राहुल गांधी ने अमृतसर पहुंच कर स्वर्ण मंदिर में मत्था टेकने के साथ साथ सेवा भी की है. मत्था टेकते वक्त प्रार्थना भी की होगी. कड़ा प्रसाद भी मिला ही होगा. अगर आस्था और धर्म से इतर सियासत की बात करें तो सवाल उठता है कि राहुल गांधी को प्रसाद में क्या क्या मिला है? हालांकि, ये सब इस बात पर भी निर्भर करता है कि राहुल गांधी की प्रार्थना में कौन सी बातें शामिल थीं? क्या राहुल गांधी ने मन्नत भी मांगी होगी?
ये जरूरी तो नहीं कि प्रार्थना में जो मांगा जाये प्रसाद में वो मिले ही, लेकिन राहुल गांधी ने ऐसे समय पंजाब की यात्रा की है जब भारत और कनाडा के तीखे रिश्तों के बीच वहां के लोग काफी परेशान हैं. कनाडा में निज्जर हत्याकांड के बाद भारत के साथ रिश्तों में जो खटास बढ़ रही है, पंजाब पर उसका सीधा असर हो रहा है. ऐसे में राहुल गांधी का ये दौरा पंजाब में कांग्रेस की राजनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो जाती है.
वैसे भी राहुल गांधी को 2022 के विधानसभा चुनाव के वक्त से ही पंजाब में एक कैप्टन की सख्त जरूरत तो है ही.
1. काश, गुरुकृपा बरसती और पंजाब में एक कैप्टन मिल जाता
पंजाब दौरे से लौटने के बाद राहुल गांधी ने सोशल मीडिया साइट X पर एक पोस्ट में लिखा है, 'आज मोदी जी ने खुले तौर पर मेरी बात स्वीकार कर ली... BRS का मतलब बीजेपी रिश्तेदार समिति है...'
राहुल गांधी तेलंगाना में कांग्रेस की सरकार बनवाने के लिए नये सिरे से प्रयासरत हैं, और बीच में समय निकाल कर वो अमृतसर गये हुए थे. कांग्रेस नेता का ये प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान के बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि बीआरएस नेता के. चंद्रशेखर राव ने एक बार एनडीए में शामिल होने की इच्छा जतायी थी, लेकिन अस्वीकार कर दिया गया.
2018 के तेलंगाना चुनावों की बात है. पंजाब में कांग्रेस की सरकार बने साल भर ही हुए थे, लेकिन कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच तकरार शुरू हो गयी थी. नवजोत सिंह सिद्धू कांग्रेस के लिए वोट मांगने गये थे, और वहीं बोल पड़े, 'मेरे कैप्टन तो राहुल गांधी हैं.'
धीरे धीरे बवाल इतना बढ़ा कि सोनिया गांधी ने 'सॉरी अमरिंदर' बोलते हुए पंजाब में मुख्यमंत्री बदल दिया. विधानसभा चुनावों से पहले ही कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस छोड़ दिया, और चुनाव बाद पूरे परिवार के साथ बीजेपी के हो गये.
आम आदमी पार्टी के हाथों सत्ता गंवा चुकी कांग्रेस अब 2024 के आम चुनाव में बीते नतीजे दोहराये जाने की उम्मीद कर रही है. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने केंद्र में बीजेपी के वर्चस्व के बावजूद पंजाब में सरकार तो चलायी ही, लोक सभा में भी पंजाब का प्रतिनिधित्व बरकरार रखा. 2019 में पुलवामा आतंकी हमले के बाद मोदी लहर में भी पंजाब में 8 सीटों पर कांग्रेस की जीत सुनिश्चित कराने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह ही थे. कैप्टन ने अपनी तरफ से तो पंजाब से कांग्रेस को उतनी ही सीटें दिलायी थीं, जितनी वो 2009 में सत्ता में वापसी के साथ जीती थी. 2014 में जब कांग्रेस अपने न्यूनतम स्कोर पर पहुंच गयी थी, पंजाब से कांग्रेस के तीन सांसद लोक सभा पहुंचे थे.
ऐसा लगता है अब राहुल गांधी को भी एक कैप्टन की जरूरत आ पड़ी है. कांग्रेस की कमान संभालने के लिए तो मल्लिकार्जुन खड़गे मिल गये हैं, लेकिन पंजाब में कांग्रेस को कैप्टन की सख्त जरूरत महसूस होने लगी है. अव्वल तो कांग्रेस ने कैप्टन के हमनाम शख्स को ही कांग्रेस की कमान सौंपी है, लेकिन अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग अभी तक कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसा कोई करिश्मा नहीं दिखा पाये हैं.
स्वर्ण मंदिर में मत्था टेकने के बाद अगर गुरु कृपा बरसती और कैप्टन सा कोई नया कद्दावर नेता मिल जाता, तो राहुल गांधी और कांग्रेस दोनों का कल्याण हो जाता.
2. आपदा में अवसर तो होता ही है
कनाडा में हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद के पंजाब का माहौल काफी बदला हुआ है. केंद्र की मोदी सरकार की सख्ती के बाद पंजाब के लोगों के लिए कनाडा आना जाना काफी मुश्किल हो गया है. ये ठीक है कि केंद्र सरकार ने कुछ लोगों को छूट भी दे रखी है, लेकिन जो लोग वहां जाकर कोई कारोबार करने या बसने की तैयारी में होंगे उनका तो मामला लटक ही गया है.
राहुल गांधी की अमृतसर यात्रा के राजनीतिक पहलू को देखें तो कांग्रेस के सामने आपदा में अवसर जैसा मौका तो है ही. पंजाब के मौजूदा हालात में लोगों को जिस तरह के राजनीतिक सपोर्ट की जरूरत महसूस हो रही होगी, राहुल गांधी पंजाब का दौरा करते हैं. स्वर्ण मंदिर में मत्था टेक कर पंजाब के लोगों को संदेश देने की कोशिश तो करते ही हैं.
देखा जाये तो अभी तक किसी बड़े नेता ने ताजा तनावपूर्ण माहौल में पंजाब का रुख तो किया नहीं. नाम गिना जाएगा तो राहुल गांधी टॉपर ही लगेंगे, क्योंकि कनाडा और भारत के बिगड़ते रिश्तों के दौर में पंजाब से शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल ने तो ऐसी पहल सबसे पहले की. दिल्ली पहुंच कर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की - और बाहर आकर मीडिया को बताया भी कि अपने लोगों के लिए वो किस हद तक चिंतित हैं.
निश्चित तौर पर सुखबीर बादल ने कनाडा मसले पर पहल की, लेकिन बीजेपी के पॉवरफुल नेता अमित शाह से मिलने के और भी तो कारण रहे ही होंगे. मालूम नहीं मुलाकात में पंजाब की बात ज्यादा हुई या अकाली दल की. चर्चा तो ये चल ही रही है कि अकाली दल को भी टीडीपी की तरह एनडीए में शामिल होने के लिए बीजेपी की तरफ से ग्रीन सिग्नल का इंतजार है.
3. राहुल गांधी के लिए 1984 के प्रायश्चित का मौका भी है
हाल फिलहाल की बात करें, बल्कि बीते कुछ साल के समय की, तो जब भी राहुल गांधी पंजाब का रुख करते हैं, अकाली नेता हरसिमरत कौर बादल ठीक वैसे ही हमला बोल देती हैं जैसे बीएसपी नेता मायावती. किसान आंदोलन रहा हो या पंजाब चुनाव या फिर भारत जोड़ो यात्रा तक हरसिमरत कौर कहती रही हैं, 'मैं कांग्रेस वालों से सवाल पूछना चाहती हूं... आप इनका स्वागत कर रहे हो... बिना माफी मांगे इनकी यात्रा को पंजाब में आने कैसे दिया?'
2024 के आम चुनाव आने तक 40 साल हो चुके होंगे, जब से कांग्रेस नेतृत्व पंजाब को लेकर परेशान रहा है. 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आदेश पर हुआ ऑपरेशन ब्लू स्टार और उनकी हत्या के बाद दिल्ली में हुए सिख दंगे - ऐसे धब्बे हैं जिनकी वजह से कांग्रेस को बैकफुट पर जाना पड़ता है. पंजाब के लोग अब तक 1984 की घटनाओं को लेकर राहुल गांधी के जवाब से संतुष्ट नहीं हुए हैं. शायद इसलिए भी राहुल गांधी ने सवाल का गोलमोल जवाब ही दिया है.
आम चुनाव के पहले मार्च, 2014 में राहुल गांधी से पूछा गया था, आखिर 1984 में हुए सिखों के कत्लेआम के लिए माफी मांगने में उनको संकोच क्यों होता है?
राहुल गांधी का कहना था, 'यूपीए के प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष खेद जता चुके हैं. मेरी भी बिलकुल वैसी ही भावना है.' राहुल गांधी, यूपीए के प्रधानमंत्री यानी मनमोहन सिंह के 2005 के बयान की याद दिला रहे थे, और बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की उस बात की जो उन्होंने 1998 की चंडीगढ़ रैली में कही थी.
27 जनवरी, 1998 को चंडीगढ़ की रैली में सोनिया गांधी ने स्वर्णमंदिर में 1984 के ऑपरेशन ब्लू स्टार को लेकर तीन शब्द कहे थे, "मुझे दुख हुआ." लेकिन पंजाब के लोग इसे नाकाफी मानते हैं. क्योंकि दुख जताने और माफी मांगने में बहुत फर्क होता है. माफी मांगने का मतलब गलती स्वीकार करना होता है, दुख तो कोई भी जता सकता है. सोनिया गांधी का बयान पंजाब के लोगों को एहसान जताने जैसा लगता है.
11 अगस्त, 2005 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने 1984 के सिख दंगों के लिए संसद और देश से माफी मांगी थी. रिपोर्ट के मुताबिक मनमोहन सिंह ने कहा था, 'मुझे न केवल सिख समुदाय बल्कि देश से भी माफी मांगने में कोई हिचकिचाहट नहीं है.'
सिख समुदाय न तो सोनिया गांधी के दुख जताने से संतुष्ट हुआ, न ही मनमोहन सिंह के माफी मांगने से - क्योंकि सिख समुदाय चाहता है कि 1984 को लेकर गांधी परिवार का कोई सदस्य माफी मांगे. मतलब, स्वीकार करे कि ऑपरेशन ब्लू स्टार ही नहीं, दिल्ली के सिख दंगों में भी कांग्रेस नेताओं का हाथ रहा.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी की इस साल अमृतसर की ये दूसरी यात्रा है. जनवरी, 2023 में भी राहुल गांधी स्वर्ण मंदिर में मत्था टेकने गये थे. तब वो भारत जोड़ो यात्रा कर रहे थे और अचानक सुबह सुबह पहुंच गये थे. राहुल गांधी की पिछली अमृतसर यात्रा से पंजाब कांग्रेस के नेता भी हैरान थे. क्योंकि उनका कार्यक्रम पूरी तरह गोपनीय रखा गया था.
कांग्रेस नेताओं को भी राहुल गांधी के जनवरी, 2023 वाले दौरे की जानकारी उनके अमृतसर पहुंचने के कुछ ही देर पहले मिली थी. राहुल गांधी के ताजा पंजाब दौरे को भी निजी यात्रा बताया जा रहा है. बताते हैं कि राहुल गांधी को लेने के लिए कांग्रेस का कोई भी नेता एयरपोर्ट भी नहीं पहुंचा था.
क्या बार बार स्वर्ण मंदिर जाकर राहुल गांधी पंजाब के लोगों, विशेष रूप से सिख समुदाय को कोई खास मैसेज देना चाहते हैं? क्या राहुल गांधी के प्रायश्चित का कोई निजी तरीका भी हो सकता है?