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ईको नहीं हो रही बात, काम नहीं कर रहा नेहरू ब्रह्मास्त्र! लेटरल एंट्री पर विवाद के सबक क्या?

यह पहला एग्जांपल नहीं है. पिछले कुछ दिनों से यह लगातार हो रहा है कि सरकार को अपने किसी कदम को लेकर सफाई देनी पड़ रही है, कदम पीछे खींचने पड़ रहे हैं. बैकफुट पर जाना पड़ रहा है. हताशा दिखाई दे रही है. भाजपा भी अपनी सरकार के किसी मामले को बहुत एग्रेसिव तरीके से नहीं उठा पा रही है. मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक एक तरह से सरकार बैकफुट पर दिखाई दे रही है.

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यूपीएससी लेटरल एंट्री
यूपीएससी लेटरल एंट्री

- लेटरल एंट्री के थ्रू 45 पद भरे जाएंगे ताकि व्यवस्था में विशेषज्ञता शामिल हो और कॉम्पटिशन को बढ़ावा दिया जा सके -मोदी सरकार

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- सरकार इस भर्ती के जरिये बैकडोर से यूपीएससी के प्रमुख पदों पर आरएसएस से जुड़े लोगों की नियुक्ति देने जा रही है. लेटरल एंट्री दलित, ओबीसी और आदिवासियों के हक पर हमला है- राहुल गांधी, नेता प्रतिपक्ष

- नेहरू के समय से ही इस तरह की व्यवस्था चल रही है, यहां तक की यूपीए के समय ही लेटरल एंट्री की व्यवस्था को सुधार आयोग ने प्रस्तावित किया था, व्यवस्थित किया था, अब विपक्ष इस पर हंगामा क्यों मचा रहा है- अश्विनी वैष्णव, केंद्रीय मंत्री 

और अंततः सरकार ने यूपीएससी को लिखा कि लेटरल एंट्री के थ्रू भरे जाने वाले पदों को निरस्त किया जाए.

ये क्या हुआ? सरकार की इस पॉजिटिव कहानी का क्लाइमेक्स आखिर ऐसा क्यों हुआ?

यह पहला एग्जांपल नहीं है. पिछले कुछ दिनों से यह लगातार हो रहा है कि सरकार को अपने किसी कदम को लेकर सफाई देनी पड़ रही है, कदम पीछे खींचने पड़ रहे हैं. बैकफुट पर जाना पड़ रहा है. हताशा दिखाई दे रही है. भाजपा भी अपनी सरकार के किसी मामले को बहुत एग्रेसिव तरीके से नहीं उठा पा रही है. मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक एक तरह से सरकार बैकफुट पर दिखाई दे रही है. आखिर कहां चला गया है मोदी सरकार या भाजपा का वो धांसू होल्ड जिसकी बदौलत वो विपक्ष की बोलती बंद रखने में कामयाब हो जाती थी? आखिर कहां चली गई है वो जोरदार संवादकला जिसकी बदौलत लोग मोदी के कायल हो जाते थे? आखिर कहां है आरएसएस की पाठशाला में सुशिक्षित नेताओं का वो जनसंवाद जिसकी बदौलत चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ मोदी..मोदी...नमो...नमो...गूंजता था! एक कद्दावर सी सरकार एकाएक इतनी असहाय क्यों दिखाई देनी शुरू हो गई है...आखिर इसकी वजह क्या है?
 
लेटरल एंट्री पर पक्ष-विपक्ष के हंगामे के बीच आइए, पहले जान लेते हैं कि पूरा मामला है क्या?

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तो ज़रा शुरू से शुरू करते हैं.... हुआ कुछ यूं कि सरकार की ओर से संयुक्त सचिव, निदेशक और उप-सचिव के 45 पदों के लिए लेटरल एंट्री का विज्ञापन निकाला गया. इसे लेकर बवाल मच गया. नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सरकार को इस मुद्दे पर घेर लिया. उनका कहना था कि सरकार इस भर्ती के जरिये बैकडोर से यूपीएसी के प्रमुख पदों पर आरएसएस से जुड़े लोगों को नियुक्ति देने जा रही है. लेटरल एंट्री दलित, ओबीसी और आदिवासियों पर हमला है. भाजपा के रामराज्य का यह विध्वंसकारी वर्जन संविधान को नष्ट करना, पिछड़ों से आरक्षण छीनना चाहती है. आरक्षित वर्गों का हित मारा जा रहा है. उनका साथ देने अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव भी आ गए. सरकार में शामिल मंत्री चिराग पासवान को भी इस मुद्दे पर बोलना पड़ा कि ऐसा नहीं होना चाहिए. 

विपक्ष हमलावर हुआ तो सरकार भी सक्रिय हो गई...पलटवार करना शुरू कर दिया. जनता को समझाने की कोशिश करने लगी कि यह व्यवस्था तो विपक्ष की ही देन है. केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि यह UPA सरकार ही थी, जो लेटरल एंट्री का कॉन्सेप्ट लाई थी. दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) 2005 में UPA सरकार में ही लाया गया था. इस आयोग की अध्यक्षता वीरप्पा मोइली ने की थी. यूपीए सरकार के कार्यकाल में आयोग ने सुझाव दिया था कि जिन पदों पर स्पेशल नॉलेज की जरूरत है, वहां विशेषज्ञों की नियुक्ति होनी चाहिए. NDA की ओर से कहा गया कि सरकार ने तो आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए ट्रांसपेरेंट तरीका अपनाया है. फिर हंगामा क्यों?

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लेकिन यह देखा जा रहा है कि सरकार यह मुद्दा भी बहुत प्रभावी तरीके से उठा नहीं पा रही है. जबकि पहले ऐसा नहीं होता था. मोदी की पिछली दो सरकारों की ओर से विपक्ष पर विशेषकर राहुल गांधी पर जमकर पलटवार किया जाता था. कांग्रेस सहित विपक्ष कोई भी मुद्दा बड़े लेवल पर खड़ा कर पाने में खुद को अक्षम पाता था. अब एकाएक ऐसा क्या हो गया है कि विपक्ष बहुत जबर्दस्त तरीके से इस मामले को उठाकर सरकार और भाजपा को बैकफुट पर धकेलने में सफल साबित हो रही है. जबकि विडंबना यह है कि वास्तव में लेटरल एंट्री की व्यवस्था यूपीए सरकार के समय 2005 में बने प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) के माध्यम से ही सामने आई थी. यहां तक कि इस आयोग से बहुत पहले ही कांग्रेसी सरकारों ने किसी क्षेत्र के विशेषज्ञों की जमकर नियुक्तियां की थीं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण मनमोहन सिंह थे जिन्हें इंदिरा राज में 1971 में तत्कालीन विदेश व्यापार मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के रूप में एक लेटरल एंट्री के रूप में लाया गया बाद में वे वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री भी बने. अन्य प्रमुख लोगों में टेक्नोक्रेट सैम पित्रोदा और वी. कृष्णमूर्ति, अर्थशास्त्री बिमल जालान, कौशिक बसु, अरविंद विरमानी, रघुराम राजन और अहलूवालिया, आरजी पटेल, आरवी शाही का नाम शामिल है. यहां तक कि इंफोसिस से जुड़े नंदन नीलेकणी को भी आधार से जुड़े UIDAI का चैयरमेन बनाया गया था. 

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तो क्यों हो रहा है लाइन लॉस... 

कांग्रेस के खिलाफ इतने बारूद के बावजूद आखिर कहां चूक रही है सरकार? क्यों ईको नहीं हो रही है बात....
नेहरू से समय से लेकर मनमोहन सरकार तक लेटरल एंट्री के जरिये लोगों को लाया गया. यहां तक कि यूपीए सरकार के समय नेशनल एडवाइजरी काउंसिल में अलग-अलग क्षेत्र के विशेषज्ञों की नियुक्ति भी इसी श्रेणी में आती है. कांग्रेस के खिलाफ इतनी ज्वलनशील सामग्री होने के बावजूद भी आखिर सरकार उसे बैकफुट पर लाने में क्यों सफल नहीं हो पाई? देखा जाए तो इसके पीछे का बड़ा कारण है-कम्युनिकेशन में लाइन लॉस... पहले सरकार और भाजपा का कम्युनिकेशन ऊपर से नीचे बहुत व्यवस्थित तरीके से फ्लो होता था. बड़े बयान जबर्दस्त तरीके से ईको किए जाते थे. यदि पीएम मोदी किसी विषय को उठाते थे या किसी विपक्षी नेता पर हमला करते थे तो भाजपा की पूरी मशीनरी और बड़े नेता उस बयान या मुद्दे को टॉप टू बॉटम उठाने में लग जाते थे. तथ्यात्मक तौर पर बहुत स्पष्टता होती थी. यहां तरह कि आएसएस के कार्यकर्ता इस दिशा में अपना बड़ा योगदान देते थे. इसके विपरीत विपक्ष के पास किसी मुद्दे पर जवाब देने के लिए ना इतना व्यवस्थित कैडर होता था. ना इतनी जानदार मशीनरी होती थी. कम्युनिकेशन क्लेरिटी की दिक्कत अलग आती थी. अब सरकार की तरफ से कुछ बोला जाता है तो नीचे बहुत प्रभावी तरीके से ऐसा कुछ ईको नहीं होता. नेता और कार्यकर्ताओं में एक तरह की उदासीनता का भाव दिखाई देता है. बहुत सारा लाइन लॉस होता दिखाई दे रहा है. बात नीचे तक नहीं पहुंच पा रही है. जनमत बनता नहीं दिखाई दे रहा. विपक्ष मुद्दे उड़ा कर ले जा रहा है और विपक्षी दल ज्यादा प्रभावी तरीके से बात रखने में कामयाब हो रहे हैं. 

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हाशिये पर पॉपुलर नेताः बिखरी सी भाषाशैली- जन संवाद...

पहले भाजपा के ही अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, शिवराज सिंह, राजनाथ सिंह, रविशंकर प्रसाद, रमन सिंह, अनुराग ठाकुर, प्रकाश जावड़ेकर  जैसे बड़े और पॉपुलर नेता किसी मुद्दे पर लगातार बयान देकर विपक्ष के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते थे. इनकी पूरी देश में पहचान और विश्वसनीयता होती थी. अब भाजपा में इस तरह के कई नेता हाशिये पर हैं या परिदृश्य से ही गायब हो चुके हैं. या उनकी सक्रियता उस तरह की नहीं है. इनकी जगह अश्विनी वैष्णव, एस.जयशंकर, हरदीप सिंह पुरी जैसे नेताओं ने ले ली है. ये नेता प्रशासनिक व्यवस्था के तो जानकार हैं. लेकिन इनके पास ना जनाधार है. ना ही जनता में उनकी वैसी विश्वसनीयता है. इनके कम्युनिकेशन की भाषा भी बहुत कुछ सरकारी होती है. जबकि आम जनता में किसी मुद्दे को पहुंचाने के लिए जन साधारण की भाषा, बहुत देसी उदाहरण, अदा से लेकर अदायगी तक सब कुछ खोया-खोया सा दिख रहा है. जन संवाद बिखरा-बिखरा सा दिखाई देता है. जिस तरह से पहले भाजपा के नेता लोगों से जुड़ाव कायम कर लेते थे उसका अब घनघोर अभाव दिखाई दे रहा है.

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नेहरू...नेहरू..नेहरू, हर समस्या की जड़ः अब काम नहीं कर रहा यह ब्रह्मास्त्र...

मोदी सरकार में पिछले कुछ समय से लगभग हर समस्या के लिए नेहरू को जिम्मेदार ठहरा देने का तरीका चल रहा था. शुरुआती कई मामलों में इसमें यह ट्रिक चलती दिखाई दे रही थी. नेहरू की नीतियां ही देश की हर बड़ी  समस्या की जड़ में हैं, यह मान लिया गया. तब तथ्य भी सपोर्ट में दिखाई दे रहे थे. लेकिन बाद में भेड़िया आया...भेड़िया आया... इतनी बार यह बात की गई कि यह मामला कच्चे में उतर गया. धीरे-धीरे प्रभावहीन होता चला गया. लेकिन सरकार और उससे जुड़े मंत्रियों या बड़े नेताओं ने समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया और लगातार नेहरू को जिम्मेदार ठहराने का अभियान जारी रखा. नेहरू का यही ओवरडोज़ अब बैकफायर करने लगा है. लेकिन इसे समझने में भाजपा नेता खुद को असमर्थ पा रहे हैं. लोगों का मानना है कि पिछले एक दशक से यदि आप सरकार चला रहे हैं तो अब किसी भी समस्या के लिए किसी और पर जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती है. किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है. आपको अपने गिरेबां में झांकना होगा. अपनी कमियों कमजोरियों की आगे बढ़कर जवाबदेही लेनी होगी. जनता माफ करने को तैयार है लेकिन जवाबदेही से बचने के लिए बहाने सुनने को शायद अब तैयार नहीं है. तो नेहरू-नेहरू-नेहरू की गूंज में शायद पार्टी या सरकार आत्मअवलोकन जैसी सामान्य सी बातों को भी इग्नोर करते दिखाई दे रही है.

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तो मोदी सरकार या भाजपा के पक्ष में क्या?

भाजपा या मोदी सरकार के पक्ष में सबसे बड़ी बात यही है कि उनका बाउंस बैक का अच्छा खासा इतिहास रहा है. कमियों को पकड़कर उनमें त्वरित करेक्शन करने के मामले में उनका कोई सानी नहीं है. उम्मीद तो यही की जा सकती है कि ऐसा जल्दी ही होता दिखाई देगा....नहीं तो उनके सामने कांग्रेस पार्टी या उनकी सरकारों का उदाहरण है जिसने अतीत में वही गलतियां दोहराई हैं जो आज सरकार या भाजपा करती दिखाई दे रही है. 

इससे पहले का वो दौर भी देश देख चुका है जब संघ और बीजेपी ने जाति कार्ड की काट मंडल बनाम कमंडल से निकाली थी लेकिन ये जंग तो लंबी है. देखना होगा कि सरकार और बीजेपी का संगठन अब आरक्षण के विपक्षी हथियार की काट क्या खोजता है और जनता के हिस्से क्या आता है?

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