महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस सरकार को पूर्ण बहुमत हासिल है. बीजेपी राज्य में अकेले दम पर सरकार चलाने की ताकत रखती है. यही कारण रहा कि बीजेपी सरकार मंत्रिमंडल गठन में एकनाथ शिंदे के दबाव में नहीं आई. न ही उन्हें मुख्यमंत्री पद दिया और न ही उन्हें मनचाहा विभाग ही मिलने वाला है. अब सवाल उठता है कि यदि ऐसा ही है तो फिर पार्टी ने हसन मुश्रिफ जैसे विवादित नाम को कैबिनेट मिनिस्टर का दर्जा देने की क्यों मजबूर हो गए? अगर किसी मुस्लिम को मंत्री बनाना ही था तो किसी राष्ट्रवादी साफ सुथरे छवि वाले पर दांव क्यूं नहीं लगाया गया.
छह बार के नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP) विधायक हसन मुश्रिफ कोल्हापुर जिले के कागल से प्रतिनिधित्व करते हैं. उन्हें शनिवार को महाराष्ट्र के देवेंद्र फडणवीस मंत्रिमंडल में शामिल किया गया. वह इस समय बीजेपी शासित 13 राज्यों में एकमात्र मुस्लिम विधायक हैं, जिन्हें भाजपा के मुख्यमंत्री के अधीन कैबिनेट रैंक प्राप्त है. हसन मुश्रिफ पर कई घोटालों के आरोप हैं. ईडी की जांच दायरे में भी वे हैं. इतना ही नहीं मुश्रिफ के पास ऐसी कला है कि महाराष्ट्र में किसी की भी सरकार बने वो मंत्री पद का जुगाड़ कर ही लेते हैं. देवेंद्र फडणवीस सहित अब तक मुश्रिफ को सात मुख्यमंत्रियों के मंत्रमंडल में शामिल होने का सौभाग्य मिला है. आइये देखते हैं कि महाराष्ट्र में बीजेपी ने उन्हें मंत्रि पद देकर किस तरह अपनी भद पिटवाई है.
1- हसन मुश्रिफ के घोटालों को उठाती रही है बीजेपी
महाराष्ट्र में एनसीपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व ग्राम विकास मंत्री हसन मुश्रिफ के घर और दफ्तरों में पिछले साल प्रवर्तन निदेशालय (ED) की टीम ने छापेमारी शुरू की थी. छापेमारी कोल्हापुर और पुणे में कई जगहों पर की गई थी. बीजेपी नेता किरीट सोमैया ने मुश्रिफ पर 100 करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप लगाया था. पांच साल पहले भी हसन मुश्रिफ के घर पर छापेमारी हुई थी. सोमैया ने उस समय कहा था कि इस संबंध में जांच एजेंसी को सभी अहम दस्तावेज और सबूत मुहैया करवाए गए हैं. एकनाथ शिंदे के मंत्रिमंडल में भी हसन मुश्रिफ मंत्री बने थे तो बीजेपी के पास ये बहाना था कि उसे पूर्ण बहुमत नहीं है. सहयोगी दलों पर निर्भर सरकार थी. पर अब ऐसी स्थिति नहीं है कि अगर हसन मुश्रिफ को मंत्री बनाने से फडणवीस इनकार कर देते तो एनसीपी नेता अजित पवार बगावत पर उतारू हो जाते.
2- मुश्रिफ परिवार और हेमंत करकरे
हसन महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिरीक्षक (IGP) शमशुद्दीन मुश्रिफ के छोटे भाई हैं, जिन्होंने अपनी पुस्तक 'हू किल्ड करकरे' ? में आरोप लगाया था कि 26/11 मुंबई हमले एक साजिश का हिस्सा थे, जिसमें खुफिया और सुरक्षा तंत्र के कुछ लोगों ने एंटी-टेररिज्म स्क्वाड (ATS) के प्रमुख हेमंत करकरे की उस जांच को रोकने के लिए भूमिका निभाई थी, जिसमें कथित तौर पर हिंदू चरमपंथी समूहों की आतंक फैलाने में संलिप्तता की जांच की जा रही थी. करकरे की मौत 26/11 हमलों में हुई थी.
3- कद्दावर ओबीसी नेता छगन भुजबल को कैसे पीछे छाेड़ा दिया हसन मुश्रिफ ने?
एनसीपी नेता छगन भुजबल राज्य के कद्दावर ओबीसी नेताओं में शामिल रहे हैं. प्रदेश में कई बड़े पदों को सुशोभित किया है. इसके साथ ही उनकी राजनीतिक शुरूआत शिवसेना से हुई है. इसलिए बीजेपी की विचारधारा के भी काफी नजदीक रहे हैं.भुजबल पर भी कई आरोप रहे हैं. पर अगर दो आरोपियों में से किसी एक चुनना हो तो कम आरोप और समान विचारधारा वाले को पहली प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी. भुजबल ने सोमवार को नई महायुति सरकार में शामिल नहीं किए जाने पर निराशा व्यक्त की और कहा कि वह अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों से बात करने के बाद भविष्य की राह तय करेंगे. भुजबल ने स्पष्ट कहा कि वह नई कैबिनेट में शामिल नहीं किए जाने से नाखुश हैं.
4-सबसे बड़े राजनीतिक मौसम विज्ञानी बनकर उभरे हैं हसन मुश्रिफ
हसन मुश्रिफ के बारे में चाहे जितना भी आरोप लगे उन्हें मंत्री बनाने के लिए सभी आतुर रहे हैं. मुश्रिफ 1999 में विलासराव देशमुख सरकार में पहली बार मंत्री बने. उसके बाद से लगातार सुशील शिंदे, अशोक चौव्हाण , पृ्थ्वीराज चौव्हाण, उद्धव ठाकरे, एकनाथ शिंदे की सरकारों में मंत्री बनते रहे हैं. अब उन्होंने देवेंद्र फडणवीस सरकर में भी मंत्री बनकर सबसे बड़े राजनीतिक मौसम विज्ञानी का खिताब हासिल कर लिया है.देवेंद्र फडणवीस मंत्रिमंडल में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया है.
5- क्या एनसीपी नेता अजित पवार के दबाव में हैं फडणवीस
चाहे पिछली सरकार की बात रही हो या चुनाव प्रचार और टिकट वितरण की बात रही हो, हर मौके पर ऐसा लगा कि अजित पवार की बातों को बीजेपी कुछ ज्यादा ही तवज्जो देती है. आखिर ऐसा कौन सा कारण हो सकता है इसके पीछे. पिछली सरकार में भी ऐसा नहीं था कि अजित पवार नाराज हो जाएं तो सरकार गिर जाए. फिर भी अजित पवार जो चाहे अपने हिसाब से करते रहे. मदरसा टीचर्स की सैलरी बढ़ाने का श्रेय भी अजित पवार ही ले गए थे. चुनाव प्रचार के दौरान नवाब मलिक और उनकी बेटी को टिकट देने का मामला रहा हो या पीएम मोदी का मंच न साझा करने का ऐलान रहा हो अजित पवार ने अपने हिसाब से दबंगई की . जाहिर है कि ये सब फडणवीस की सहमति से ही हुआ होगा. फडणवीस को नाराज करके ये सब करना आसान नहीं था. मंत्रिमंडल गठन में भी अजित पवार ने मुश्रिफ जैसे लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल करा कर अपनी वाली करा ली.