महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले उद्धव ठाकरे के लिए दिल्ली का एक दौरा जरूरी हो गया था. राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे सहित INDIA ब्लॉक के नेताओं से मिलकर उद्धव ठाकरे ने मिशन पूरा भी कर लिया है. दिल्ली दौरे में एक महत्वपूर्ण मुलाकात अरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल से भी हुई है. उद्धव ठाकरे के साथ उनके बेटे आदित्य ठाकरे और संजय राउत भी बातों और मुलाकातों में मौजूद रहे.
उद्धव ठाकरे की सबसे बड़ी मुश्किल यही रही कि कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिला लेने के बाद उनकी पुरानी सहयोगी बीजेपी के साथ साथ बाकी राजनीतिक विरोधियों ने उनके हिंदुत्व पर सवाल उठाना शुरू कर दिया था - और आगे चल कर वही मुद्दा उनको सत्ता के साथ साथ शिवसेना से भी हाथ धोने की वजह बना.
ये तो लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र के लोगों से मिला सपोर्ट है कि उद्धव ठाकरे फिर से गरजने लगे हैं, जाहिर है निशाने पर तो मोदी, बीजेपी और एकनाथ शिंदे ही होंगे - और मोदी पर हमला बोलने के लिए वो सबसे ताजा मसले बांग्लादेश संकट का इस्तेमाल करते हैं.
दिल्ली में उद्धव ठाकरे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए 'पापा' शब्द का इस्तेमाल किया है. असल में इस शब्द का इस्तेमाल कर सोशल मीडिया पर बहुत सारे मीम बनाये गये हैं. उद्धव ठाकरे भी उसी अंदाज में प्रधानमंत्री मोदी पर तंज कसते हैं.
उद्धव ठाकरे का कहते हैं, 'अगर वो यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध रोक सकते हैं... तो पापा से कहें कि वो इस युद्ध को भी रोकें... पापा, बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार हो रहे हैं... कृपया उनके साथ न्याय करें.'
उद्धव ठाकरे का एक बयान आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह जैसा भी सुना गया है. शिवसेना (UBT) नेता उद्धव ठाकरे ने आशंका जताई है कि भारत में भी बांग्लादेश जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. कहते हैं, केवल एक ही संदेश है... जनता सबसे ऊपर है और किसी भी राजनेता को उनके धैर्य की परीक्षा नहीं लेनी चाहिये. अगर आप ऐसा करते हैं, तो बांग्लादेश में देखा गया कि जनता की अदालत क्या कर सकती है... जनता की अदालत सर्वोच्च है... जनता की अदालत ने बांग्लादेश में फैसला सुनाया है.
बांग्लादेश के बहाने उद्धव ठाकरे शायद महाराष्ट्र के लोगों की भी बात करना चाहते हैं. लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र के लोगों ने सत्ताधारी गठबंधन महायुति से ज्यादा सीटें महाविकास आघाड़ी को दी है.
मुश्किल ये है कि एमवीए के तीनों सहयोगियों के हिस्से आई लोकसभा सीटों की संख्या ही आगे कलह की वजह बन सकती है - और महाराष्ट्र में विपक्षी गठबंधन के मुख्यमंत्री पद के चेहरे पर उद्धव ठाकरे का दावा उसी का एक नमूना है.
मुख्यमंत्री की कुर्सी पर फिर उद्धव का दावा
ये मुख्यमंत्री की कुर्सी ही है जो 2019 में बीजेपी और शिवसेना गठबंधन के टूट जाने की सबसे बड़ी वजह बनी थी. गठबंधन में चुनाव लड़ने के बाद उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री का आधा कार्यकाल अपने हिस्से में मांगने लगे तो बीजेपी ने इनकार कर दिया. उद्धव ठाकरे का दावा था कि चुनाव से पहले ही बीजेपी के साथ बातचीत में ये तय हुआ था, लेकिन बीजेपी की तरफ से साफ साफ बोल दिया गया कि ऐसा कोई करार हुआ ही नहीं था.
बाद में बीजेपी के साथ नाता तोड़ कर उद्धव ठाकरे ने शरद पवार और कांग्रेस से हाथ मिला लिया, और महाविकास आघाड़ी की सरकार में मुख्यमंत्री भी बन गये. उद्धव ठाकरे के कार्यकाल का अभी आधा सफर ही पूरा हो पाया था कि एकनाथ शिंदे ने बगावत कर बीजेपी से हाथ मिला लिया - और खुद मुख्यमंत्री बन गये.
हिसाब किताब भी ऐसे किया कि शिवसेना पर भी काबिज हो गये, लेकिन लगता है महाराष्ट्र के लोगों को ये सब पसंद नहीं आया. लोकसभा चुनाव के नतीजों से तो यही लगता है कि एकनाथ शिंदे और बीजेपी दोनो को ही अपने किये का खामियाजा भुगतना पड़ा है.
हालिया चुनावी प्रदर्शन से उद्धव ठाकरे का भी जोश हाई दिखता है. दिल्ली पहुंचकर उद्धव ठाकरे ने अपनी तरफ से ये संकेत देने की कोशिश की है कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में वो महा विकास आघाड़ी की तरफ से मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनने के लिए तैयार हैं - ये कहने का एक सभ्य तरीका है. राजनीतिक बयान के रूप में देखें तो इसे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर दावेदारी ही माना जाएगा.
कांग्रेस नेतृत्व से मुलाकात से पहले उद्धव ठाकरे ने मीडिया से बातचीत के दौरान कहा, अगर मेरे सहयोगियों को लगता है कि मैंने बेहतरीन काम किया है, तो उनसे पूछें कि क्या वे मुझे मुख्यमंत्री के रूप में चाहते हैं?
लगे हाथ उद्धव ठाकरे अपनी तरफ से डिस्क्लेमर भी पेश कर देते हैं, मैंने मुख्यमंत्री बनने का सपना नहीं देखा था, न ही मैं ऐसा चाहता था... लेकिन मैं जिम्मेदारी से भागने वाला भी नहीं हूं... मैंने जिम्मेदारी ली, और अपनी क्षमता के मुताबिक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की कोशिश की... अगर मेरे साथियों को लगता है कि मैंने बेहतरीन काम किया है, तो उनसे पूछिये कि क्या वे मुझे मुख्यमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं. लोग फैसला करेंगे.
कुछ दिनों पहले जब ये सवाल शरद पवार से पूछा गया था, तो वो साफ तौर पर कुछ भी नहीं बोले, बल्कि सवाल को टालने के अंदाज में सामूहिक नेतृत्व की बात कर रहे थे. शरद पवार का ही एक और बयान था कि लोकसभा चुनाव में वो सीट शेयरिंग के मुद्दे पर कुछ नहीं बोले थे, लेकिन विधानसभा चुनाव में वैसा नहीं होगा.
मान कर चलना चाहिये, शरद पवार अपनी तरफ से उद्धव ठाकरे और कांग्रेस दोनों को एक साथ चेतावनी दे रहे हैं. शरद पवार का लहजा थोड़ा सख्त जरूर है, लेकिन कांग्रेस नेता नाना पटोले तो काफी दिनों से उद्धव ठाकरे से नाराज चल रहे हैं. हाल के एमएलसी चुनाव में उम्मीदवारों को लेकर नाना पटोले ने कड़ी नाराजगी जताई थी.
ऐसे में जबकि शरद पवार ने अपनी तरफ से उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनने को लेकर मंजूरी अभी तक नहीं दी है - क्या राहुल गांधी से मुलाकात में उद्धव ठाकरे अपनी बात समझा पाए होंगे?
उद्धव नहीं तो कौन होगा MVA का मुख्यमंत्री चेहरा?
2019 में उद्धव ठाकरे की अलग ही अहमियत थी. बीजेपी का साथ छोड़कर आने पर कांग्रेस और एनसीपी दोनो ने हाथोंहाथ लिया था. सत्ता और पार्टी गंवाने के बाद वो काफी कमजोर लगने लगे थे, लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों ने नये सिरे से जोश हाई कर दिया है - और वो जोश उनके बयानों में भी देखने को मिल रहा है.
ऐसे में सवाल ये भी है कि अगर उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं बन पाते, तो और कौन कौन लोग दावेदार हो सकते हैं? एक चेहरा तो आदित्य ठाकरे भी हैं, लेकिन जब उद्धव ठाकरे को खारिज कर दिया जाता है, तो आदित्य ठाकरे तो अभी राजनीति के छोटे बच्चे हैं.
आदित्य ठाकरे तो इसलिए भी नहीं टिक पाएंगे, क्योंकि मुख्यमंत्री रहते उद्धव ठाकरे काफी बीमार हो गये थे. उद्धव ठाकरे तबीयत खराब होने के कारण सरकार और पार्टी में तब ज्यादातर आदित्य ठाकरे की ही चलती थी, ऐसा बताया गया था - और एक झटके में एकनाथ शिंदे सब ले उड़े, आदित्य ठाकरे को हवा तक महसूस नहीं हुई.
उद्धव ठाकरे के बाद कांग्रेस नेता नाना पटोले और शरद पवार की सांसद बेटी सुप्रिया सुले भी मुख्यमंत्री पद के बड़े दावेदार हो सकते हैं.
1. मुख्यमंत्री पद पर सुप्रिया सुले की दावेदारी: देखा जाये तो सुप्रिया सुले की राह का कांटा निकल गया है. अजित पवार की वजह से शरद पवार चाहते थे कि सुप्रिया सुले को केंद्र में स्थापित कर दें. अजित पवार महाराष्ट्र की राजनीति में पहले से जमे हुए हैं, और उनके चलते सुप्रिया के लिए रास्ता मुश्किल था, लेकिन अब वो बात पूरी तरह खत्म हो चुकी है.
अब अगर अजित पवार बीजेपी का साथ छोड़कर पार्टी और परिवार में लौटते भी हैं तो राजनीतिक शरणार्थी जैसा ही हाल होगा, पहले जैसा न रुतबा होगा, न हैसियत - और मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी तो खत्म ही समझें.
2. नाना पटोले पहले से ही हुंकार भर रहे हैं: जब महाराष्ट्र में एमवीए का शासन था, और उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री, तब भी नाना पटोल कहा करते थे कि कांग्रेस अपने बूते सरकार बना सकती है, और ऐसा लगता था जैसे मौका मिले तो वो सरकार ही गिराने से भी नहीं चूकेंगे.
नाना पटोले, राहुल गांधी के बेहद करीबी हैं. पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू की वजह से सत्ता गंवा देने के बाद महाराष्ट्र को लेकर एक बार राहुल गांधी के मन में संकोच तो होगा ही. वैसे लोकसभा चुनाव में सबसे अच्छा प्रदर्शन तो कांग्रेस का ही रहा है. जब एमवीए की सरकार बनी थी तो कांग्रेस ने स्पीकर पद मांग लिया, और कांग्रेस में कई सीनियर नेताओं के होते हुए भी नाना पटोले स्पीकर बनाये गये - और फिर जब उनका मन भर गया तो वो महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष भी बन गये.
निश्चित तौर पर दिल्ली में मोदी पर हमला बोलने के साथ ही, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे के साथ मुलाकात में उद्धव ठाकरे अपनी धाक जमाने की कोशिश किये होंगे - क्योंकि मुख्यमंत्री पद के चेहरे के तौर पर अब सिर्फ शरद पवार ही नहीं, राहुल गांधी की मंजूरी की भी जरूरत होगी.