उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव यह पूछने पर कि क्या वे महाकुंभ में घायल हुए लोगों को देखने जाएंगे, साफ मना कर देते हैं. अखिलेश कहते हैं कि मैं अस्पताल में घायलों को देखने गया तो यही कहा जाएगा कि मैं महाकुंभ पर राजनीति कर रहा हूं. अखिलेश पिछले कुछ समय से, खासतौर पर महाकुंभ को लेकर, योगी सरकार के इंतेजामों की लगातार आलोचना कर रहे हैं, लेकिन उसका अंदाज बहुत मैच्योर है. सोशल मीडिया साइट X पर हुए उनके लगभग सभी पोस्ट में राजनीति और सकारात्मक सुझावों को जबर्दस्त मिश्रण है. महाकुंभ पर उनके बयान भी बहुत सधे हुए और मुद्दों तक सीमित रहे हैं. बिल्कुल एक आदर्श विपक्ष के नेता की तरह. जाहिर है कि इस तरह वो राजनीति न करते हुए भी बेहतर राजनीति कर रहे हैं. अखिलेश यादव के कुछ ट्वीट की बानगी देखिए...
महाकुंभ हादसे के बाद अखिलेश यादव के कुछ ट्वीट
-हम उप्र की दयालु जनता व स्वयंसेवी संस्थाओं से आग्रह करते हैं कि वो अपने गांव-बस्ती-शहर में जाम में फंसे श्रद्धालुओं के लिए भोजन-पानी की व्यवस्था करें. सरकार को इस तरह के बड़े प्रबंधन के लिए स्वयं तैयार रहना चाहिए था, लेकिन न तो सरकार अब ऐसा कर सकती है और न ही उनकी तरफ से ऐसा करने की कोई संभावना दिख रही है. ऐसे गंभीर हालातों में श्रद्धालुओं की सेवा करना भी महाकुंभ के पुण्य से कम नहीं है. हम सबको अपनी-अपनी सामर्थ्य और क्षमता के अनुरूप आगे आकर जन-सेवा के इस महायज्ञ मे शांतिपूर्वक अनाम सहयोग करना चाहिए.
-महाकुंभ में जिन लोगों के अपने बिछड़ गये हैं, सूचना के अभाव में उनके अंदर ये आशंका जन्म ले रही है कि कहीं उन्होंने अपने परिवार, परिजनों को हमेशा के लिए तो नहीं खो दिया है. इस आशंका को दूर करने के लिए एक सरल उपाय ये है कि सरकार महाकुंभ हादसे में जीवन गंवानेवालों की सूची जारी कर दे. यदि मृतक चिन्हित नहीं हैं तो उनके वस्त्र-चित्रादि माध्यम से पहचान करायी जाए. इस प्रयास से आशंकाओं का उन्मूलन होगा और तीर्थयात्रियों में इस आशा का संचार होगा कि उनके अपने खोए ज़रूर हैं, पर सद्प्रयासों आज नहीं तो कल मिल ही जाएंगे.
-कुंभ मेला क्षेत्र; प्रयागराज के नगरीय क्षेत्र; जन परिवहन के केंद्रों; प्रयागराज शहर की सीमाओं व विभिन्न शहरों में प्रयागराज की ओर जानेवाले मार्गों को बंद करने से करोड़ों लोग सड़कों पर फँस गये हैं, लाखों वाहनों में करोड़ों लोग दसों किलोमीटर लंबे जाम में फँसे पड़े हैं। सरकार को इसे सामान्य बचाव के स्थान पर शासनिक-प्रशासनिक लापरवाही से जन्मी आपदा मानकर तुरंत सक्रिय हो जाना चाहिए. सूर्यास्त से पहले ही श्रद्धालुओं तक भोजन-पानी की राहत पहुँचनी चाहिए और उनमें ये भरोसा जगाना चाहिए कि सबको सकुशल अपने गंतव्य तक पहुँचाने की व्यवस्था प्रदेश सरकार और केंद्रीय सरकार के द्वारा की जाएगी. जो लापता हैं उन्हें ढूँढकर उनके घरों तक सही सलामत पहुँचाया जाएगा. मृतकों के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हुए समस्त समारोह, उत्सवधर्मिता व स्वागत कार्यक्रम रद्द कर देने चाहिए.
हादसे के बाद अखिलेश यादव के ट्वीट बहुत समझदारी भरे रहे हैं. ऐसा नहीं है कि उन्होंने सरकार की आलोचना नहीं की है पर बहुत संतुलित शब्दों में. अखिलेश चाहते तो महाकुंभ में सरकार की विफलता के लिए योगी आदित्यनाथ को सीधे टार्गेट पर रखते. इसी बहाने योगी की कार्यशैली से शुरू होकर उनकी इतिहास भूगोल पर पहुंच जाते. पर उन्होंने ऐसा नहीं किया. इसके लिए अखिलेश यादव की तारीफ होनी चाहिए कि संकट की घड़ी में उन्होंने जिस तरह का जेस्चर दिखाया है वही लोकतंत्र की असली पहचान है. आज के दौर में जब भारत में राजनीति का गिरावट इस स्तर तक हो चुका है कि पीएम हो सीएम उसके बारे में राजनीतिक दल और नेता बहुत अनर्गल शब्दों का इस्तेमाल हो रहा है. खुद अखिलेश कई मौके पर हद पार करते रहे हैं. पर महाकुंभ के मौके पर उन्होंने एक शानदार विपक्ष के नेता की भूमिका निभाई है.
यही नहीं उन्होंने विपक्ष के नेता की हैसियत हादसे के पहले बहुत सी कमियों की ओर इंगित करते हुए कई ट्वीट किये हैं. सरकारी अधिकारियों को उनके ट्वीट को रिस्पॉन्स देते हुए कुछ एक्शन भी लेना चाहिए था. पर ऐसा नहीं हुआ. अगर अखिलेश यादव के ट्वीट स्वस्थ राजनीति के तहत लिया गया होता तो शायद हादसे से भी बच सकते थे.
हादसे के पहले अखिलेश के कुछ ट्वीट्स पर गौर करिए
27 जनवरी, 10:40 रात्रि में
अव्यवस्था सिर्फ़ श्रद्धालुओं को ही नहीं महाकुंभ प्रशासन और प्रबंधन में दिनरात लगे अधिकारियों और कर्मचारियों को भी थका रही है. उप्र की सरकार से सविनय निवेदन है कि हमारे अनुरोध को आलोचना न समझे बल्कि आस्थापूर्ण आग्रह मानते हुए तीर्थयात्रियों की सुविधाओं के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास करे. भाजपा सरकार महाकुंभ को आत्म-प्रचार का स्थान न मानकर, सेवाभाव से देखे जिससे शांति की कामना लेकर आए आध्यात्मिक पर्यटकों की यात्रा बिना किसी संघर्ष के शांतिपूर्ण रूप से सुसंपन्न हो सके. अधिकारियों-कर्मचारियों के प्रति भी मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाए, उनके उचित विश्राम व भोजन-पानी की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाए, जिससे व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित हो सके.
27 जनवरी, 7.19 रात्रि में
महाकुंभ में लोग नहीं ‘व्यवस्था’ अतिविशिष्ट होनी चाहिए. मेला क्षेत्र में VIP लोगों के आने से ‘वन-वे’ किये जाने की वजह से तीर्थयात्रियों को जो समस्या हो रही है, वो नहीं होनी चाहिए. सरकार पिकअप-ड्रॉप के लिए बसें चलाए.
27 जनवरी को 9.24 मिनट पर
महाकुंभ की पुण्य-यात्रा! महाकुंभ 144 साल में एक बार आता है, वो भी संगम के किनारे ही मतलब जीवन में एक बार और वो भी नदियों के मिलन स्थल पर, इसीलिए इससे ये संकल्प लेना चाहिए कि हमें जो जीवन मिला है वो अलग-अलग दिशाओं से आती हुई धाराओं के मिलन से ही अपना सही अर्थ और मायने पा सकता है. हमें संगम की तरह जीवन भर मेलजोल का सकारात्मक संदेश देना चाहिए.सद्भाव, सौहार्द और सहनशीलता की त्रिवेणी का संगम जब-जब व्यक्ति के अंदर होगा… तब-तब हम सब महाकुंभ का अनुभव करेंगे.
महाकुंभ को लेकर अखिलेश यादव ने जिस तरह की राजनीति का प्रदर्शन किया है, हो सकता है कि उन्हें तात्कालिक रूप से इसका कोई फायदा न हो पर लंबी राजनीति के लिए उनके पैर जरूर मजबूती से जमेंगे. आज जिस तरह के तुष्टिकरण की राजनीत चल रही है उसका उन्हें शिकार भी होना पड़ सकता है. कांग्रेस बहुत तेजी से अपनी छवि एंटी हिंदू बनाने पर तुली हुई है ताकि अपने पुराने कोर वोटर्स मुस्लिम समुदाय को लुभा सके. हो सकता है कि जिस तरीके से अखिलेश यादव ने कुंभ पर संगम में डुबकी लगाई है, जिस तरह से उन्होंने लगातार कुंभ पर अपने पॉजिटिव विचार रखे हैं उसका उन्हें नुकसान भी उठाना पड़े. पर अंततः उन्होंने बेहतर राजनीति का ही परिचय दिया है.