेना आसान हो पाता.
मुख्यमंत्री पद के दावेदार सरकार में
रेखा गुप्ता को दिल्ली की कमान सौंपने के साथ ही बीजेपी ने मुख्यमंत्री पद के कई दावेदारों को सरकार में ऐडजस्ट किया है, जिसमें पहले नंबर पर प्रवेश वर्मा का ही नाम नजर आ रहा है.
दिल्ली में बनने जा रही बीजेपी सरकार में प्रवेश वर्मा की करीब करीब वैसी ही भूमिका होने वाली है, जैसी आम आदमी पार्टी सरकारों में पहले मनीष सिसोदिया और बाद में सौरभ भारद्वाज की हुआ करती थी. ये कयास भी लगाये जा रहे हैं कि प्रवेश वर्मा को भी डिप्टी सीएम की कुर्सी मिल सकती है. देखा जाये तो दिल्ली में प्रवेश वर्मा का हाल भी करीब करीब वैसा ही हुआ है जैसे पिछली पारी में देवेंद्रे फडणवीस को महाराष्ट्र में डिप्टी सीएम बनना पड़ा था. तब मजबूरी गठबंधन की राजनीति थी, अब राजनीतिक समीकरण भारी पड़े हैं.
राजनीतिक समीकरणों को साधने के लिए ही बीजेपी ने रेखा गुप्ता के अलावा दिल्ली कैबिनेट में जाट, सिख, पंजाबी, दलित और पूर्वांचल से आने वाले नेताओं को शामिल किया है. मुख्यमंत्री पद के लिए रेखा गुप्ता के नाम के साथ ही कैबिनेट के लिए छह नाम भी पहले से ही फाइनल कर दिये गये, प्रवेश वर्मा, मनजिंदर सिरसा, आशीष सूद, रविंदर इंद्रज सिंह, पंकज सिंह और कपिल मिश्रा.
कैसे सारे दावेदार रेखा गुप्ता के सामने ढेर हो गये
रेखा गुप्ता और प्रवेश वर्मा दोनो ही ट्रेंड कर रहे थे, लेकिन अपने पुराने बयानों को लेकर नहीं. बल्कि, दिल्ली के संभावित लोगों के पसंदीदा मुख्यमंत्री के रूप में. हां, रेखा गुप्ता के मुख्यमंत्री पद की रेस में बाजी मार लेने के बाद वो सोशल मीडिया ट्रेंड में आगे निकल गई हैं.
ये स्वाभाविक भी है. लेकिन, अब वो अपनी पुरानी सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर ट्रेंड भी कर रही हैं. 2020 के चुनाव में तो प्रवेश वर्मा भी बड़े बयान बहादुरों की लिस्ट में ऊपर थे, और मामला कोर्ट तक पहुंच गया था, लेकिन तुलना करने पर रेखा गुप्ता कम नहीं लगतीं, बल्कि आगे ही निकल जाती हैं.
अरविंद केजरीवाल को शिकस्त देने के बावजूद प्रवेश वर्मा चूक गये, क्योंकि वो राजनीतिक समीकरणों में पूरी तरफ फिट नहीं बैठ पाये. रेखा गुप्ता को वैश्य समुदाय से महिला होने का पूरा फायदा मिला है.
प्रवेश वर्मा को दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री का बेटा होने की कीमत भी चुकानी पड़ी है. क्योंकि, कांग्रेस सहित कई राजनीतिक दलों पर परिवारवाद की राजनीति करने को लेकर हमलावर बीजेपी प्रवेश वर्मा को मुख्यमंत्री बनाकर खुद भी निशाने पर आ सकती थी.
प्रवेश वर्मा की छवि भी विवादित रही है. रमेश बिधूड़ी जैसी तो नहीं, लेकिन कम भी नहीं कही जा सकती है. निश्चित रूप से ये चीज भी उनके रास्ते का रोड़ा बनी होगी - सोशल मीडिया पर तो रेखा गुप्ता के भी कुछ पोस्ट शेयर किये जा रहे हैं, जो डिलीट कर दिये गये हैं, लेकिन लोग आर्काइव से उठाकर डाल रहे हैं.
दिल्ली के मुख्यमंत्री पद के लिए रेखा गुप्ता के नाम की घोषणा के बाद प्रवेश वर्मा का चेहरा देखने लायक था. चेहरे की वो रौनक गायब हो चुकी थी, जो बीते दस दिन से बनी हुई थी - और, जब प्रवेश वर्मा को बीजेपी नेतृत्व ने सेट कर दिया, कारण चाहे जो भी हों, तो बाकियों की क्या बिसात है.
रेखा गुप्ता का नाम फाइनल करना इतना आसान भी न था. 2013 में सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली बीजेपी 2015 आम आदमी पार्टी से ज्यादा अपने कार्यकर्ताओं से ही हारी थी. तब किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिये जाने से बीजेपी में भारी नाराजगी थी.
रेखा गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाये जाने के फैसले के बाद चैलेंज ये था कि कैसे सीनियर नेताओं की नाराजगी खत्म की जाये. ये सारे ही सीनियर नेता मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी थे. प्रवेश वर्मा के अलावा 2015 में दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष रहे सतीश उपाध्याय और विजेंद्र गुप्ता भी. लिहाजा तीनो नेताओं से अलग अलग मुलाकात कर आलाकमान का मैसेज पहुंचाया गया.
वैश्य समुदाय से होने के कारण अगर रेखा गुप्ता का नाम फाइनल करना था, तो विजेंद्र गुप्ता भी दावेदार बन रहे थे, जो आम आदमी पार्टी की लहर में भी बीते दोनो चुनावों में जीते थे. तभी तो बैलेंस करने के लिए रेखा गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाने के साथ ही बीजेपी ने विजेंद्र गुप्ता को स्पीकर बनाने का फैसला किया.