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 2024 लोकसभा चुनाव BJP भले जीत जाए लेकिन पार्टी पर लगे ये 2 दाग कभी नहीं छूटेंगे

खुद को चाल-चरित्र और चेहरे वाली पार्टी कहने वाली भारतीय जनता पार्टी ने पिछले दिनों देश में 2 ऐसे काम काम किये हैं, जिनसे उनके समर्थक भी निराश हुए होंगे. पहला भ्रष्‍टाचार के आरोपी अशोक चव्‍हाण को न सिर्फ भाजपा में लिया, बल्कि उन्‍हें हाथों हाथ राज्‍यसभा भी पहुंचा दिया. दूसरा, चंडीगढ़ के मेयर चुनाव में जिस तरह खुल्‍लम खुल्‍ला धांधली की गई, जिसकी सुप्रीम कोर्ट तक भद पिटी. आखिर पार्टी को ये सब करने की क्‍या जरूरत थी?

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बीजेपी के कुछ फैसले समर्थकों को भी नहीं पच रहे हैं.
बीजेपी के कुछ फैसले समर्थकों को भी नहीं पच रहे हैं.

2024 लोकसभा का चुनाव बीजेपी जीतने की ओर अग्रसर है. यूपी में राम मंदिर उद्घाटन की लहर चल रही है. बात अब सिर्फ जीतने की नहीं रह गई है.अब लड़ाई सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 370 सीट के टार्गेट पाने की रह गई है. विपक्ष हताश और निराश है. इंडिया गठबंधन बुरी तरह बिखर चुका है. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन भी विपक्ष के लिए उम्मीद की किरण नहीं ला सका है. पर इस राजनीतिक लड़ाई में बीजेपी ने 2 ऐसे काम कर दिए हैं जिसके चलते इस पार्टी का पार्टी विद डिफरेंस का ठप्पा धूमिल पड़ रहा है. पार्टी के कट्टर समर्थक भी बीजेपी की इन करतूतों के चलते शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं. तमाम ऐसे कॉलमनिस्ट जो बीजेपी के समर्थन में अखबार काला करते रहे हैं उन्हें भी इन मुद्दों पर कुछ जवाब नहीं सूझ रहा है इसलिए वो निराश हैं. इसमें से एक घटना एक पार्टी के तौर पर उसके चरित्र पर संदेह पैदा करती रहेगी तो दूसरी घटना ने पार्टी की नीयत पर ही चोट करती है. ये दोनों घटनाएं मिलकर बरसों की कड़ी मेहनत से बनाई गई चाल और चरित्र वाली पार्टी की छवि को मटियामेट करती रहेगी. 

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आदर्श घोटाले के आरोपी को पार्टी में शामिल करना और राज्यसभा भेजना

राजनीतिक दलों में किसी भी बदनाम शख्स को पार्टी में शामिल करने का एक बहाना रहता था कि दोष सिद्ध न होने तक हर व्यक्ति निर्दोष है, पर वह दिन गुजरे अभी ज्यादा दिन हुए जब भाजपा ऐसे नेताओं से दूरी बनाकर चलती थी. भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपियों, बाहुबलियों और दागी नेताओं को पार्टी दूर से ही सलाम करती थी. तब भाजपा चाल, चरित्र और चेहरे की बात करती थी. यही कारण रहा कि 2004 में डीपी यादव और 2012 में बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल होने के महज चार दिन बाद ही बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था.पर महाराष्ट्र में आदर्श घोटाले के आरोपी कांग्रेस नेता पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण को जब से बीजेपी में एंट्री मिली और उन्हें राज्यसभा में भेजने की तैयारी हुई पार्टी के हार्डकोर समर्थक भी हैरान हैं.अभी हाल ही पार्टी ने यूपीए सरकार के वित्तमंत्री के खिलाफ जारी श्वेत पत्र में जिस घोटाले (आदर्श घोटाला) का जिक्र किया गया था उसके आरोपी को ही पार्टी में शामिल करने और सांसद बनाने पर पार्टी समर्थक हैरान और परेशान हैं.

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 हालत यह हो गई है कि रामचरित मानस के पन्नों को जलाने के आरोपी और आए दिन हिंदू देवी देवताओं को अपशब्द कहने वाले उत्तर प्रदेश के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने जिस दिन समाजवादी पार्टी छोड़ी तो कई भाजपाइयों को ये डर लगने लगा था कि कहीं उन्हें बीजेपी में एंट्री करने का मौका न दे पार्टी.  समर्थकों को यह लगने लगा है कि चुनाव जीतने के लिए किसी भी तरह का समझौता कर सकती है बीजेपी. वो तो भला हो कमलनाथ का जिन्होंने ऐन मौके पर बीजेपी में आने का इरादा बदल दिया. या यह भी हो सकता है कि अशोक चव्हाण की एंट्री से हुई बदनामी के डर से बीजेपी ने खुद कमलनाथ को शामिल करने का आइडिया त्याग दिया हो.

दरअसल अब तक भाजपा पर वाशिंग मशीन वाला केवल आरोप लगता रहा है. पर पिछले साल तक परिस्थितियां कुछ अलग थीं. जैसे शरद पवार की पार्टी छोड़कर एनसीपी नेता अजित पवार का ही मामला ले सकते हैं. अजित पवार और उनके कई सहयोगियों पर बीजेपी भ्रष्टाचार के कई आरोप लगाती रही है पर उन्हे पा्र्टी में शामिल करने के बजाय उन्हें एक पार्टी के रूप में साथ लिया गया. बीजेपी में शामिल करने का कदम नहीं उठाया गया. इसके चलते कम से कम कार्यकर्ताओं को मुंह छुपाने की नौवत नहीं आई थी. पर अशोक चह्वाण को पार्टी में शामिल करके राज्यसभा भेजना कुछ ज्यादा ही हो गया. आदर्श घोटाले में उन पर 2 मामले दर्ज हैं  एक सीबीआई ने किया है दूसरा ईडी ने. इसके अलावा उन पर एक मामला यवतमाल जिले में जमीन हड़पने का भी है.ये सही है कि उन पर अभी तीनों मामलों में सजा नहीं हुई है. पर पार्टी की चाल-चरित्र और चेहरे वाली इमेज तो धूमिल हो गई.

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वैसे तो भारतीय लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल की कोई विचारधारा नहीं रही है. कांग्रेस हो या समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी हो या शिवसेना सभी अपने राजनीतिक हित के लिए अपने विचारधारा से समझौता करती रही हैं. पर अब भारतीय जनता पार्टी किस मुंह से यह कह सकेगी कि हम औरों अलग हैं. 

चंडीगढ़ मेयर चुनाव में धांधली से कैसे मुंह छुपा पाएगी बीजेपी

देश में वोटिंग की शुचिता को बनाए रखने के लिए ईवीएम प्रणाली को सपोर्ट करने वाली पार्टी पर चंडीगढ़ मेयर चुनावों में धांधली करने का आरोप सिद्ध हुआ है. समझ में नहीं आता एक साल के लिए मेयर पद पर अगर बीजेपी नहीं भी रहती तो पार्टी का कौन सा नुकसान हो जाता है. चंडीगढ़ में मेयर पद जीतने के लिए जिस तरह का कार्य किया गया उससे खुद को पार्टी विद डिफरेंस का राग अलापने वाली पार्टी का इतना बड़ा नुकसा हुआ है जिसकी भरपाई जल्दी नहीं हो सकेगी.

चंडीगढ़ में हर साल मेयर, सीनियर डिप्टी मेयर और डिप्टी मेयर पद के लिए चुनाव होते हैं. इनका कार्यकाल एक साल का ही होता है. 30 जनवरी को इसके लिए चुनाव कराए गए.  चुनाव के बाद काउंटिंग में भाजपा के उम्मीदवार मनोज सोनकर को मेयर घोषित कर दिया गया. आप और कांग्रेस के साझा उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा. बीजेपी के  मनोज सोनकर ने INDIA गठबंधन के उम्मीदवार कुलदीप टीटा को 4 वोटों से हरा दिया.

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दरअसल ये सब कैसे हुए यह एक हॉरर कहानी जैसा है. पीठासीन अधिकारी ने कुल पड़े वोटों में से 8 वोट अमान्य करार दिए. इस पर आप और कांग्रेस ने एक वीडियो जारी कर आरोप लगाया कि अनिल मसीह कई वोटों पर पेन चलाते हुए रद्द किए हैं. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. सर्वोच्च अदालत ने माना कि चुनाव अधिकारी ने मतपत्रों को रद्द किया है. चंडीगढ़ में हुई इस घटना को लोकतंत्र का मजाक, जनतंत्र की हत्या कहा जा रहा है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने फिर से काउंटिंग कराके आम आदमी पार्टी के नेता को मेयर बनवा दिया है. पर यह कहानी कहती है कि बीजेपी को सत्ता की हवस बढ़ती जा रही है. मेयर जैसे चुनाव के लिए इस तरह की हरकत किसी भी पार्टी को शोभा नहीं देता है.

यह सही है कि जो पार्टी सत्ता में रहती है वो इस तरह की हरकतें करती रही है. पर इन्हीं सब कारणों से तो कांग्रेस को देश की  जनता ने बाय बाय कर दिया. कभी देश में चुनाव के नाम मतपत्रों की लूट , बूथ कैप्चरिंग और मतगणना में धांधली आम बात होती थी. बीजेपी के आम वोटर मध्यवर्ग का पड़ा लिखा तबका है. जो सभी चीजों को जांचता परखता है . फिलहाल पार्टी के लिए अभी संतोष की बात यह है कि इन दोनों ही मुद्दों को देश की जनता तवज्जों नहीं दे रही है. 2024 का लोकसभा चुनाव में विपक्ष मुद्दा विहीन है. विपक्ष के पास इतनी भी क्षमता नहीं बची है कि उपरोक्त बातों को भी मुद्दा बना सके.

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