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साल 2001 में अफगानिस्तान के बामियान क्षेत्र में तालिबान ने हमला किया और उस मशहूर पहाड़ी के इर्द-गिर्द विस्फोटक लगा दिए, जहां बुद्ध की सबसे ऊंची खड़ी प्रतिमा स्थापित थी. यह प्रतिमा न सिर्फ प्राचीनता और विरासत की पूंजी थी, बल्कि 'अप्प दीपो भव:' और तथागत के दिए अष्टांग मार्ग की प्रेरणा भी देती थी. वह जीवन में सुख की परिभाषा थी, संघर्ष का बल थी और शांति का स्त्रोत थी. फिर भी एक रोज कंधों पर बंदूक लिए कुछ लोगों की जमात बामियान पहुंची और उन्होंने शांति के इस चिर प्रतीक को धुएं-बारूद से ढक दिया. हुआ ये कि तब जहां बुद्ध थे अब वहां खंडहर है. बुद्ध की स्मृति का खंडहर...
अब सवाल उठता है कि तालिबान ने बुद्ध की प्रतिमा तोड़ दी, पर क्या बुद्ध के विचारों को भी नेस्तनाबूद कर पाया? क्या दुनिया में शांति-सद्भाव और करुणा का सूखा पड़ गया? क्या कोई आंख ऐसी नहीं बची जो गैरों की भीगी आंखें देखकर खुद भी गीली हो जाती हो? इन सभी सवालों का एक जवाब है...नहीं...ऐसा नहीं हुआ, बिल्कुल नहीं हुआ. तमाम कड़वे अनुभवों के बाद भी दुनिया में जबतब सौहार्द की रुत-रंगत दिख जाती है. उसकी शक्ल-सूरत किसी भी आम-ओ-खास में हो सकती है. उदाहरण से समझना चाहते हैं तो अभी हाल ही में खिलाड़ी नीरज चोपड़ा की वो तस्वीर याद कीजिए, जिस पर आप सभी ने खूब प्यार लुटाया था, जिस पर आप खूब बलिहारी गए थे. जीत के बाद विक्ट्री वॉक के दौरान चोपड़ा अपने पाकिस्तानी दोस्त अरशद नदीम के साथ कंधे मिलाकर चलते नजर आए थे.
इन दोनों बातों को लिखने का लुब्बो-लुआब सिर्फ इतना बताना है कि आप कितना भी मिटने-मिटाने की बात कर लें, कुछ खत्म करने की ठान लें या बिल्कुल भी नजरअंदाज कर लें, जिस दिल में प्रेम और सद्भावना की अलख है, आप उसे नहीं बदल सकते, यही बदल न सकने वाली बात शास्वत है, सनातन है.
क्यों चर्चा में है सनातन?
सनातन... भारतीय राजनीति से लेकर सामाजिक हलके में बीते चार दिनों से ये एक शब्द चर्चा में है. वजह है दक्षिणी राज्य तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन के बेटे उदयनिधि का बयान. चेन्नई में एक सभा के दौरान वह सनातन को खत्म करने की बात करते हैं. कहते हैं कि इसे मिटाना होगा. आप कुछ चीजों का विरोध नहीं कर सकते हैं. जैसे कि आप डेंगू-मलेरिया, कोरोना का विरोध नहीं कर सकते, उन्हें मिटाना ही पड़ता है. ऐसे ही सनातन का विरोध नहीं कर सकते हैं, उसे मिटाना ही होगा. आगे वह बताते हैं, सनातन का मतलब है, जिसे बदला न जा सके.
उदयनिधि स्टालिन ने जो बातें कहीं उसके हर शब्द की व्याख्या को देखें तो यही समझ आता है कि अव्वल उन्होंने केवल विरोध के लिए सनातन नाम का एक शब्द सुना है और टारगेट करने के लिए उसे ही चुन लिया है. उनकी पार्टी की जो विचारधारा है वह इसी विरोध पर ही आधारित है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की बात मान लें तो निश्चित रूप से यह विशुद्ध हेट स्पीच है. असल में उदयनिधि ने सनातन को समझा ही नहीं है, वह क्या बल्कि देश में स्थिति ऐसी है कि एक बड़ा धड़ा इस चार अक्षरी शब्द के मायने नहीं समझता. स्टालिन के बयान के बहाने ही सही, हमें जरूरत है कि सही अर्थों में सनातन को समझें, तभी यह भी जान पाएंगे कि दक्षिण से आए इस सनातन विरोधी बयान में कितनी और किस तरह की खामी है?
क्या है सनातन धर्म?
सनातन के साथ एक और शब्द 'धर्म' हमेशा आपको जुड़ा मिलेगा. इसी वजह से यह विस्तृत समझ वाला शब्द सिर्फ एक समुदाय की पहचान भर रह जाता है. अव्वल तो हम धर्म का ही अर्थ गलत समझ लेते हैं. संविधान की प्रस्तावना में भी पंथनिरपेक्षता दर्ज है, धर्म निरपेक्षता नहीं. यानि कि भारतीय संविधान किसी एक पंथ को नहीं मानता. लेकिन धर्म से तो कोई निरपेक्ष नहीं हो सकता. क्या धर्म से इतर होकर आप अधर्मी बनेंगे. इसलिए सनातन के साथ धर्म जुड़ा होना तो ठीक है, लेकिन इसमें हम धर्म का जो अर्थ समझ लेते हैं हमारी वह समझ गलत है.
धर्म क्या है?
धर्म को लेकर सबसे प्राचीन डॉक्यूमेंटेशन 'मनु स्मृति' में मिलता है. हालांकि विडंबना है कि यह पुस्तक भी विवादित बना दी गई है. फिर भी धर्म की इससे सटीक परिभाषा नहीं, जहां धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं.
धृतिः क्षमा दमोअस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः, धीविद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् . महाराज मनु ने कहा है कि धृति (धैर्य), क्षमा, दम (मन पर नियंत्रण), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (शुचिता), इंद्रियनिग्रह (इंद्रिय विजय), धी (सत्कर्म में रत बुद्धि यानि पाप रहित), विद्या, सत्य और अक्रोध (क्रोध न करना) धर्म के ये दस लक्षण हैं. जिसमें ये लक्षण हैं, वही धर्मात्मा है. अब ऐसा धर्मात्मा कोई भी हो सकता है, किसी भी पंथ का हो सकता है. इस बात को जीवन में उतार लें तो हम-आप, कोई और या खुद उदय निधि स्टालिन भी धर्मात्मा और धार्मिक हो सकते हैं. ये बेहद खूबसूरत बात, उस शब्द की व्यापकता का सौवां हिस्सा भी नहीं है, जिसे सनातन कहते हैं.
ठीक ऐसी ही बात ऋषि याज्ञवल्क्य ने याज्ञवल्क्य स्मृति में लिखी है. उन्होंने धर्म के नौ (9) लक्षण बताए हैं.
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
दानं दमो दया शान्ति: सर्वेषां धर्मसाधनम्।। (याज्ञवल्क्य स्मृति) यानी धर्म और कुछ नहीं, बल्कि, अहिंसा, सत्य, चोरी न करना (अस्तेय), शौच (स्वच्छता), इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियों को वश में रखना), दान, संयम (दम), दया और शान्ति जैसे गुणों का समुच्चय है.
श्रीमद्भागवत में धर्म के लक्षण
कुरुक्षेत्र में उलझा हुआ अर्जुन ये जानकर भी कि सामने खड़े उसके ही घर के सदस्य पाप और अधर्म में जकड़े हुए हैं, उनके खिलाफ युद्ध करने से कतराता है, तब उसके सदा के सहायक श्रीकृष्ण उसे समझाते हुए सबसे पहले धर्म के लक्षण समझाते हैं. श्रीमद्भागवत के सातवें स्कंध में भी धर्म के तीस लक्षण बताए हैं और श्रीकृष्ण ने इसे ही सनातन कहा है, क्योंकि यही धर्म का स्वरूप है.
सत्यं दया तप: शौचं तितिक्षेक्षा शमो दम:,
अहिंसा ब्रह्मचर्यं च त्याग: स्वाध्याय आर्जवम्.
संतोष: समदृक् सेवा ग्राम्येहोपरम: शनै:,
नृणां विपर्ययेहेक्षा मौनमात्मविमर्शनम्.
अन्नाद्यादे संविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हत:,
तेषात्मदेवताबुद्धि: सुतरां नृषु पाण्डव.
महाभारत में धर्म
ठीक इसी तरह महाभारत में महात्मा विदुर युधिष्ठिर को धर्म के आठ लक्षण बताते हैं, जिसमें वह चार लक्षणों का एक समूह और अन्य चार का अलग समूह बताते हैं. विदुर कहते हैं, इज्या (यज्ञ-याग, पूजा आदि), अध्ययन, दान, तप, सत्य, दया, क्षमा और अलोभ. इसके आगे वह जोड़ते हैं कि, इसमें से पहले चार यानि कि इज्या, अध्ययन, दान और तप दिखावे के लिए भी हो सकते हैं, लेकिन सबसे जरूरी जो हैं वह सत्य, दया, क्षमा और अलोभ ही हैं. धर्मात्मा होने के लिए इन्हें ही अपनाना होता है.
जैन परंपरा में धर्म
जैन परंपरा भी दस लक्षणों के आधार पर धर्म को समझाती है. इस परंपरा में मनाया जाने वाला दशलक्षण पर्व, धर्म के एक-एक लक्षण को समर्पित एक-एक दिन होता है और यह उसके जीवन में पालन करने की शपथ का उत्सव है, इसमें भी सबसे अधिक जिसे अपनाने पर जोर दिया जाता है वह है उत्तम क्षमा धर्म. इस संसार में समय-समय पर क्षमा को सबसे अधिक बल दिया गया है. महात्मा गांधी का दिया ये विचार 'आंख के बदले आंख' सारे विश्व को अंधा कर देगा. इसी क्षमा धर्म से निकला विचार है.
वाल्मीकि-तुलसी के नजरिए में धर्म
वाल्मीकि रामायण में भी महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है कि 'क्षमा दानं क्षमा सत्यं क्षमा यज्ञश्च पुत्रिकाः, क्षमा यशः क्षमा धर्मः क्षमयाविष्टितं जगत्. यानि कि क्षमा दान है, क्षमा सत्य है, क्षमा यज्ञ है. क्षमा यश है, क्षमा ही धर्म है, वास्तव में यह संसार क्षमा पर ही टिका हुआ है.
धर्म और क्षमा की व्याख्या करते हुए संत तुलसीदास रामचरित मानस में बेहद ही सरल भाषा में यही बात बताने की कोशिश करते हैं. वह क्षमा को मन और विचार के घोड़े पर लगाम लगाने वाली रस्सी बताते हैं. उन्होंने लंकाकांड में श्रीराम से ही इस विषय में कहलवाया है. रावण से लड़ने के लिए रघुनंदन जब पैदल ही नंगे पैर उसकी ओर बढ़ते हैं तो विभीषण शंका जताते हैं कि ऐसे रावण कैसे हराया जाएगा. तब श्रीराम विभीषण की शंका दूर करते हुए बताते हैं कि, जिस रथ से ऐसे अधर्म का नाश होता है वह धर्म का है और दिखता नहीं है, लेकिन उसके लक्षण दिखते हैं. शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिए हैं. सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं. बल, विवेक, दम (इंद्रियों का वश में होना) और परोपकार- ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं.
सुनहु सखा, कह कृपानिधाना, जेहिं जय होई सो स्यन्दन आना।
सौरज धीरज तेहि रथ चाका, सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।
बल बिबेक दम पर-हित घोरे, छमा कृपा समता रजु जोरे।
धर्म के ऐसे लक्षण बताने वाला ही है सनातन
अलग-अलग पुराणों, महाकाव्यों और प्राचीन ग्रंथों में धर्म की जो यह परिभाषा बताई गई है, वह किसी एक पंथ या किसी एक समुदाय के लिए नहीं है. यह सारी बातें विश्व के हर एक कोने में बस हर उस दोपाए के लिए है, जिसके शरीर में प्राण हैं और मस्तिष्क में विचार के पनप सकने लायक जगह है. यही बातें सनातन हैं, क्योंकि इन्हें बदला नहीं जा सकता. क्या स्कूलों में यह सिखाया जाने लगे कि झूठ बोलना जरूरी है. या फिर यह समझाएं कि अपनी इच्छा पूर्ति कैसे भी की जाए, भले ही चोरी ही क्यों न करनी पड़े. सोचकर देखिए...जिस समाज में खुले स्तर पर ऐसी बातें होने लगें, उनका स्वरूप कैसा हो सकता है.
सनातन मिटाकर क्या धर्म को मिटाने की चाहत?
अगर कोई सनातन को मिटाना चाहता है तो वह किस रूप में मिटाना चाहता है, उसे यह स्पष्ट करना चाहिए. खासतौर पर उदयनिधि स्टालिन से यही बता दें कि क्या वह माताओं से उनके बच्चों के प्रति होने वाली सहज करुणा और ममता को मिटाना चाहते हैं. क्या वह यह चाहते हैं कि शांति को भंग करके देश ही नहीं दुनिया को अंतहीन युद्धों में झोंक दिया जाए. वर्तमान समय भी युद्धों से बचा हुआ नहीं है. हमारी नफरतों का इतिहास तो बहुत लंबा है. कोई दौर इससे खाली नहीं है कि जब आदमी ने आदमी की चमड़ी न उधेड़ डाली हो. आंकड़े बताते हैं कि मानव समाज के 3400 सालों के लिखित इतिहास में केवल 268 साल ही शांति वाले रहे हैं. यानी हम धरती वालों ने केवल आठ प्रतिशत समय शांति के साथ गुजारा है.
भारत ने सहेज रखी है सनातनी परंपरा
यह स्थिति तब है, जब शांति और सौहार्द की राह बताने वाला और धर्म का सही अर्थ समझाने वाला सनातन अभी भी मौजूद है. बड़ी बात यह भी है कि भारत इसका रखवाला है और इसने इस परंपरा को सहेज कर रखा है. जब सारा विश्व भ्रम के आगोश में होता है तो पूरब का ये मोती सही राह पहचानने का असल ठिकाना होता है. कलमवालों ने कई किताबों में इसकी तस्दीक की है. देश के राष्ट्रपति रहे डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपनी किताब 'इंडियन फिलॉसफी' में भगिनि निवेदिता के हवाले से लिखा है, वह भारत के धर्मग्रंथों से बहुत प्रभावित रही हैं, और इसमें भी महाभारत ने उन पर बेहद असर डाला. वह इसके बारे में लिखती हैं कि 'विदेशी पाठकों पर दो बातों का खास असर पड़ता है. पहली बात तो यह कि उन्हें यहां विविधता में एकता मिलती है, दूसरी यह कि महाभारत सुनने वालों पर ऐसे हिंदुस्तान के खयाल को बिठाने की लगातार कोशिश है, जिसकी अपनी वीरता की परंपरा है, जो एकता के भाव को जगाने वाली है.'
सनातन को लेकर पंडित नेहरू के तर्क
इसी बात को अपनी प्रसिद्ध किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया में पं. नेहरू ने भी शामिल किया है, बल्कि वह भारतीय संस्कृति और सभ्यता से अलग ढंग से ही प्रभावित थे और अहमदनगर के किले में बंदी होने के दौरान लिखी गई ये किताब कुछ और नहीं बल्कि संपूर्ण भारत की सनातनी, आध्यात्मिक और सामाजिक नजरिए का परिणाम थी. पंडित नेहरू इस यात्रा की शुरुआत हिंदू और हिंदुत्व से करते हैं, जिसे पहले-पहल तो उन्होंने हिंदूपन कहा, लेकिन अपनी आध्यात्मिक राह में जब वह वेदों की ऊंचाई तक पहुंचती हैं तो यह यात्रा अधिक वैज्ञानिक हो जाती है.
वह लिखते हैं कि 'ऋग्वेद शायद मनुष्य की पहली पुस्तक है, इसमें इंसानी दिमाग के सबसे पहले उद्गार मिलते हैं. काव्य की छटा मिलती है और प्रकृति की सुंदरता के साथ उसके रहस्य को देखकर उपजी भावना भी सामने आती है. तब मनुष्य न सिर्फ स्तुति की ओर प्रेरित होता है, बल्कि जिज्ञासु होता है और सवालिया निशान लगाते भी चलता है. वह कहते हैं कि तभी वहीं से हिंदुस्तान एक खोज पर निकला है, उसे कई प्रश्नों के उत्तर तो मिले हैं, लेकिन उसकी खोज अभी भी जारी है.
क्या कहता है ऋग्वेद का नासदीय सूत्र
इस यात्रा में वह जो चिंतन करता है, उसी से वह इस निष्कर्ष पर भी पहुंचा, एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति यानि सत्य एक है, जिसे विद्वान कई नामों से पुकारते हैं. यही चिंतन जब सवालों के ऊंचे पहाड़ से घिर जाता है तो ऋग्वेद का नासदीय सूक्त रच डालता है, जो पूछता है, तब वहां कौन था, क्या कोई था, या नहीं था, पहले रहा था, अंतरिक्ष और आकाश नहीं थे, तो वह कहां था, उसे किसने आश्रय दिया, क्या वहां जल था? मृत्यु थी, दिन-रात थे?
नासदासीन्नो सदासात्तदानीं नासीद्रजो नोव्योमा परोयत्।
किमावरीवः कुहकस्य शर्मन्नंभः किमासीद् गहनंगभीरम्.(ऋग्वेद, दशम मंडल नासदीय सूक्त)
चिंतन का यही स्वरूप जब और गहराता है तो ब्रह्मांड खुद कैसे उत्पन्न हुआ होगा, इस पर भी चर्चा कर लेता है. ऋग्वेद के ही हिरण्यगर्भ सूत्र में यह प्रश्न भी आता है, जगत का आधार कौन हैं? सभी प्राणियों में विद्यमान कौन है, कौन है जो जल में भीगा हुआ है और वायु में हल्का है. कौन है कैसा तत्व है. हम किस देवता की कैसे उपासना करें.
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्॥ स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम. (ऋग्वेद, हिरण्यगर्भ सूत्र)
क्या है सनातन का आधार?
डिस्कवरी ऑफ इंडिया, इन सभी वैदिक बातों को ही भारतीयता का सनातनी आधार कहती है और यह मानती है कि उस प्राचीन काल में भी, जिसे कि मानव सभ्यता का पहला काल मान लिया जाए, जो कि अभी पनप रहा है और जीवन के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझ रहा था, इस आदमजात के जो पूर्वज थे, उनकी सोच आज के परे भी कितनी आधुनिक और वैज्ञानिक थी. वह प्रश्न करना जानते थे, चिंतन करते थे, उत्तर खोजते थे और उसे संपूर्ण निष्कर्ष न मानकर उसमें भी सुधार की गुंजाइश छोड़ते हुए खोज की अपनी यात्रा जारी रखते थे. सनातन का यही आधार है, जिसके कारण वह आज समय के इतने पहिए घूम जाने के बाद भी अपने बदले स्वरूप में भी उसी मूल आधार को पकड़े हुए है.
किसी एक पंथ का तत्व नहीं है सनातन
यहां इस बात को फिर से दोहराने की जरूरत है कि यह अब भी किसी एक पंथ की बात नहीं हो रही है, यह सभी के लिए है और विश्व के हर पंथ की जो भी खूबसूरत और बेहतरीन शिक्षाएं किसी भी रूप में हैं, वह सनातन का ही अंश है. जिस तरह आकाश से गिरा जल, किसी भी प्रकार से सागर में पहुंचता है, ठीक उसी तरह किसी भी देवता का नमस्कार, केशव को जाता है.
आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरं,
सर्व देव नमस्कारः केशवं प्रति गच्छति.
आप इसे व्यक्ति वाचक संज्ञा में न भी देखें तो भी यह कुछ-कुछ वही बात है, जिसमें कहा जाता है, राह भले अलग हो, पर सच्ची हो तो वह ईश्वर तक ही जाती है. अब आप चाहें तो अपने पसंदीदा किसी भी ईश्वर को चुन लें, वह है तो भी वही है और नहीं है तो भी वही है.
जब कहीं पे कुछ नहीं, भी नहीं था
वही था, वही था
वही था, वही था
वो जो मुझमें समाया
वो जो तुझमें समाया
मौला वही-वही माया
कुन फायाकुन...
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में पढ़ा जाने वाला एकात्मता स्त्रोत भी ऐसी ही बात कहता है.
यं वैदिका मन्त्रदृशः पुराण:
इन्द्रं यमं मातरिश्वानमाहु:।
वेदान्तिनोऽनिर्वचनीयमेकं
यं ब्रह्मशब्देन विनिर्दिशन्ति॥१॥
मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने जिसे इन्द्र, यम, मातरिश्वा (वैदिका देवता) कहकर पुकारा, जिस एक अनिर्वचनीय को वेदान्ती ब्रह्म बताते हैं. शैव जिसे शिव और वैष्णव जिसे विष्णु कहकर स्तुति करते हैं. बौद्ध और जैन जिसे बुद्ध और अर्हत् कहते हैं. सिख संत जिसे सत श्री अकाल कहकर पुकारते हैं. जिसे कोई शास्ता, कोई प्रकृति, कोई कुमारस्वामी कहता है. कोई जिसे स्वामी या माता-पिता भी कहता है, वह एक ही है और अद्वितीय है.
क्या कभी मिटाया जा सकेगा सनातन?
कुल मिलाकर बात ये है कि जिसे मिटा देने की चाहत है, वह मिट कर भी अमिट है. वह नष्ट भी हो जाए तो भी नष्ट नहीं होता है. मैं राम को नहीं मानता, कहने वाले भी इस वाक्य में राम नाम ले ही लेते हैं. इसलिए जो संसार अभी चल रहा है, उसमें तो सनातन का मिटना मुमकिन नहीं, लेकिन, अगर आपने ऐसा कुछ करने का ठान ही लिया है तो इंतजार कीजिए, इस संसार को नष्ट होने दीजिए और फिर जब किसी दूसरी प्रकृति की रचना हो तो आप सनातन को मिटा लीजिएगा... लेकिन ठहरिए. आप ये भी नहीं कर पाएंगे क्योंकि बनना, बनके बिगड़ना और बिगड़ के फिर बन जाना, यह भी तो सनातनी धारणा ही है.