Sanitary Pad Harmful Chemicals can cause Cancer: दो दिन पहले महिलाओं के बारे में एक रिपोर्ट आई. जिसमें स्वीडिश एनजीओ इंटरनेशनल पॉल्युटेंट्स इलिमिनेशन नेटवर्क (IPEN) ने लोकल संस्था टॉक्सिक लिंक के साथ मिलकर हिंदुस्तान में बनते सैनिटरी पैड्स की जांच की, और पाया कि इनमें जहर होता है. वो भी कोई ऐसा वैसा नहीं बल्कि कैंसर पैदा करने वाला जहर.
‘रैप्ड इन सिक्रेसी’ नाम से जारी इस रिपोर्ट में गली-मोहल्ले में बनने वाले ही नहीं, बल्कि ऐसे पैड ब्रांड्स का भी जिक्र है, जिनके विज्ञापन टीवी पर आते हैं. ये पैड बनाने वाली वे कंपनियां हैं, जो दावा करती हैं कि उनका पैड लेते ही बच्ची-औरत दर्द-वर्द भूलकर ताजा फूल-सी खिल जाएंगी. इसके बाद वे या तो मैराथन विनर होंगी, या ऑफिस की टॉप परफॉर्मर. लब्बोलुआब ये कि खून को मजबूती से सोखने के साथ-साथ ये पैड पीरियड्स का सारा दर्द हर लेंगे.
इन्हीं जादुई पैड बनाने वाली कंपनियों के बारे में पता लगा कि वे जादू से भली-चंगी औरत को कैंसर भी दे सकती हैं, ब्लड-प्रेशर भी और कई दूसरी छोटी-बड़ी बीमारियां भी.
रिपोर्ट पढ़ते हुए पहला खयाल आया- ये खबर गांव-कस्बे की बच्चियों के पिताओं तक न पहुंचे, वरना पढ़ने के तुरंत बाद ये होगा कि पैड्स के लिए पैसे खर्चने बंद हो जाएंगे. भई, कौन-सा पिता अपनी बच्ची को कैंसर देना चाहेगा. वो भी खुद खरीदकर! छत्ते पर कंकड़ लगते ही जैसे मधुमक्खी बिदकती है, भन्नाए मर्द भी वैसे ही अपनी कोठरियों से निकल पड़ेंगे और तांय-फांय आदेश जारी कर देंगे- कल से पैड एकदम बंद!
शायद ही कोई हो, जो इस बात पर आंदोलन करे कि खून सोख्ता ये पैड उनकी बेटी-पत्नी-बहन-मां की जिंदगी न सोखें. कोई उन ब्रांड्स के खिलाफ नहीं लिखेगा. वो लिखेगा कि कैसे पुराने वक्त में माएं-बहनें पुरानी सूती साड़ी का भरपूर इस्तेमाल करती थीं. साड़ी का एक टुकड़ा रोटी के डिब्बे में समा जाता था, तो दूसरा हिस्सा तह लगाकर पैड बन जाता. फिर इन पैड्स को घर के किसी खुफिया तहखाने में, सीले बिस्तर के नीचे या फिर फफूंद खाती अलमारी में सबसे पीछे रख दिया जाता ताकि अगले महीने दोबारा काम आएं.
कितना आसान! पैसे भी बचे और कैंसर का भी खतरा नहीं! तो औरतों, अपनी दादियों-नानियों की राह पर चलो, सैनिटरी पैड फेंको और राख, जूट, कपड़ा, जो भी मिले, झट से लपक लो.
सच कहती हूं, डर से ये रिपोर्ट मैंने अपने आसपास के बेहद संवेदनशील मर्दों से भी शेयर नहीं की. उनसे तक नहीं, जो मोहब्बत के पुतले बने क्रांति की चिंगारी लगाते चलते हैं. डर है कि बड़ी मुश्किल से पैड तक पहुंच सकी औरतें, इस खुलासे के साथ एक बार फिर 50-60 साल पीछे चली जाएंगी.
बिल्कुल वही डर, जो पहली बार छेड़े जाने पर हुआ था. कुछ 11 साल की थी मैं. रोती-चिड़चिड़ाती, लंबे समय तक क्लास में पिछड़ती चली गई, लेकिन मजाल है कि ये बात घरवालों को बता सकी. छोटी थी, लेकिन खुद को घेरे जाने का मतलब समझती थी. पहली छेड़छाड़, पहली फब्ती, पहली जबर्दस्ती की बात लड़कियां अपने घरों में नहीं बता पातीं. अब जहरीले पैड्स की खबर को भी वे पचा जाएंगी. गलती भले किसी की हो, पक्का है कि सजा तो उन्हें ही मिलेगी.
ये दस्तूर प्राचीन समय से है, जब ग्रीक जानकार अरस्तू ने ‘ऑन द जेनरेशन ऑफ एनिमल्स’ में औरत के बारे में जमकर लिखा था. उन्होंने बताया कि वे असल में मर्दों का ही टूटा-फूटा रूप हैं. कमजोर-आलसी और बात-बात पर रोने वाली. बात रसीली थी, और काम की भी. तो सरहदें पार करती हुई जमीन के हर हिस्से तक पहुंच गई. औरतें जब मर्दों का बिगड़ा रूप हैं तो भला उनपर अलग से क्या ध्यान देना! तो बस, मेडिकल साइंस का सारा फोकस पुरुषों पर आ गया. बाकी रही औरतें, तो उन्हें हिस्टीरिकल कहकर रोने-कलपने छोड़ दिया गया.
ऑस्ट्रेलियन-अमेरिकन लेखिका गैब्रिअल जैकसन ने अपनी किताब ‘पेन एंड प्रिज्युडिस’ में बताया कि किस तरह अमेरिका जैसे ताकतवर देश में भी नब्बे के आखिर तक ड्रग ट्रायल औरतों पर नहीं होता था. सारी जांच पुरुष देह के मुताबिक होती, स्त्रियों के शरीर में बस दवा घुसेड़ दी जाती. ठीक इसके बाद उनके बुरी तरह बीमार होने की खबरें आने लगीं. आनन-फानन 10 प्रचलित दवाएं मार्केट से गायब हो गईं. साल 2018 में भेद खुला कि चूंकि वे सारी दवाएं सिर्फ पुरुषों को ध्यान में रखते हुए बनी थीं, औरतों पर वे खतरनाक असर डाल रही थीं.
अब से कुछ सालों बाद शायद सैनिटरी पैड्स पर भी कोई सनसनीखेज रिपोर्ट आए.
पता लगे कि दुनियाभर की महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर या हाइपरटेंशन का जिम्मेदार गुलाबी-नीली पन्नी में लिपटा खुशबूदार पैड है. शायद तब तक ज्यादातर औरतें खप चुकी होंगी. या- बाकी तो होंगी, लेकिन नफरतें तब तक खून में ऐसी घुल चुकी होंगी कि वे औरत होने तक से इनकार कर देंगी.
शुरुआत हो भी चुकी.
औरतें पीरियड्स बंद करवा रही हैं. लगभग पूरे पश्चिम में मेन्सट्रुअल सप्रेशन का चलन आ गया है. पहला पीरियड आने के बाद कभी भी लड़की उसे रुकवा सकती है. हर महीने खून बहाकर, एनिमिक होकर, प्रेग्नेंसी झेलने का कोई मतलब नहीं. कोई मतलब नहीं, जब पीरियड्स के दर्द को नए जमाने का चोंचला कहकर मजाक बनाया जाए. या फिर खून-सोख्ता पैड में खतरनाक केमिकल भर दिया जाए कि औरत मर भी जाए तो किसे फर्क पड़ेगा.
फर्क तो पड़ता है बॉस! संभल जाओ क्योंकि शुरुआत हो चुकी है.