नागपंचमी पर दो बूढ़े सांप मिले. थे कवि. आपस में भिड़े. एक ने कहा कौन है आजकल ज्यादा खतरनाक इंसान या सांप या इंसानी सांप! इस पर हमने कविता रची है गुरु! कालजयी टाइप बन पड़ी है. सुनो..तुम सुनो... बहस चल रही थी इतने में पास में लेटे एक अजगर ने आकर दोनों को दो लातें जमाईं. साले-सोने भी नहीं देते. पावभर तो बचे हो. सांप और इंसान की बहस में लगे हो. जब ज़हर था तब क्या कर लिया, अब बूढ़े हो, ऊपर से कवि हो... किसी ने सुन लिया तो फोकट में मारे जाओगे. दोनों सांप अजगर के सामने ही फिर गुत्थम-गुत्था होने लगे. तब अजगर ने एक को पूंछ में लपेटा. दूसरे को मुंह में भरा. कर्रा झटका. एक-एक तरफ पटका. फिर बोला- कमीनो! बड़े साहित्यिक बनते हो. रचना सुनाने पर लड़ते हो. साहित्यिक क़ायदों का तो ख़याल करो. बंद कमरों में लड़ो. पीछे से बुराई करो. जड़ें काटो. सार्वजनिक रूप से तो गले लगो. इंसानों में ही कौन से कम थे जो अब तुम लोग भी रचनाएं फुंफकारने लगे. खैर, अजगर तो सब निगल लेता है, उलट-पलट के सब पचा लेते है. हमें सुनाओ अपनी-अपनी रचना. हम बता देंगे किसकी कविता में है दम, कौन है बड़ा बम!
तब पहला सांप हांपा, थोड़ा खांसा..चश्मा ठीक किया और शुरू हो गया.
लीजिए बंधु सुनिए, शीर्षक है...
अजगर ने फिर कहा- श्रीमान् बंधु वगैरहा न कहें. हम अजगर हैं ऊपर से फिलहाल श्रोता भी हैं. जो आजकल हर कायदे से बहुत कम हैं. इनदिनों तो सुनने वालों का सम्मान ज्यादा है. इसलिए प्रोटोकॉल का ध्यान रखें.
अब पहला सांप बोला- ठीक है अध्यक्ष महोदय तो सुनिए, रचना पेश है...
आस्तीन का इंसान...
प्रिय सांप..
सांप हो तो सांप बनो..
विष उगलो या केंचुली छोड़ो..
डसो या ग्रास बनो..
इसी में तुम्हारे सांपत्व का सम्मान है..
आस्तीन का सांप बनना तो पूरी प्रजाति का अपमान है..
प्रिय सांप...
बूढ़े हो गए हो तुम..
फुंफकारना नहीं भूल रहे..
सौ-डेढ़ ग्राम ज़हर लेकर
धमकाना नहीं भूल रहे...
छठी का दूध याद आ जाएगा..
जब इंसान तुम्हें अपना विष दिखाएगा..
प्रिय सांप...
जमीन पर लोटना..
कुंडली मारना..
आंखों में भर लेना बदले की बात..
अभिनेता तो हो नहीं..
नेतागिरी में मारे जाओगे..
इंसानों की नक़ल..
गुरु,खतरनाक है तुम्हारा शग़ल..
प्रिय सांप...
देवताओं के काम आते हो..
विष्णु का छत्र बन जाते हो..
दर्द में दवा सा ज़हर तुम्हारा..
परोपकारी बन जाते हो..
पर,आस्तीन का इंसान..
आस्तीन के सांप से है खतरनाक..
इंसानों को तो है सब पता..
सांप तो भ्रम में है बेचारा..
प्रिय सांप...
दूर रहो इंसान से तो ही अच्छा..
लपलपाना, फुंफकारना, आड़े-तिरछे डोलना..
सारी सरपट चाल भुला देगा..
तुमसे,तुम्हारा मिस्टर विषधर वाला..
सरनेम तक, कल्टियों में छुड़ा लेगा..
सुनकर अजगर की आंखें भर आईं। उसने उठकर सांप की पीठ थपथपाई. गालों पर दो चुम्मियां लीं. पेड़ के खोखले में पूंछ डालकर एक चूजा निकाला और सांप को न्योछावर करके खुद खा लिया. फिर भरे गले से बोला. उस्ताद! क्या बात कही है.
तुमसे, तुम्हारा मिस्टर विषधर वाला..
सरनेम तक, कल्टियों में छुड़ा लेगा..वाह, वा..वाह, वा..!!
कुछ कहने सुनने को नहीं रह गया है. कविता खुद बोलती है. सब बयान कर देती है. कवि बूढ़ा जरूर है लेकिन कविता में धार है, जाति की चिंता समाई है इसमें..। सांप प्रजाति का राष्ट्रीय कवि होने की योग्यता रखता है रे तू तो... जय हो. यशस्वी हो. इतना कहकर अजगर ने फिर पेड़ के खोखले में पूंछ डालकर एक चूजा निकाला और सांप को न्योछावर करके निगल लिया. एक डकार ली. फिर दूसरे सांप की तरह मुंह करके बोला. हां बे!, अब तू सुना... देखें तेरी कविता में कितना दम है. दूसरा सांप थोड़ा लोटा-कुछ पोटा. कुछ पीछे हटा. फिर स्टार्ट लेकर शुरू हो गया.
सुनिए जनाब, मुलाहिज़ा फ़रमाइए, मतला पेश है.., हुज़ूर को जमेगा. आप ख़ानदानी हैं. रसिया हैं. आपके बाप-दादों ने कई कलमनवीसों को इज़्ज़त बख्शी है. हुज़ूर भी दाद..!
इतने में अजगर ने उसे रोका. फिर टोका. फिर बोला- मिस्टर!कलाम सुनाइए. जानवरों के साहित्य में इंसानी तौर-तरीके और चमचागिरी मत लाइए.
दूसरे सांप ने सिर झुकाया. आदाब बजाया. और शुरू हो गया.
इंसान की केंचुली..
सबसे खतरनाक होता है आस्तीन का इंसान..
दांत नहीं धारदार छुरे से लेता है भोंकने का काम..
शबनम की आड़ में लेता है कांटे बिछाने का दाम...
बांहों में अमरबेल की तरह फैलकर करता है अहसान...
दरख़्त को ही खोखला करने में जुटा होता है चारों याम...
जड़ों में डालकर मट्ठा करता है पेड़ को ही बदनाम...
और कभी सींचता है तेज़ाबी ज़हर से..
बुनियादें हिलाने तक रहता है आस्तीन में..
ढहती है जब कोई मीनार.खूंखार पंजे लेकर..
तभी खिसकता है ढूंढ़ने को नया शिकार...
कभी खुद की आस्तीन से ही निकल आता है इंसान..
तब जाती है जान..होता है फ़रामोशी का इल्ज़ाम..
सबसे खतरनाक होता है आस्तीन का इंसान..
अजगर ने रुमाल से आंखें पोंछी. उसने उठकर सांप की पीठ पर दाद की पूंछ फिराई. गालों पर चार चुम्मियां लीं. तीसरी बार पेड़ के खोखले में पूंछ डालकर एक चूजा निकाला और सांप को न्योछावर करके खा लिया. फिर भरे गले से बोला. उस्ताद! क्या बात कही है.
कभी खुद की आस्तीन से ही निकल आता है इंसान...
तब जाती है जान.. होता है फ़रामोशी का इल्ज़ाम..वाह, वा..वाह, वा...!!!
कुछ कहने सुनने को नहीं रह गया है. कविता खुद बोलती है. सब बयान कर देती है. कवि बूढ़ा जरूर है लेकिन वाणी में ओज है. चिंतन में भयानकता है. जाति की चिंता को स्वर दे डाला है तूने. तू भी सांप प्रजाति का राष्ट्रीय कवि होने की योग्यता रखता है. जय हो. तू भी यशस्वी हो. तमाम औपचारिक क्रियाकलापों के पश्चात अब अजगर ने पूछा-बेटा! जरा ये तो बताओ. दोनों की कविताओं में इतनी गहरी बात. दर्द की इतनी गहन भावना. यथार्थ का इतना अद्भुत संसार कैसे रचा है तुम दोनों ने..शरमाओ नहीं खुलकर जरा बताओ. इस बुढ़ापे में भी कहां से रिचार्ज करवाया है अपने अंदर का ज़हर..।
तब दोनों सांपों ने श्रद्धेय की चरणधूलि ली..उनकी सीनियरिटी को सलाम किया. बात को ताड़ लेने की क़ाबिलियत पर तारीफ का छोटा-मोटा कलमा पढ़ा. फिर रुंधे गले से बताया. महोदय! इस ज़हर के पीछे राज है गहरा. कुछ समय हम रहे इंसानों के संग.पिटारी में पड़े भोगते रहे कष्ट और गम. सुनते रहे इंसानी बातें.. उनकी हरकतें और जुबानी ज़हर देखकर भूल गए अपना ज़हर. जब तक उनकी कैद में रहे दहशत के मारे कांपते रहे. जब से छूटे हैं अपनी खैर मनाते हैं. हमारे काटे का तो फिर भी इलाज है, इंसानी ज़हर तो दादा, ला-इलाज है!!