उत्तर प्रदेश में जब भी विधानसभा का सत्र शुरू होता है समाजवादी पार्टी ऐसी फिजां बनाती है कि इस बार सरकार को घेर लेगी पर कुछ ऐसी गलतियां कर देती है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हमला करने का मौका दे देती है. पिछली बार सदन में संभल हिंसा पर जिस तरह समाजवादी पार्टी घिर गई थी कुछ वैसा ही आज बजट सत्र की शुरूआत मे भी हुआ. मंगलवार को विधानसभा के बजट सत्र के पहले दिन सरकार को घेरने के लिए बहुत कुछ था. कुंभ में हो रही परेशानियां, भगदड़ के बाद हुई मौत को समाजवादी पार्टी के मुखिया और राज्य के पूर्वी सीएम अखिलेश यादव सोशल मीडिया से लेकर हर मंच पर मुद्दा बनाते रहे हैं. पर जब विधानसभा में बोलने का वक्त आया तो उनकी पार्टी ने उर्दू का मुद्दा उठा दिया. समाजवादी पार्टी के नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय ने विधानसभा के फ्लोर लैंगवेज में उर्दू को शामिल करने की बात कहकर योगी को मौका दे दिया. इसके बाद योगी आदित्यनाथ जो भाषण पिलाया उससे समाजवादी पार्टी एक बार फिर बैकफुट पर चली गई. समाजवादी पार्टी को समझ लेना चाहिए कि कम से कम योगी के रहते हिंदू-मुसलमान से संबंधित कोई मुद्दा न ही उठाएं तो बेहतर है.
क्यों भड़के योगी?
सुबह में सदन की कार्यवाही का विरोध करने के बाद दोपहर 12:30 बजे सदन की कार्यवाही शुरू हुई. इस दौरान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय ने कहा कि फ्लोर लैंग्वेज में अंग्रेजी की जगह उर्दू को शामिल करना चाहिए. उन्होंने कहा कि अंग्रेजी की जरूरत नहीं है. उर्दू हमारी दूसरी भाषा है. इस पर सीएम योगी ने हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं का मुद्दा उठाकर विपक्ष को घेर लिया. योगी ने कहा कि विपक्ष हर अच्छे काम का विरोध करता है. ये उर्दू की वकालत करने वाले लोग हैं. ये भोजपुरी, अवधी का विरोध करते हैं.
उर्दू की जरूरत क्यों?
योगी आदित्यनाथ ने कहा कि 'यह सदन विशुद्ध साहित्यिक और व्याकरण के विद्वानों का नहीं है. इस सदन में अलग-अलग समाज से सदस्य आए हैं. वे सदन में विभिन्न तबके से आए हैं. अंतिम पायदान के व्यक्ति की आवाज को सदन में मुखरता मिले, इसके लिए व्यवस्था की गई है कि अगर वे हिंदी बोलने में असमर्थ हैं तो अवधी, बुंदेलखंडी, भोजपुरी जिसमें समर्थ हों, बोल सकते हैं. वह अपनी मातृभाषा में अपने विचार रख सकते हैं. इसका विरोध क्यों किया जा रहा है'.
वैसे तो हिंदी सर्वमान्य भाषा बन चुकी है. दूसरे प्रदेशों यहां तक कि दक्षिण के राज्यों में भी लोग हिंदी बोलते और समझते हैं. इसलिए भोजपुरी, अवधी और बुंदेलखंडी भाषी लोग भी हिंदी बोलते और समझते हैं. अब अगर सदन के अंदर कोई भोजपुरी-अवधी या बुंदेलखंडी में सदन में अपनी स्पीच देता है तो दूसरे लोग भी उसकी भाषा को समझ सकें इसके लिए ऑटोमेटिक ट्रांसलेटर की व्यवस्था की गई है. पहली बात तो अब कोई भोजपुरी-अवधी या बुंदेलखंडी में केवल प्राइड फीलिंग के लिए ही बोल सकता है. अन्यथा हिंदी सबको आती है और सब लोग समझने में भी सक्षम हैं. इसलिए इन तीनों भाषाओं में भाषण देने और समझने की व्यवस्था करना सिवाय अपनी मातृभाषा के प्रति प्राइड फील कराने के अलावा कुछ नहीं है. यही उर्दू के साथ भी है. उर्दू को विधानसभा का फ्लोर लैंगवेज बनाने की मांग करने से पहले यह समझना होगा कि इसकी जरूरत कितनी है. जिस तरह अवधी-बुंदेलखंडी और भोजपुरी की कोई जरूरत नहीं है उसी तरह विधानसभा में उर्दू की भी कोई जरूरत नहीं रह गी है. पर चूंकि भोजपुरी -अवधी और बुंदेलखंडी से लोगों का इतिहास जुड़ा हुआ है इसलिए उसे तो लोग खुशी खुशी स्वीकार कर लेंगे पर उर्दू के साथ शायद ऐसा नहीं हो सकता. उर्दू भाषा का जन्म भारत में हुआ पर यह बदलते दौर में मुसलमानों की भाषा बन कर रह गई. जाहिर है उर्दू को लेकर राजनीतिक करने का खूब मौका है. समाजवादी पार्टी अगर ये समझती है कि वो उर्दू की बात करके एक खास तबके को खुश कर सकती है तो जाहिर है बीजेपी भी अपने फायदे की सोचेगी ही. बस यही मौका योगी आदित्यनाथ ने लपक लिया.
उर्दू और हिंदी करीब करीब एक जैसी भाषा
सवाल उठता है कि उर्दू और हिंदी जुबान में कितना अंतर है. जैसा योगी कहते हैं कि यह सदन विशुद्ध साहित्यिक और व्याकरण के विद्वानों का नहीं है. इस सदन में अलग-अलग समाज से सदस्य आए हैं. वे सदन में विभिन्न तबके से आए हैं. तो इसका सीधा मतलब है कि सामान्य हिंदी और सामान्य उर्दू समझने वाला व्यक्ति एक दूसरे की भाषाएं समझ सकता है. सामान्य तौर पर उर्दू और हिंदी बिल्कुल एक जैसी भाषाएं हैं. पाकिस्तानी टीवी सीरियल्स भारत में और भारतीय हिंदी फिल्में पाकिस्तान में इसलिए ही लोकप्रिय हैं.क्योंकि दोनों देशों में एक दूसरी की भाषा को समझा जाता है. इसका कारण है हिंदी और उर्दू में कोई अंतर है ही नहीं. बस जब दोनों भाषाएं साहित्यिक होने लगती हैं तो हिंदी संस्कृतनिष्ठ हो जाती है और उर्दू अरबी-फारसी बन जाती है. अन्यथा सामान्य लोगों के बीच बोली जाने वाली उर्दू और हिंदी में कोई अंतर है ही नहीं. यही कारण है कि तेलुगु भाषी मुसलमान हिंदी समझ भी लेता है और बोल भी लेता है. जबकि तेलुगुभाषी हिंदू को हिंदी समझने और बोलने में दिक्कत हो सकती है.
उर्दू का नाम लेकर समाजवादी पार्टी ने क्यों गलती कर दी
नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद भारत की राजनीति परिस्थितियों में काफी बदलाव आया है. सभी राजनीतिक दलों के लिए हिंदुत्व को लेकर खुद को सॉफ्ट दिखाना मजबूरी हो चुकी है. इसलिए ही शायद अखिलेश यादव ने महाकुंभ जाकर संगम में डुबकी लगाना उचित समझा. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कुंभ के बारे में जो कुछ भी कहा हो पर उनके बाद तमाम बड़े कांग्रेसी नेताओं ने महाकुंभ का रुख किया. सुनने में आ रहा है कि राहुल गांधी और प्रियंका भी इसी हफ्ते प्रयाग राज जा सकते हैं. राम मंदिर में कभी न जाने वाले नेता भी महाकुंभ में डुबकी जरूर लगा रहे हैं. ऐसी स्थितियों में खुद को उर्दू के साथ खड़ा करना समाजवादी पार्टी के लिए एक राजनीतिक ब्लंडर ही है.