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'करो या मरो' तक पहुंचा केशव मौर्य का संघर्ष... OBC नेताओं संग जुगलबंदी संयोग या प्रयोग?

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की मुसीबतें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. केशव प्रसाद मौर्य जिस तरह आज कल ओबीसी नेताओं से मिल रहे हैं और आरक्षण संबंधी मामलों को उठा रहे हैं, उससे लगता है कि अब वो खुलकर खेलने के मूड में हैं.

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उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री संजय निषाद, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और मंत्री ओमप्रकाश राजभर
उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री संजय निषाद, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और मंत्री ओमप्रकाश राजभर

लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद उत्तर प्रदेश भाजपा में हलचल अब कोई ढंकी छुपी बात नहीं रह गई है. प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ एक आवाज जो सबसे ज्यादा मुखर है वह उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की ही है. केशव प्रसाद मौर्य के कैंप कार्यालय में हर रोज उनसे मिलने के लिए उत्तर प्रदेश के दूरस्थ जिलों से लोग आ रहे हैं, जिसमें विधायक और संगठन के लोग शामिल हैं. मौर्य उनकी फोटो हर रोज सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं. मौर्य ने भारतीय जनता पार्टी के पिछड़ों के नेता के रूप उत्तर प्रदेश में अपनी अलग  जगह बनाई है. यह साबित करने के लिए पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वालों नेताओं को वो हाईलाइट कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने यही उनकी यूएसपी है. ये बात वो अच्छी तरह से जानते हैं कि बीजेपी इस समय पार्टी से छिटक रहे पिछड़े वोट विशेषकर गैर यादव ओबीसी वोट के लिए कुछ भी करने को तैयार है. मंगलवार को उत्तर प्रदेश के एक ओबीसी लीडर सुभासपा मुखिया और प्रदेश सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर के साथ उनकी तस्वीर दिन भर मीडिया में चर्चा का केंद्र रही. इसके पहले एक और पिछड़े वर्ग के नेता निषाद पार्टी के अध्यक्ष और प्रदेश सरकार में मंत्री संजय निषाद के साथ भी उनकी तस्वीर चर्चा में थी. सवाल ये उठता है कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ चल रहे पावर स्ट्रगल में केशव के इस ओबीसी एंगल को संयोग माना जाए या प्रयोग? क्योंकि चुनाव परिणामों के बाद एनडीए की एक और पार्टी अपना दल (सोनेलाल) की मुखिया और केंद्र में मंत्री अनुप्रिया पटेल भी योगी पर लगातार हमलावर हैं. इस बीच आरक्षण के मुद्दे केशव प्रसाद मौर्य की उत्तर प्रदेश सरकार को लिखी एक चिट्ठी भी कुछ ऐसा ही माहौल बना रही है जिससे लगता है केशव प्रसाद ने यह सोच लिया है कि मत चूको चौहान. 

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1- क्यों हो रही है ओबीसी नेताओं के एकजुट होने की चर्चा

लंबे समय से आरएसएस कार्यकर्ता, 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के समय प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य को सीएम नहीं बन पाने का मलाल हमेशा से रहा है. वो इसे छिपाते भी नहीं रहे हैं. जिस तरह उनका सीएम योगी आदित्यनाथ के पहले कार्यकाल के समय से ही व्यवहार रहा है उसे किसी भी सूरत में संतोषजनक नहीं कहा जा सकता था.
हाल फिलहाल में तो यह बगावत के जैसा दिखने लगा है. नतीजों के बाद वे कैबिनेट की बैठकों में शामिल नहीं हुए, उन्होंने कम से कम दो बार कहा कि संगठन सरकार से भी बड़ा होता है. लखनऊ में वे लगातार अपने कार्यालय में विधायकों और प्रमुख नेताओं की मेजबानी कर रहे हैं. खास बात यह है कि यहां मिलने आने वालों में भाजपा के ओबीसी सहयोगी कुछ ज्यादा ही उत्साह से आ रहे हैं. बीजेपी कार्यसमिति की बैठक के बाद ही निषाद पार्टी के संजय निषाद यूपी में एनडीए की हार के कारणों में से एक बुलडोजर का नाम लेकर अपने इरादे जता दिए थे.

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इसे संयोग कहा जाए या प्रयोग कि अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल ने यूपी सरकार से आरक्षण से संबंधित जिस तरह के सवाल पूछे थे उसी से मिलते जुलते सवाल केशव प्रसाद मौर्य ने भी पत्र लिखकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मंत्रालय वाले विभाग के बारे में पूछ लिए. ओबीसी आरक्षण से संबंधित सभी पत्र सार्वजनिक रूप से जारी होना ये बताता है कि ये संयोग से अधिक प्रयोग ही होगा.

2- उत्तर प्रदेश में गैर यादव ओबीसी की राजनीति

राजनीतिक विश्लेषकों और सर्वेक्षणकर्ताओं ने भविष्यवाणी की थी कि राम मंदिर उद्घाटन और मोदी-योगी जोड़ी की लोकप्रियता के दम पर भाजपा आम चुनावों में राज्य में जीत हासिल कर लेगी पर ऐसा नहीं हुआ. वैसे तो उत्तर प्रदेश में बीजेपी की हार के पीछे कई कारण रहे. हालांकि मुख्य रूप से यही माना गया कि भाजपा को आठ प्रतिशत वोटों का नुकसान उठाने  गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों के समर्थन में कमी आना रहा. सीएसडीएस के चुनाव बाद सर्वेक्षण के आंकड़ों से पता चलता है कि भाजपा को कुर्मी-कोइरी से 61 प्रतिशत समर्थन (19 प्रतिशत का नुकसान), गैर-यादव ओबीसी से 59 प्रतिशत समर्थन (13 प्रतिशत का नुकसान) और गैर-जाटव दलितों से 29 प्रतिशत समर्थन (19 प्रतिशत का नुकसान) मिला.

इसके साथ ही पार्टी ने उच्च जातियों का एक प्रतिशत, कुर्मी और कोइरी का दो प्रतिशत, यादवों का एक प्रतिशत, गैर-यादव ओबीसी का तीन प्रतिशत, गैर-जाटव दलितों का दो प्रतिशत और मुसलमानों का एक प्रतिशत वोट खो दिया. हालांकि, जाटवों का उसे लगभग एक प्रतिशत वोट अधिक मिला. सपा प्रमुख अखिलेश यादव के बढ़त बनाने का कारण रहा कि वे बीजेपी के कोर वोटरों कुर्मियों, कुशवाहों को अधिक टिकट दिया. बीजेपी के लिए दिक्कत यह है कि अगर केशव प्रसाद मौर्य रूठते हैं तो आगामी चुनावों में भी इन वर्गों का वोट पार्टी को नहीं मिलने वाला है. पार्टी ने ओबीसी नेता पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को नाराज करने का खामियाजा एक बार ऐसा भुगता है कि 2 दशक लग गया यूपी में पार्टी को उठने में.

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3- 2027 के पहले क्या यूपी का सीएम कोई ओबीसी होगा

इसमें कोई दो राय नहीं है कि योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता हर वर्ग में है. देश में पीएम नरेंद्र मोदी के बाद दूसरे नंबर पर लोकप्रिय योगी आदित्यनाथ ही हैं. पूरे देश में चुनाव प्रचार और रैलियां करने के मामले में भी वे पीएम मोदी के बाद दूसरे नंबर पर हैं. पर 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद उत्तर प्रदेश में जिस तरह की राजनीति उभर रही है इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय जनता पार्टी यूपी में सीएम बदलने के बारे में सोच सकती है. दरअसल संविधान बचाओ का मुद्दा विपक्ष के हाथ एक ऐसा अलादीन के चिराग के रूप में लगा है जिस पर बीजेपी चाहकर भी कंट्रोल नहीं कर पा रही है. केशव प्रसाद मौर्य संगठन को यही बात समझाने में लगे हैं कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी संविधान बचाओ नारे से बचाव केवल किसी पिछडी जाति के शख्स को मुख्यमंत्री बनाकर ही कर सकती है. लोकसभा चुनावों में बीजेपी के पक्ष में जो वोटिंग हुई उससे तो यही लगता है कि अगर आज चुनाव हो जाए तो बीजेपी सत्ता से बाहर हो जाएगी. बीजेपी की मुश्किल यह है कि योगी आदित्यनाथ को भी नाराज करके पार्टी यूपी में सरकार बनाने में असफल साबित ही होगी.

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4- योगी बनाम मौर्य

डिप्टी सीएम लंबे समय से भाजपा के वफादार रहे हैं, जो एक गैर-राजनीतिक, विनम्र पृष्ठभूमि से आते हैं, जिन्होंने वीएचपी सहित आरएसएस में अपनी जगह बनाई. पीएम मोदी की तरह केशव का भी बचपन गरीबी में बीता है. उनका दावा है कि उन्होंने बचपन में चाय और अखबार बेचा है. उन्होंने राम मंदिर आंदोलन में भाग लिया, जिसने यूपी में बीजेपी की किस्मत बदल दी, वह यूपी से एक बार के विधायक और एक बार के सांसद हैं, उन्होंने राज्य इकाई में विभिन्न संगठनात्मक पदों पर काम किया है, और जब यूपी में बीजेपी का नेतृत्व किया था तब बीजेपी  2017 में सत्ता में आई. इसलिए कई लोग उन्हें उस समय सीएम पद के स्वाभाविक दावेदार के रूप में देखते थे.

इसके ठीक विपरीत उत्तर प्रदेश के सीएम आदित्यनाथ गोरखनाथ मठ के प्रमुख और पांच बार के गोरखपुर सांसद हैं. योगी मूल रूप से उत्तराखंड के ठाकुर हैं. इसके साथ ही प्रदेश के हर वर्ग में लोकप्रिय हैं. योगी बीजेपी के कभी मेंबर नहीं थे. वह अपना खुद का दक्षिणपंथी संगठन हिंदू युवा वाहिनी चलाते रहे हैं जिसका संबंध आरएसएस से नहीं रहा है.पर कहा जाता है कि आरएसएस के दबाव में उन्हें यूपी का सीएम बनाया गया और आज भी आरएसएस उनके पीछे दीवार की तरह खड़ा है. 
 

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