हिमाचल प्रदेश कांग्रेस सरकार पर मंडराते खतरे को दूर करने पहुंचे पर्यवेक्षक डीके शिवकुमार कह रहे हैं कि ऑल इज वेल. लेकिन, हालात सामान्य होते नहीं दिख रहे हैं. तमाम बैठकों से कैबिनेट से इस्तीफा दे चुके विक्रमादित्य सिंह दूरी बनाए हुए हैं. वे मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह के बेटे हैं, जो पूरी जिंदगी बीजेपी के दिये दर्द से लड़ते रहे. केंद्र में बीजेपी की मोदी सरकार के आने के साल भर बाद ही वीरभद्र सिंह के घर पर सीबीआई की रेड हुई थी, जिसे वो अंतिम सांस तक नहीं भुला सके. इस पूरी किस्से पर बाद में नजर डालेंगे, पहले बात करते हैं हिमाचल में चल रहे ताजा घटनाक्रम और बीजेपी की चाल की.
बीजेपी को हिमाचल प्रदेश में अपनी सरकार से कम तो कुछ चाहिये नहीं
हिमाचल प्रदेश में राज्य सभा चुनाव के बहाने बीजेपी जिस लड़ाई में आगे बढ़ गई है, वहां कांग्रेस सरकार को बेदखल करने से कम पर उसे कुछ मंजूर नहीं होगा. हर हाल में बीजेपी चाहेगी कि जल्द से जल्द ऐसी स्थिति बने कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को विश्वास मत हासिल करने के लिए घेरा जाये, ताकि कांग्रेस की सरकार गिर जाये.
क्रॉस वोटिंग के बहाने इतने विधायकों ने तो कांग्रेस छोड़ने का मन बना ही लिया है कि सत्ता तक पहुंचाने वाली बीजेपी की राह आसान हो जाये. क्रॉस वोटिंग करने वाले 6 विधायकों को बर्खास्त कर दिये जाने के बाद सदन की स्ट्रेंथ तो पहले ही 68 की जगह 62 हो गई है - और नतीजा ये हुआ है कि बहुमत का आंकड़ा भी तीन पायदान नीचे खिसक कर 32 पर पहुंच चुका है.
राज्य सभा चुनाव के जरिये बागियों को मैदान में उतार कर खेल कर देने वाले विक्रमादित्य सिंह, बर्खास्त कांग्रेस विधायकों और मुख्यमंत्री की ब्रेकफास्ट मीटिंग से दूरी बनाने वाले विधायकों को अलग करके देखें तो कांग्रेस के पास यानी मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के समर्थक विधायकों की संख्या 30 तक पहुंच चुकी है, जो बहुमत के जादुई आंकड़े से दो कदम पीछे रह जाती है.
कुल मिलाकर देखा जाये तो हिमाचल प्रदेश की राजनीति में अपनी हैसियत और कांग्रेस नेतृत्व की तरफ से मुंह मोड़ लिये जाने से प्रतिभा सिंह और विक्रमादित्य सिंह के सामने भी कोई और रास्ता नहीं सूझ रहा होगा.
लेकिन विक्रमादित्य और प्रतिभा सिंह की नाराजगी के कारण सुक्खू सरकार अंतिम सांसे ही गिन रही है, और बीजेपी शिकार को झपटने के लिए ताक में बैठी हुई है - ऐसे में कांग्रेस सरकार गिरती है तो उसमें सबसे बड़ी भूमिका पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और मौजूदा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह की होगी.
अब सवाल ये उठता है कि बीजेपी को हिमाचल प्रदेश में विपक्ष से सत्ता में लाने के बदले विक्रमादित्य सिंह को क्या मिलेगा?
और एक बड़ा सवाल ये भी है कि बदले हालात में पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को किन बातों से समझौता करना पड़ सकता है?
विक्रमादित्य सिंह को बीजेपी से क्या मिलने वाला है?
हिमाचल प्रदेश की स्थिति ऐसे राजनीतिक हालात से गुजर चुके महाराष्ट्र, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से थोड़ी अलग है - और जो कुछ हो रहा है उसमें विक्रमादित्य सिंह की भूीमिका भी उसी हिसाब से तय होने वाली है. बिहार और महाराष्ट्र के राजनीतिक हालात मिलते जुलते लगते हैं, लेकिन बीजेपी बिहार में सत्ता में भागीदार बनने से आगे अब तक नहीं बढ़ पाई है, क्योंकि मुख्यमंत्री की कुर्सी से नीतीश कुमार को उतार कर बिठाने लायक बीजेपी के पास कोई नेता ही नहीं है.
बेशक महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की ही तरह हिमाचल प्रदेश में भी बगावत का बिगुल बराबर पिच पर ही बजा है, लेकिन अन्य राज्यों की तुलना में हिमाचल प्रदेश की राजनीतिक स्थिति ध्यान देकर समझनी होगी.
हिमाचल प्रदेश की स्थिति काफी हद तक मध्य प्रदेश से मिलती जुलती है. जैसे 2020 में मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार गिरने पर गिरने पर शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनाया था, हिमाचल प्रदेश में भी जयराम ठाकुर मौजूद हैं - और अभी तक बीजेपी की तरफ से उनके साथ प्रेम कुमार धूमल या शांता कुमार जैसा कोई अलग व्यवहार भी नहीं हुआ है. होने को तो अब शिवराज सिंह चौहान को भी विधानसभा चुनावों के बाद किनारे लगा दिया गया है.
महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे और असम में हिमंत बिस्वा सरमा को मुख्यमंत्री बनाये जाने की परिस्थितियां भी काफी अलग अलग रही हैं - और विक्रमादित्य सिंह के सामने दोनों में से किसी के जैसी स्थिति बन पा रही हो, ऐसा नहीं नजर आ रहा है.
ये नहीं भूलना चाहिये कि एकनाथ शिंदे ने महाराष्ट्र में सिर्फ महा विकास आघाड़ी की सरकार नहीं गिराई थी, बल्कि शिवसेना को भी उद्धव ठाकरे से छीन लिया था - और ऐसा काम न तो ज्योतिरादित्य सिंधिया ने किया है, न ही हिमंत बिस्वा सरमा ने एक झटके में किया था - और न ही अभी तक विक्रमादित्य सिंह ऐसा कुछ कर पाने की स्थिति में दिखाई पड़ रहे हैं.
विक्रमादित्य सिंह की बगावत सचिन पायलट से बस कुछ ही कदम आगे की लगती है - मुमकिन है, अगर राजस्थान में भी उस वक्त चुनाव हुए होते जब सचिन पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ होटल में जमे हुए थे, माजरा काफी अलग देखने को मिला होता.
एकनाथ शिंदे को तो बगावत के बाद गुवाहाटी से मुंबई लौटते ही सत्ता मिल गई थी. बीजेपी ने तो हाथोंहाथ ऐसे लिया कि एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के साथ ही अपने मुख्यमंत्री रहे नेता को उनका जूनियर यानी डिप्टी सीएम भी बना दिया - सवाल है कि क्या विक्रमादित्य सिंह हिमाचल प्रदेश में एकनाथ शिंदे जैसा जौहर दिखा सकते हैं?
ज्योतिरादित्य सिंधिया राज्यसभा तो तत्काल प्रभाव से पहुंच गये थे, लेकिन केंद्री सरकार में मंत्री बनने के लिए उनको मोदी मंत्रिमंडल के फेरबदल तक इंतजार करना पड़ा था, और वैसी ही स्थिति विक्रमादित्य सिंह के सामने भी होगी - जब तक लोक सभा चुनाव नहीं हो जाते, केंद्र में फिर से बीजेपी की सरकार नहीं बन जाती, विक्रमादित्य सिंह को भी मन मसोस कर इंतजार ही करना होगा.
क्या बीजेपी के दिये दर्द से गहरा है सुक्खू का दिया जख्म
बात 2015 की है, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के घर हॉली लॉज पर सीबीआई ने छापेमारी शुरू की तो वो अपनी बेटी मीनाक्षी का कन्यादान कर रहे थे. मीनाक्षी की शादी फरीदकोट के रविइंद्र सिंह से हुई है.
शादी में वीरभद्र सिंह की बेटी अपराजिता भी अपने पति पटियाला राजघराने के युवराज अंगद सिंह के साथ पहुंची थीं, सीबीआई की छापेमारी देख कर वो भी दंग रह गई थीं - बाकी मेहमान तो सकते में थे ही.
पांच गाड़ियों में करीब डेढ़ दर्जन अफसर जब मुख्यमंत्री आवास पहुंचे तो देखते ही हड़कंप मच गया. तब आय से ज्यादा संपत्ति रखने के मामले में सीबीआई ने वीरभद्र सिंह के शिमला स्थित निजी आवास, रामपुर, सराहन, परवाणू के साथ साथ दिल्ली और नोएडा में 13 जगहों पर रेड डाल कर छानबीन की थी - एक ही जगह शादी भी चल रही थी, और ऐन उसी वक्त वहां सीबीआई की छापेमारी भी.
लेकिन अब न तो वीरभद्र सिंह हैं, और न ही उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह और बेटे विक्रमादित्य सिंह को ही उस वाकये का कोई मलाल रह गया है. सुना है कि बेटे पिता के अपमान का बदला लेते हैं, लेकिन ये भी वक्त का तकाजा है कि वीरभद्र सिंह का बेटा दुश्मन बीजेपी के इशारों पर चल रहा है - और उससे भी बड़ी बात है कि मां का भी सपोर्ट हासिल है. विक्रमादित्य सिंह रोते रोते बता रहे थे कि किस तरह सुक्खू सरकार ने उन्हें और उनके परिवार को अपमानित किया है. पिता की मूर्ति लगाने के लिए शिमला के मॉल रोड पर दो गज जमीन भी नहीं दी.
अभी तो कांग्रेस की तरफ से दावा किया जा रहा है कि सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा करेगी. मतलब, मुख्यमंत्री बदले जाने पर भी कोई स्पष्ट रुख सामने नहीं आया है. भूपेंद्र सिंह हुड्डा और डीके शिवकुमार ये भी समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि सब लोग मिलकर लोक सभा का चुनाव लड़ेंगे.
एक बात तो साफ है, विक्रमादित्य सिंह को बीजेपी वो सब तो देने से रही जो वो कांग्रेस में रह कर हासिल कर सकते हैं - बाकी फैसला मां-बेटे को खुद ही करना है.