अरविंद केजरीवाल चाहते तो मोहन भागवत से ये सवाल पहले भी पूछ सकते थे, क्योंकि जेपी नड्डा की बातें तो लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान ही एक इंटरव्यू के जरिये सामने आई थी - लेकिन आम आदमी पार्टी नेता को अब मौका माकूल लगा है.
तब अरविंद केजरीवाल ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हटाये जाने की आशंका जताई थी, अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हटाने को लेकर सवाल उठा रहे हैं.
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को तब ये बातें महत्वपूर्ण नहीं लगी होंगी, या हो सकता है अभी के लिए पहले ही प्लान कर लिया हो - और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत की हालिया टिप्पणियों ने केजरीवाल का उत्साह बढ़ाया हो.
लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजे आने के बाद से किसी न किसी बहाने मोहन भागवत की सलाहियत सुनने को मिलती रही है - और यही वजह लगती है कि केजरीवाल को इसके जरिये मोदी और बीजेपी को टारगेट करने का आइडिया सूझा हो.
जनता की अदालत में पहुंचे अरविंद केजरीवाल को दिल्लीवालों के सामने भगवान राम की तरह पेश किया जा रहा है, लेकिन ये सब राम-राज्य लाने वाले या हिंदुत्व की राजनीति वाले एजेंडे के तहत नहीं, बल्कि इसलिए, क्योंकि दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया खुद को वो लक्ष्मण मानते हैं - और राम-लक्ष्मण की सियासी जोड़ी के लिए सिसोदिया अब बीजेपी को रावण बता रहे हैं.
मौका देखकर अरविंद केजरीवाल ने एक और पुरानी चाल चली है. लोगों से वो पूछ रहे हैं, क्या वे सोचते हैं कि वो 'चोर' हैं, या फिर उनको जेल भेजने वाले चोर' हैं?
दिल्ली विधानसभा चुनाव को अपने लिए अग्नि परीक्षा बताते हुए अरविंद केजरीवाल कहते हैं, अगर लोग सोचते हैं कि वो बेईमान हैं, तो उनको वोट न दें. 2020 के चुनाव में भी अरविंद केजरीवाल ने ऐसे ही बोला था, अगर लोग उनको आतंकवादी मानते हैं तो बीजेपी को वोट दे दें.
केजरीवाल के सवाल और उनके मायने
आम आदमी पार्टी की तरफ से बनाई गई जनता की अदालत में जैसे ही अरविंद केजरीवाल मंच पर पहुंचे, 'न रुकेगा, न झुकेगा...' के नारे लगाये जाने लगे. तब आप के कुछ समर्थकों ने हाथ में 'हमारे केजरीवाल ईमानदार हैं' लिखा पोस्टर भी देखा गया - अरविंद केजरीवाल ने मोहन भागवत से जो 5 सवाल पूछे हैं, उनमें प्रमुख हैं.
BJP को कठघरे में खड़ा कर RSS से सवाल: अरविंद केजरीवाल का कहना है कि बीजेपी, RSS की कोख से जन्मी है, और संघ को लेकर बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा की बात याद दिलाते हुए पूछते हैं, क्या बेटा मां से बड़ा हो गया है?
और इस तरह अरविंद केजरीवाल संघ प्रमुख मोहन भागवत से सीधे सीधे पूछ रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, और उनके कैबिनेट साथी अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी और उसकी केंद्र सरकार जो कुछ कर रही है, क्या उसमें संघ की भी मंजूरी है?
मोदी के साथ आडवाणी जैसा व्यवहार क्यों नहीं: लोकसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हटाये जाने की आशंका जता रहे थे, अब पूछ रहे हैं कि अगर उम्रदराज होने के कारण सबसे सीनियर नेता लालकृष्ण आजवाणी को हटाया जा सकता है, तो 75 साल के होने जा रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ये नियम क्यों नहीं लागू हो सकता?
बीजेपी के तमाम बुजुर्ग नेताओं का नाम गिनाते हुए अरविंद केजरीवाल, अमित की बात का जिक्र करते हैं, मोदी पर वो नियम लागू नहीं होता - और अब वो मोहन भागवत से जवाब मांग रहे हैं.
देखना है, संघ का रिएक्शन किसी एक्टिविटी में नजर आती है, या चुप्पी साध कर दिल्ली बीजेपी के नेताओं की प्रतिक्रिया के साथ ही ये मुद्दा खत्म हो जाता है - लेकिन केजरीवाल भी शांत हो जाएंगे, ऐसा तो नहीं लगता.
लोकतंत्र के लिए खतरनाक राजनीति? अरविंद केजरीवाल ने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ केंद्रीय जांच एजेंसियों के जरिये खौफ पैदा करने का इल्जाम लगाया है.
संघ प्रमुख से मोहन भागवत का सवाल है, क्या ये सब भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरनाक नहीं है?
क्या बीजेपी वाशिंग मशीन बन गई है: अरविंद केजरीवाल ने मोहन भागवत से भ्रष्टाचार के आरोपी नेताओं को बीजेपी में शामिल किये जाने को लेकर भी पूछा है. कहते हैं, ‘जिन नेताओं को मोदी और अमित शाह ने पहले भ्रष्ट कहा, बाद में उन्हीं को बीजेपी में शामिल कर लिया गया - क्या आपने ऐसी BJP की कल्पना की थी? क्या RSS इस तरह की राजनीति से सहमत है?
केजरीवाल के सवालों का कोई असर होगा क्या?
अरविंद केजरीवाल के सवाल उठाने से लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन पर तो कोई फर्क नहीं पड़ा था, लेकिन योगी आदित्यनाथ और बीजेपी नेतृत्व के बीच टकराव तो हुआ ही - और उस पर लगाम भी तभी लगी जब संघ का चाबुक चला.
अब जबकि अरविंद केजरीवाल ने एक बार फिर वैसे ही अंदाज में बीजेपी को निशाना बनाया है, सवाल है कि क्या दिल्ली चुनाव में ऐसी बातों से आम आदमी पार्टी को कोई फायदा होगा - लोकसभा के नतीजों के लेंस से देखें तो बिलकुल नहीं.
तो क्या अरविंद केजरीवाल के सवालों से बीजेपी और संघ के बीच वैसा टकराव संभव है, जैसा बीजेपी नेतृत्व और योगी के बीच कुछ दिन पहले देखा गया था?
संघ के नजरिये से देखें तो वो चीजों को दो तरीके से लेता है. पहली महत्वपूर्ण बात ये होती है कि किसी भी नेता की राजनीति संघ के हिंदुत्व के एजेंडे से कहां तक मेल खाती है - और दूसरी बात ये कि अगर वो नेता बीजेपी विरोध की भी राजनीति करता है, तो क्या बीजेपी की किसी रणनीति से लोगों की भावनाओं पर ऐसा कोई प्रभाव पड़ सकता है, जिसका वे नेता बीजेपी के खिलाफ उसका फायदा उठा सकते हैं.
हाल ही में मोहन भागवत ने जिस तरीके से ‘जय श्रीराम’ और ‘भारत माता की जय’ जैसे बीजेपी के नारों को खारिज किया है - उसमें भी वही राजनीतिक लाइन महसूस की जा सकती है.
बीजेपी के नारों को लेकर मोहन भागवत की ये समझाइश सीधे ममता बनर्जी से कनेक्ट हो रही है. मोहन भागवत ने 2019 में देवेंद्र फडणवीस को शिवसेना से गठबंधन तोड़ने के मामले में भी सावधान किया था. ये बात अलग है कि बीजेपी ने शिवसेना के टुकड़े ही कर डाले.
उद्धव ठाकरे और योगी आदित्यनाथ में समानता यही है कि दोनो की पॉलिटिकल लाइन एक है, जबकि दोनो में से कोई भी न तो संघ की पृष्ठभूमि से राजनीति में आया है, न ही वो प्रत्यक्ष तौर पर बीजेपी से ही जुड़ा रहा है.
आपको याद होगा, रामलीला आंदोलन के दौरान संघ कार्यकर्ताओं के कारसेवा की काफी चर्चा हुई थी - और कालांतर में अरविंद केजरीवाल को भी हिंदुत्व की राजनीति में घुसपैठ करने की कोशिश करते देखा गया.
अरविंद केजरीवाल की एक बड़ी खासियत है कि वो शुरू से ही कांग्रेस के लिए परजीवी साबित हुए हैं, और उनकी वजह से हमेशा ही कांग्रेस का नुकसान हुआ है. बल्कि, बीजेपी को 2014 में केंद्र की सत्ता पर काबिज होने में भी अरविंद केजरीवाल के रामलीला आंदोलन से बहुत फायदा हुआ.
असल में, संघ को यही राजनीतिक लाइन सूट करती है. बेशक संघ चाहता है कि देश भर में बीजेपी का ही शासन हो, लेकिन बीजेपी बेकाबू हो जाये, कभी नहीं चाहेगा. हाल फिलहाल इसे साफ तौर पर देखा भी जा सकता है.
अरविंद केजरीवाल की राजनीति की उसी हेयरलाइन-गैप पर प्रहार की कोशिश लगती है, ये बताने, समझाने और पूछने की भी कोशिश है - जो कुछ आप नेताओं के साथ हो रहा है, क्या संघ उन बातों से सहमत है?
चुनावी तौर पर हो सकता है लोकसभा की तरह आगे भी अरविंद केजरीवाल को कोई फायदा न हो, लेकिन संघ की वजह से अगर थोड़ी सी भी राहत मिल जाये, और संघ को बचाव की मुद्रा में आना पड़े तो बहुत बड़ी बात होगी.
वैसे भी संघ की तरफ से पहले ही बीजेपी को कहा जा चुका है, दिल्ली में लोकल लीडरशिप तैयार करे. बीजेपी कोशिश तो कर रही है, लेकिन स्टाइल बिलकुल अलग है, और मुमकिन है वो शायद संघ को पसंद न हो. अरविंद केजरीवाल को तो अभी बस इतनी ही जरूरत है.