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जेपी नड्डा के बाद कैसा होगा बीजेपी का नया अध्यक्ष? बदलती चुनौतियों के बीच क्‍या है उम्‍मीदें?

बीजेपी अध्यक्ष की कुर्सी संभालते वक्त जेपी नड्डा के सामने अमित शाह बनने जैसी मुश्किल चुनौती थी, लेकिन नये अध्यक्ष के सामने संघ की नजर में नड्डा न बनने की चुनौती होगी, और मोदी-शाह की अपेक्षाओं पर भी खरा उतरना होगा - अब जो भी पैमाने में फिट हो पाएगा, बीजेपी की कमान उसे ही थमाई जाएगी.

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बीजेपी अध्यक्ष वही बनेगा जो मोदी-शाह की अपेक्षाओं पर खरा उतरे और संघ को भी पसंद हो.
बीजेपी अध्यक्ष वही बनेगा जो मोदी-शाह की अपेक्षाओं पर खरा उतरे और संघ को भी पसंद हो.

बीजेपी अध्यक्ष के तौर पर जेपी नड्डा का कार्यकाल 2023 में ही खत्म हो गया था. बीजेपी संविधान के अनुसार वो दूसरी पारी भी संभाल सकते थे, लेकिन उनको सिर्फ लोकसभा चुनाव 2024 तक ही एक्सटेंशन मिल पाया. मौजूदा नियमों के अनुसार बीजेपी का अध्यक्ष तीन-तीन साल का लगातार दो टर्म पूरा कर सकता है, लेकिन अब जेपी नड्डा की जगह नये बीजेपी अध्यक्ष का इंतजार है. 

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फिलहाल बीजेपी के प्रदेश अध्यक्षों के चुनाव की प्रक्रिया चल रही है, और बीजेपी के संविधान के अनुसार, राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव तभी हो सकता है जब देश के कम से कम आधे राज्यों के प्रदेश अध्यक्षों का चुनाव हो जाये. ये काम पूरा होने में अभी दो हफ्ते और लगने की संभावना है. तब तक 18 राज्यों में अध्यक्षों के चयन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी - और उसके बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के कार्यक्रम घोषित कर दिये जाएंगे.

चुनाव प्रक्रिया अपनी जगह है, लेकिन जेपी नड्डा का उत्तराधिकारी वही बनेगा जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सीनियर कैबिनेट साथी अमित शाह की अपेक्षाओं पर खरा उतर रहा होगा - और वो नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी मंजूर हो. 

संघ को कैसा बीजेपी अध्यक्ष चाहिये?

बीजेपी अध्यक्ष को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पसंद और नापसंद के दो पक्ष महत्वपूर्ण हैं. औपचारिक तौर पर संघ न तो बीजेपी या सरकार के कामों में कोई दखल देता है, न ही अपनी तरफ से अध्यक्ष पद के लिए बीजेपी को कोई नाम ही सुझाता है. 

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लेकिन व्यावहारिक तौर पर बीजेपी में अध्यक्ष पद के लिए तय किये गये नामों पर संघ का फाइनल अप्रूवल अनिवार्य होता है. 

संघ और बीजेपी बरसों से ऐसे ही काम करते आ रहे हैं. वाजपेयी-आडवाणी के नेतृत्व वाली बीजेपी के दौर में भी, और मोदी-शाह की बीजेपी के दौरान भी - लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 के बाद थोड़ी तब्दीली आई है. 

और वो तब्दीली भी बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के चुनावों के दौरान एक बयान से ही आई है. बताते हैं कि संघ नेतृत्व बहुत ज्यादा तो नहीं, लेकिन अब पहले की तरह बीजेपी को खुली छूट देने का पक्षधर नहीं रहा. कम से कम अभी तो ऐसी ही स्थिति बनी है. 

चुनाव के दौरान जेपी नड्डा एक इंटरव्यू में समझाने की कोशिश कर रहे थे कि अब बीजेपी मोदी-शाह के चलते अपनेआप में इतनी सक्षम हो गई है कि संघ जैसी संस्था के सपोर्ट की जरूरत नहीं रह गई है. जेपी नड्डा ने किसी का नाम नहीं लिया था, लेकिन उनका भाव और बातों का लब्बोलुआब यही था. फिर क्या था, संघ ने खुद को समेट लिया, और बीजेपी की हालत ये हो गई कि अपने बूते बहुमत लायक नंबर भी नहीं जुटा सकी. नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू की पार्टियों को बैसाखी बनाकर बीजेपी को केंद्र में सरकार बनानी पड़ी. 

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संघ से बीजेपी का ये हाल भी बर्दाश्त नहीं हुआ, और मोहन भागवत ने पूरे एक्शन प्लान के साथ झारखंड में कैंप जमा दिया. झारखंड तो बीजेपी के हाथ से निकल गया, लेकिन हरियाणा और महाराष्ट्र के बाद अब दिल्ली में भी चुनावी फतह के बाद बीजेपी सरकार बनाने जा रही है.

संघ अपने अगले मिशन पर अभी से काम करने लगा है. मोहन भागवत के पश्चिम बंगाल कैंप का मकसद यही है - और बीजेपी के नये अध्यक्ष के लिए सबसे बड़ा टास्क भी यही होगा. 
 
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, संघ चाहता है कि बीजेपी ऐसे मजबूत नेता को अध्यक्ष बनाये, जो संगठन की जरूरतों को पूरा कर सके. मतलब, मोदी-शाह के साथ संघ के साथ भी समन्वय कायम रख सके. 

संघ को लेकर नड्डा का बयान, लोकसभा चुनाव के नतीजे.
हिमाचल चुनाव में हार

मोदी-शाह का क्या पैमाना है

बीजेपी के गठन की शुरुआत से ही अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे दिग्गज और बड़े नेता बीजेपी के अध्यक्ष रह चुके हैं. बल्कि, वाजपेयी-आडवाणी ने ही बीजेपी को केंद्र की सत्ता तक भी पहुंचाया, लेकिन अमित शाह का कोई सानी नहीं नजर आता, जिन्होंने बीजेपी चुनावी मशीन बनाकर बेहद कामयाब राजनीतिक दल बना दिया है. 

देखा जाये तो मोदी-शाह के लिए तो जेपी नड्डा अच्छे ही अध्यक्ष माने जाएंगे. हिमाचल प्रदेश चुनाव की हार को छोड़ दें, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसके साथ ही हुए गुजरात चुनाव में जीत का क्रेडिट भी जेपी नड्डा को दे डाला था. जबकि, 2022 के गुजरात चुनाव में लोगों से रिकॉर्ड वोटों की मोदी की अपील और सीआर पाटील की मेहनत का कमाल था - जिसके लिए पूरी गाइडलाइन अमित शाह ने खुद तैयार कर रखी थी. 

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जहां तक लोकसभा चुनाव में बीजेपी की फजीहत का सवाल है, तो उसके लिए भी मोदी-शाह कभी जेपी नड्डा को जिम्मेदार नहीं मानेंगे, क्योंकि उनकी नजर में तो विलेन कोई और ही रहा - जिसे यूपी के मुख्यमंंत्री योगी आदित्यनाथ ने ‘अति 
आत्मविश्वास’ नाम दिया था. 

ऐसे में मोदी-शाह के लिए नये अध्यक्ष का कामकाज भी नड्डा के दूसरे कार्यकाल जैसा ही होना चाहिये - ऐसा अध्यक्ष जो मोदी-शाह के दिशानिर्देशों और चुनावी एक्शन प्लान को हूबहू अमलीजामी पहना सके. 

बीजेपी की जरूरत क्या है

2024 के आम चुनाव के बाद केंद्र सरकार बनी तो जेपी नड्डा कैबिनेट में शामिल कर लिए गये, और अब एक व्यक्ति दो पदों पर तो रह नहीं सकता. 
अमित शाह भी जब 2019 में गृह मंत्री के रूप में सरकार में शामिल हुए तो बीजेपी अध्यक्ष पद छोड़ने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी. जेपी नड्डा को पहले कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया, और फिर वो राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये.  

पिछली बार भी बीजेपी के अध्यक्ष पद की रेस में भूपेंद्र यादव शामिल थे, लेकिन नड्डा बाजी मार ले गये. एक बार फिर उनका नाम बीजेपी अध्यक्ष पद की रेस में जोड़ा जा  रहा है, जबकि वो भी नड्डा की तरह ही कैबिनेट मंत्री हैं. वैसे तो अनुराग ठाकुर का भी नाम लिया जा रहा है, लेकिन हिमाचल चुनाव में बीजेपी की हार के बाद एक बार फिर नड्डा के ही इलाके से अध्यक्ष बनाया जाने की संभावना न के बराबर लगती है. 

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धर्मेंद्र प्रधान का भी नाम आ रहा है. और कुछ हो न हो बीजेपी के ओबीसी नेता धर्मेंद्र प्रधान कई चुनावों में सफल कैंपेन किया है, और ओडिशा में भी तो बीजेपी की सरकार बन ही गई है. वैसे तो कई ओबीसी चेहरे हैं, लेकिन एक नाम शिवराज सिंह चौहान भी हैं, लेकिन इलाकाई राजनीति हावी हुई तो उनको इंतजार करना पड़ सकता है. 

बीजेपी के सामने बड़ा टास्क अब पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत जीतने का है. ऐसे में चर्चा में आ चुके निर्मला सीतारमण, दग्गुबाती पुरंदेश्वरी और प्रह्लाद जोशी जैसे नेताओं की संभावना ज्यादा लगती है.

लेकिन, बीजेपी अध्यक्ष की कुर्सी आगे वही संभाल पाएगा जो मोदी-शाह की अपेक्षाओं पर भी खरा उतर सके - और वो संघ की भी आंखों का तारा हो. 

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