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महाकुंभ पर योगी को जितना घेरेंगे अखिलेश, उतना ही अपना राजनीतिक नुकसान करेंगे

अखिलेश यादव एक तरफ तो कुंभ की दुर्दशा की बात करते हैं जबकि दूसरी तरफ यह भी कह रहे हैं कि कुंभ की अवधि को और बढ़ा दिया जाए ताकि बाकी बचे लोग भी स्नान का लाभ उठा सकें. क्या कुंभ कोई सरकारी आयोजन है कि इसकी अवधि बढ़ाना सरकार के हाथ में है?

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अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ
अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ

समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव कुंभ की दुर्दशा को मुद्दा बनाने का प्रयास इसकी शुरूआत के पहले से कर रहे हैं. जैसे-जैसे कुंभ में भीड़ बढ़ती गई उनकी आलोचना भी तेज होती गई है. अखिलेश यादव ने खुद तो कुंभ स्नान करते हुए अपनी फोटो रिलीज कर दी ताकि उन्हें कोई सनातन विरोधी न मान ले पर भरसक उनकी कोशिश यही रही कि प्रयागराज पहुंचने वालों की संख्या कम से कम हो.पर कुभ जाने वालों को न दुष्प्रचार ही रोक सका और न ही भगदड़ में हुई मौतें.  एक बात और है कि अखिलेश यादव एक तरफ लगातार कुंभ आयोजन में भ्रष्टाचार और दुर्दशा की बात कर रहे हैं और दूसरी तरफ यह भी डिमांड कर रहे हैं कि आयोजन की अवधि और बढ़ाई जाए. इस तरह का दोहरा रवैया अपनाकर अखिलेश यादव अपने समर्थकों को भी कन्फ्यूज कर रहे हैं. जाहिर है कि 2024 लोकसभा चुनावों में उन्होंने बीजेपी पर जो बढ़त हासिल की थी उसे कुंभ को लेकर उनका अति विरोध जल्द ही खत्म कर सकता है.

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1- कुंभ में दुर्दशा हो रही है तो कुछ और दिन बढ़ाने की डिमांड क्यों कर रहे अखिलेश

अखिलेश यादव ने सोमवार को कहा कि इस बार कुंभ में श्रद्धालुओं की जैसी दुर्दशा हुई है, वैसी कभी नहीं हुई थी. कुंभ में हुए हादसों और अव्यवस्थाओं ने भाजपा सरकार की पोल खोल दी है. सरकार की नाकामी से पूरी दुनिया में प्रदेश की बदनामी हुई है. वे प्रदेश पार्टी मुख्यालय पर सोमवार को विभिन्न जिलों से आए कार्यकर्ताओं और नेताओं को संबोधित कर रहे थे.  उन्होंने कहा कि महाकुंभ में अभी भी करोड़ों लोग स्नान नहीं कर पाए हैं. लिहाजा, कुंभ की अवधि बढ़ाई जानी चाहिए. इतना ही नहीं वो कुंभ के आयोजन के लिए स्थायी और बुनियादी ढांचा विकसित करने की जरूरत बताते हैं और इसके लिए दो लाख करोड़ रुपये का कार्पस फंड बनाने की भी मांग करते हैं. अखिलेश यादव के इन डिमांड को सुनकर कौन मानेगा कि अखिलेश यादव की कुंभ में दुर्दशा वाली बात सही हो सकती है. क्या अगर किसी आयोजन में इतनी दुर्दशा है  कि लोगों की जान पर बन आ रही है तो उस आयोजन को बढ़ाने की बात की जा सकती है? पर अखिलेश  यादव ऐसा ही कर रहे हैं . एक तरफ तो वो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों को सही मानते हुए यह मानते हैं कि कुंभ का पानी नहाने योग्य नहीं रह गया है. पर आश्चर्य है कि इसके बावजूद भी वे सरकार से अपील कर रहे हैं कि आयोजन की अवधि बढ़ा दी जाए ताकि जो लोग छूट गए हैं वो भी स्नान कर सकें. इस तरह का दोहरे स्टैंडर्ड वाले बयानों से आम लोग ही नहीं अखिलेश के फैन भी सदमे में हैं. 

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2-कुंभ के दुर्वयवस्था की बातें लोगों को पच नहीं रही 

अखिलेश यादव कहते हैं कि ये कुंभ हर 12 साल पर होता है. ये कोई नई बात नहीं है. बीजेपी ने इतना पैसा लगाया, इतना प्रचार किया, लोगों को निमंत्रण दिया और उसके बाद उनके हाल पर छोड़ दिया. अखिलेश यह भी कहते हैं कि व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए, क्योंकि मुख्यमंत्री जी ये कहते रहे हैं कि हमने 100 करोड़ लोगों के लिए व्यवस्था की है. यहां तक तो अखिलेश जो कह रहे हैं वो विपक्ष के नेता की हैसियत से उनका अधिकार बनता है और उन्हें यह करते रहने चाहिए. पर जब विरोध का मतलब कुछ भी बोलना हो जाता है तो जनता को भी अपच होने लगता है.

अखिलेश कहते हैं कि जो ट्रैफ़िक जाम हुआ, जो लोग वॉशरूम नहीं जा पाए, खाना नहीं खा पाए और भगदड़ में लोगों की जान गई. इसका आंकड़ा सरकार नहीं बता पा रही है. यहां भी भगदड़ में होने वाले मौत के बारे में तो पूछना उनका बनता है पर जब वो ट्रैफिक जाम और वॉशरूम नहीं जा पाने का भी हिसाब लगाने लगते हैं तो यही लगता है कि वो केवल विरोध के लिए ही विरोध कर रहे हैं.

रही बात ट्रैफिक जाम वॉशरूम नहीं जाने की तो पिछले एक हफ्ते से आगरा और नोएडा के बीच यमुना एक्सप्रेस वे दोनों तरफ करीब दर्जन भर ढाबे और रेस्त्रा में भी यही स्थिति है. आम दिनों में ये करीब करीब खाली ही रहते हैं. कभी भी इन्हें 50 प्रतिशत से अधिक भरा हुआ नहीं देखा गया. पर कुंभ से आने वाली भीड़ के चलते इन ढाबों और रेस्त्रां में इतनी भीड़ है कि घंटों की मशक्कत के बाद यही यहां खाना और वॉशरूम जाने को नहीं मिल रहा है. ये हाल प्रयागराज से 700 किलोमीटर दूर का है. दरअसल जब तीर्थयात्री टूरिस्ट में बदल जाएंगे तो ऐसी हालत होनी तय है.  कुंभ लोग पर्यटन करने के लिए नहीं जाते हैं. कुंभ हिंदुओं के लिए तीर्थ है. तीर्थयात्रा में इतनी परेशानियां तो होती ही हैं. ये धार्मिक दृष्टि रखने वाला हर तीर्थयात्री समझता है और मानता भी है. यही कारण है कि कहीं से भी असंतोष की आवाज नहीं उठ रही है. लोग भक्ति भाव से किसी भी कीमत पर संगम में डुबकी लगाने के लिए तैयार हैं.उनके आगे ट्रैफिक जाम, गंदे वॉशरूम और खाना पानी मिलने का मामला गौड़ हो जाता है. 

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3-हादसों के बाद लगातार भीड़ बढती रही

 अखिलेश यादव कहते हैं कि बड़े पैमाने पर लोग खो गए और आज भी एक्सीडेंट हो रहे हैं. ये डबल इंजन नहीं बल्कि डबल ब्लंडर सरकार है. समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाया कि न सरकार ने पर्याप्त बसों की व्यवस्था की और ना ही पर्याप्त ट्रेनों की. वो कहते हैं कि कुंभ की तैयारी को लेकर सरकार ने दावा किया है कि लगभग 15 हजार करोड़ रुपए ख़र्च किए गए हैं, लेकिन श्रद्धालु अव्यवस्था की वजह से परेशान हैं.

दरअसल अखिलेश यादव केवल विरोध के नाम पर ही विरोध कर रहे हैं इसिलए जनता उन्हें हल्के में ले रही है. 13 जनवरी से शुरू हुआ प्रयागराज महाकुंभ कल बुधवार को महाशिवरात्रि पर खत्म हो रहा है. अभी तक 43 दिनों में ही 60 करोड़ से ज्यादा श्रद्धालु कुंभ में स्नान कर चुके है.हादसों की बात करें तो मौनी अमावस्या पर भगदड़ में मरने वाले और नई दिल्ली स्टेशन पर मची भगदड़ में मरने वालों की संख्या से कहीं ज्यादा की मौत सड़कों पर हुए एक्सिडेंट में हुई है. महाकुंभ के 43 दिन में 100 से ज्यादा रोड एक्सीडेंट में 150 लोगों की मौत की सूचना है. 385 लोग घायल बताए जा रहे हैं. अगर आम दिनों के आंकड़ों को देखेंगे तो हादसों में मरने वालों की संख्या कम नहीं होती है. अगर हादसे सरकार की लापरवाही से होते तो जाने वालों को इसकी फिक्र होती और लोग कुंभ जाने का अपना प्रोग्राम ड्रॉप कर देते. जो लोग कारों से सड़क मार्ग से कुंभ की ओर जा रहे हैं उसमें वामपंथियों की भाषा में सभी धर्मभीरू मूर्ख लोग नहीं हैं. ये लोग समझते हैं कि एक्सिडेंट का कारण खराब व्यवस्था नहीं है. अगर इन्हें पता होता कि इतनी दुर्वयवस्था है कि प्रयागराज कुंभ में भगदड़ का शिकार हो जाएंगे या सड़कें इतनी खराब हैं कि जानलेवा हैं तो ये लोग कतई प्रयागराज का रुख नहीं करते. मौत के आंकड़ों को दिखाकर ये केवल कुंभ का दुष्प्रचार करना ही है. 

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4-कुंभ नहाकर आने वाले सभी जय जयकार ही कर रहे हैं क्यों?

हमारे और आपके आस पास तमाम लोग कुंभ से लौटकर आ रहे हैं . एक बात पर गौर करिएगा जो लोग कुंभ स्नान कर लौटे हैं वो व्यवस्था में कुछ खामियों की बात करेंगे पर ये नहीं कहेंगे कि व्यवस्था कोलेप्स हो गई है. ठीक इसके विपरीत जो लोग कुंभ नहीं गए हैं सारी दुर्व्यवस्था उन्हें ही दिख  रही है. ऐसा क्यों और कैसे हो रहा है? जाहिर है कि दलगत समर्थन और विरोध इसका कारण है. कुंभ से लौटकर आने वाला हर शख्स अगर बम बम कर रहा है तो इसका मतलब है कि उसे सब कुछ अच्छा ही लगा है.

दूसरी बात यह भी है कि तमाम ट्रैफिक जाम , बसों की कमी, ट्रेनों की कमी का आरोप अखिलेश यादव लगा रहे हैं पर उत्तर भारत से कुंभ जाने वाला हर शख्स 24 घंटे से 36 घंटे में कुंभ जाकर लौट भी आ रहा है . इतना ही नहीं चाहे अपनी कार से लोग जा रहे हैं या ट्रेन या बस से सभी इतने ही समय में जाकर वापस भी हो रहे हैं. अगर सब कुछ खराब होता तो क्या इतनी जल्दी वापसी संभव हो सकती थी. जाहिर है कि सड़कों पर जाम है पर स्मूथली उसे हैंडल किया जा रहा है. घाटों पर भीड़ है पर लोग स्नान कर सकुशल घर पहुंच रहे हैं. इसकी तहकीकात के लिए आप अपने आस पास गए लोगों से पूछ सकते हैं. मतलब साफ है कि कुंभ के दुर्व्यवस्था की बात करने वाले लोग अपने दलगत हितों को देख रहे हैं.

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