राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर सिर्फ पुरुषों का संगठन होने का आरोप लगता रहा है, लेकिन लगता है अब संघ अपनी छवि बदलने की कोशिश कर रहा है. वैसे संघ की सहयोगी संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी देखी जाती है, लेकिन RSS में तो बिल्कुल नहीं - और पूर्णकालिक प्रचारक तो बैचलर ही होते हैं.
हाल फिलहाल देखा गया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रानी दुर्गावती और अहिल्याबाई होल्कर जैसी वीरांगनाओं की जयंती बड़े जोरशोर से मना रहा है - जो संघ के सांस्कृतिक एजेंडे के साथ हिंदुत्व के खांचे में भी आसानी से फिट हो जा रहा है.
और, चुनाव दर चुनाव जिस तरह से महिलाओं का महत्व महसूस किया जा रहा है, संघ की ये कोशिश महिलाओं को हिंदुत्व से जोड़ने और महिला वोटर को को साधने की भी लगती है.
महिला वोट बैंक पर संघ की नजर
ये तो साफ है कि महिला वीरांगनाएं संघ के एजेंडे में स्वाभाविक रूप से फिट भी हो जाती हैं, लेकिन क्या ये देश की चुनावी राजनीति में महिला वोटर के बढ़ते महत्व का प्रभाव है?
मध्य प्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र के साथ साथ दिल्ली में भी सरकार बन जाने में महिलाओं से जुड़ी स्कीम का खास असर माना गया है. हाल फिलहाल, कई राज्यों में महिला वोटर की पुरुषों के मुकाबले ज्यादा भागीदारी दर्ज की गई है.
संघ की रणनीति को ध्यान से समझें तो उन वीरांगना रानियों को खास तवज्जो मिल रही है, जो हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए विदेशी आक्रांताओं से जूझती देखी गईं. अहिल्याबाई होल्कर, रानी दुर्गावती और रानी अबक्का - ये ऐसे ही नाम हैं, और संघ इनकी जयंती विशेष रूप से मना रहा है.
संघ की समझाइश है कि ये सभी महिलाएं भारतीय मूल्यों की प्रतीक थीं, और उनकी बहादुरी और संघर्ष गाथा आज की पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है. संघ की तरफ से बताने, याद दिलाने और समझाने की कोशिश हो रही है कि लोग जानें कि कैसे रानी अबक्का ने पुर्तगालियों के खिलाफ 40 साल तक जंग लड़ी थी. रानी दुर्गावती ने कैसे मुगलों के हमलों का डटकर मुकाबला किया था. रानी अहिल्याबाई होल्कर की जयंती मनाकर संघ बताना चाहता है कि मंदिरों और धार्मिक स्थलों का जीर्णोद्धार किसने और क्यों कराया था.
संघ के सीनियर नेता दत्तात्रेय होसबले ने हाल ही में रानी अबक्का की 500वीं जयंती पर उनको कुशल प्रशासक और महान रणनीतिकार बताया. लोकसभा चुनावों से पहले रानी अहिल्याबाई होल्कर की 300वीं जयंती मनाई गई थी, जो संघ की रणनीति का हिस्सा है.
महिलाओं के मुद्दे पर निशाने पर रहा है संघ
संघ पर पुरुषों के संगठन होने का ठप्पा तो लगा ही है, और महिलाओं को बच्चे पैदा करने की ही सलाह दी जाती रही है. पिछले साल दिसंबर में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में समाज को बचाने के लिए महिलाओं को तीन बच्चे पैदा करने का सुझाव दिया था.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी संघ पर महिला विरोधी होने का आरोप लगा चुके हैं, और अपनी तरफ से बीजेपी के स्लोगन जय श्रीराम को भी वो महिला विरोधी बता चुके हैं.
महात्मा गांधी की हत्या से जुड़े बयान के कारण राहुल गांधी संघ से जुड़े मानहानि का मामला तो फेस कर ही रहे हैं, वो कहते हैं संघ तो माता सीता का भी अपमान करता है - और वो जय श्रीराम की जगह संघ और बीजेपी नेताओं को जय सियाराम बोलने की सलाह देते हैं.
भारत जोड़ो यात्रा के तहत झालावाड़ पहुंचे राहुल कह रहे थे, भाइयों-बहनों... सीता के बिना क्या राम हो सकते हैं? सवाल ही नहीं उठता… सीता के बिना राम नहीं हो सकते, राम के बिना सीता नहीं हो सकतीं… अपने नारे से बीजेपी और आरएसएरस के लोगों ने सीता मां को क्यों निकाल दिया है? वे कभी जय सियाराम क्यों नहीं बोलते?
ऐसे में जबकि बीजेपी का अगला अध्यक्ष किसी महिला नेता के होने के कयास लगाये जा रहे हैं, मुमकिन है संघ में भी महिलाओं की एंट्री जल्दी ही शुरू हो जाये.