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राम मंदिर उद्घाटन में पहुंचकर कांग्रेस मार सकती है 'चौका'!

कांग्रेस अपनी हिंदू विरोधी छवि से पहले ही बहुत नुकसान उठा चुकी है. पार्टी के पास मौका है कि राम मंदिर उद्घाटन समारोह में सम्मिलित होकर बरसों पुरानी अपनी हिंदूवादी छवि को फिर से जिंदा कर सके.

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राम मंदिर को लेकर कांग्रेस ले सकती है बड़ा फैसला
राम मंदिर को लेकर कांग्रेस ले सकती है बड़ा फैसला

अभी तक जैसी खबरें आ रही हैं उससे तो यही लगता है कि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह में कांग्रेस जाने की तैयारी में है. यह समारोह एक तरीके से नवनिर्मित राम जन्मभूमि मंदिर का उद्घाटन समारोह है.इस समारोह में न पहुंचने वाले दलों को भारतीय जनमानस में खलनायक के तौर पर प्रचारित करने में बीजेपी कोई कोर कसर नहीं छोड़ने वाली है. ये बात कांग्रेस अच्छी तरह समझती है . पर मुस्लिम वोटों को लुभाने में कांग्रेस अपने दूसरे कंपटीटर्स से कम नहीं पड़ना चाहती है, यही कारण है कि मंदिर के समारोह में जाने के बारे में पार्टी में पशोपेश की स्थिति बनी हुई है.राम मंदिर उदघाटन समारोह में अचानक जाने का फैसला लेकर कांग्रेस न केवल अपने प्रतिस्पर्धी साथी दलों को हैरान करने वाली है बल्कि बीजेपी को भी स्तब्ध करने वाली है.

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हिंदू कांग्रेस की रही है पहचान, मुस्लिम परस्त छवि के बाद हुआ पार्टी का बंटाधार

2014 में कंग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटनी ने केरल में पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा था कि ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ और अल्पसंख्यकों के प्रति झुकाव रखने वाली छवि सुधारनी होगी. उनके बयान के बाद कांग्रेस में बवाल मचा था पर जल्द ही उनकी बात को दबा दिया गया. पार्टी की ‘हिंदू विरोधी’ छवि  विरोधियों ने बना दी या स्वयं पार्टी ने ऐसी कारगुजारियां की आम जनमानस में यह बात बैठ गई कि कांग्रेस मुस्लिम परस्त पार्टी है. इस द्वंद्व में पार्टी बहुत दिनों से है . इसी क्रम में बार-बार राहुल गांधी और प्रियंका गांधी मंदिरों के चक्कर लगाते हैं पर फिर धर्मनिरपेक्षता के फैलाए झांसे में आ जाते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है कि कांग्रेस आजादी के पहले और आजादी के 4 दशक बाद तक हिंदू पार्टी रही है. यही कारण है कि  देश में जनसंघ को उभरने का मौका नहीं मिला. बंटवारे के समय भी एक तरफ मुस्लिम लीग थी दूसरी ओर हिंदुओं को रिप्रजेंट करने वाली कांग्रेस थी.वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं कि उपग्रहों और मिसाइलों, युद्धपोतों के नाम भारतीय शास्त्रों से लिए जाते रहे हैं. कांग्रेस के कार्यकाल में किसी भी बड़े समारोह का उद्घाटन दीप प्रज्जवलन और वैदिक मंत्रोच्चार से होता रहा है.राहुल गांधी और नरसिम्हाराव तक कांग्रेस हिंदू ही रही है. उसके बाद बीजेपी के अतिशय विरोध ने कांग्रेस को हिंदू विरोधी बना दिया या यूं कहें तो मुस्लिम परस्त छवि दे दी. 

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राजीव गांधी ने शाहबानो केस संविधान संशोधन करके मुस्लिम कट्टरपंथियों के सामने झुकने का ही कारण रहा कि पार्टी फिर से पूर्ण बहुमत में सत्ता हासिल करने में सफल नहीं हुई.बीजेपी के पास एक मौका है कि वो रामजन्मभूमि मंदिर उद्घाटन समारोह में जाकर अपनी छवि एक बार फिर से हिंदू कांग्रेस वाली बनाए. हो सकता है कि ऐसा करने से पार्टी बीजेपी के खिलाफ फिर तनकर खड़ी हो सके.

राम जन्मभूमि के लिए सबसे अधिक काम गिना सकती है कांग्रेस 

 कांग्रेस भी राम मंदिर निर्माण का श्रेय लेने की कोशिश में इतिहास के पन्ने पलटती रहती है. मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस के सीएम उम्मीदवार कमलनाथ ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए गए इंटरव्यू में एक बार कहा था कि हमें इतिहास नहीं भूलना चाहिए. राजीव गांधी ने पहली बार राम मंदिर का ताला खुलवाया था. साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि राम मंदिर एक पार्टी और एक व्यक्ति का नहीं है. यह भारत के हर नागरिक का है. राम मंदिर को बनाने में किसी के घर का पैसा तो नहीं लगा है. यह सरकार के पैसे से बन रहा है.

राम मंदिर को लेकर प्रधानमंत्री रहते राजीव गांधी ने भी काफी कुछ किया था. 1986 में पहली बार राम मंदिर का ताला खुलवाने का श्रेय भी राजीव गांधी को ही हासिल है. राजीव गांधी ने सिर्फ ताला ही नहीं खुलवाया था, बल्कि विश्व हिंदू परिषद को शिलान्यास की अनुमति भी दी थी, और कार्यक्रम में शामिल होने के लिए अपने मंत्री बूटा सिंह को भी भेजा था. हालांकि शाहबानो केस में उनकी गलती ताला खुलवाने पर भारी पड़ गई थी. ये राजीव गांधी ही रहे हैं जिनके कार्यकाल में दूरदर्शन पर रामानंद सागर के रामायण सीरियल को प्रसारित कराया गया. 1989 का चुनाव करीब आने तक राजीव गांधी के भाषणों में राम राज्य लाने का वादा सुनाई देने लगा था. 

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राजीव गांधी के बाद देश के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव बने .नरसिम्हा राव को आज की कांग्रेस अपना नहीं मानती . यही हाल रहा तो कुछ दिन बाद सुभाषचंद्र बोस और सरदार पटेल की तरह नरसिम्हा राव को भी बीजेपी हथिया लेगी. राम जन्मभूमि पर तीन किताबें लिखने वाले पत्रकार लेखक हेमंत शर्मा अपनी पुस्तक राम फिर लौटे में लिखते हैं कि  6 दिसंबर, 1992, दोपहर करीब 1 बजकर 40 मिनट पर बाबरी मस्जिद का पहला गुंबद गिराया गया. तब पामुलापति वेंकट नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री थे. दोपहर दो बजे के आसपास नरसिम्हा राव का फोन घनघनाता है. यह फोन कांग्रेस नेता और कैबिनेट मंत्री माखनलाल फोतेदार का था. वह  चेतक हेलीकॉप्टर से कारसेवकों पर आँसू गैस छोड़ने की सिफारिश कर रहे थे. बाबरी विध्वंस को रोकना चाहते थे. नरसिम्हा राव पूजा पर बैठे थे. राव ने फोतेदार की परेशानी का कोई हल नहीं दिया. बात राष्ट्रपति तक पहुंची. कैबिनेट की मीटिंग बुलाई गई. बहुत हंगामा हुआ. आंसू बहाए गए. लेकिन नरसिम्हा राव बुत बनकर बैठे रहे. यह सारी कहानी खुद फोतेदार ने बताई. नरसिम्हा राव को बाबरी मस्जिद का पूर्वानुमान था. राव चाहते तो कारसेवकों को रोका जा सकता था. राव विध्वंस के वक्त पूजा कर रहे थे. फोतेदार की बातें सच है या झूठ पता नहीं लेकिन इतना जरूर है कि नरसिम्हा राव बहुत पहले से किसी पूजा में लीन रह रामकाज के आतुर थे. 1991 से ही बाबरी विध्वंस की आवाजें उठ रही थीं. नरसिम्हा राव सब कुछ जानते थे.

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क्यों ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस उद्घाटन समारोह में जाने के मूड में है

पहले ऐसी खबरें सामने आई थीं, जिनमें कहा गया था कि सोनिया गांधी इस समारोह में हिस्सा लेंगी. लेकिन इसी शुक्रवार को कांग्रेस पार्टी ने साफ़ किया कि उनके समारोह में शामिल होने को लेकर सही समय पर घोषणा की जाएगी.राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होने या न होने को लेकर कांग्रेस खुलकर बयान देने से बच रही है.

कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश की माने तो सही समय पर फ़ैसला लिया जाएगा.  हालांकि इसी बीच पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता सैम पित्रोदा और शशि थरूर जैसे लोग मंदिर समारोह में जाने का विरोध भी कर दे रहे हैं. पर अगर इस तरह के विरोध पर कांग्रेस नेताओं को सफाई देना पड़े तो मतलब साफ है कि पार्टी इस समारोह को लेकर द्वंद्व में है. जयराम रमेश ने जिस तरह सैम पित्रोदा के बयान कांग्रेस पर खंडन जारी किया है उससे तो यही लगता है कि कांग्रेस चौंकाने वाला फैसला ले सकती है.
 द हिंदू अख़बार लिखता है कि सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने इस समारोह को कांग्रेस पार्टी को क्या रणनीति अपनानी है को लेकर वरिष्ठ नेताओं के साथ चिंतन भी हुआ है.
 माना जा रहा है कि सोनिया और खरगे की इस मुद्दे पर पी. चिदंबरम, अंबिका सोनी, केसी वेणुगोपाल, जयराम रमेश, दिग्विजय सिंह और रणदीप सिंह सुरजेवाला के साथ चर्चा हुई है. दिग्विजय सिंह के भी एक बयान से लग रहा है कि ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट किसी पार्टी का नहीं है और जाने पर क्या आपत्ति होनी चाहिए, सोनिया जी इसको लेकर सकारात्मक हैं, या तो वो या फिर हमारा प्रतिनिधिमंडल इसमें जाएगा.’

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समारोह में जाने से कांग्रेस को फायदे ही फायदे

जिन लोगों को पंजाब की राजनीति की समझ होगी उन्हें पता है कि आज भी पंजाब में बीजेपी अपनी जड़ें नहीं जमा पाईं हैं इसके पीछे सबसे बड़ा कारण रहा है कि पंजाब में हिंदुओं की पार्टी कांग्रेस है. सरदारों की पार्टी अकाली दल है. अकालियों के साथ काफी दिनों से बीजेपी छोटे भाई की भूमिका में राजनीति कर रही है,पर बड़े भाई के भूमिका में आने का मौका अभी भी बहुत दूर है. अमरिंदर सिंह जब प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तो कई बार खुलकर कई मुद्दों पर अपनी पार्टी कांग्रेस से अलग रुख रखते थे. जो देखने में काफी हद तक बीजेपी के नजदीक होता था. अमरिंदर ने कट्टर अकालियों के खिलाफ मोर्चा खोलकर ही सत्ता में वापसी की थी.

यही हाल पूरे देश की राजनीति का है. आज बीजेपी को हराने के लिए कांग्रेस को हिंदूवादी चेहरा ही अपनाना होगा. एमपी में कमलनाथ , छत्तीसगढ़ में भूपेश सिंह बघेल इसे भली भांति क्रियान्वित कर रहे थे. पर कांग्रेस पार्टी की हिंदू विरोधी रवैये ने उनके हिंदू समर्थकों कामों पर पानी फेर दिया. आज की हिंदू राजनीति को बीजेपी ने उस ऊंचाई पर पहुंचा दिया है कि नीतीश और तेजस्वी की सरकार बिहार में सरकार खर्च पर भव्य सीता मंदिर बनवाने का ऐलान कर चुके हैं. उड़ीसा में नवीन पटनायक पूरी में भव्य कारि्डोर बनवा रहे हैं. राजस्थान -मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ में कांग्रेस ने दर्जनों ऐसे काम किए जो हिंदू समर्थक छवि बनाने के लिए किए गए थे. पर नैशनल लेवल पर मुस्लिम परस्त छवि ने उन सारे प्रयासों पर पानी फेर दिया. अगर कांग्रेस राम जन्मभूमि मंदिर के समारोह में जाती है तो एक बार फिर से हिंदू फेस बनाने की कोशिश करती है तो पार्टी कई स्टेट में बेहतरीन प्रदर्शन कर सकती है.

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