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मुसलमानों ने वक्‍फ बोर्ड संशोधन बिल का CAA की तरह विरोध क्‍यों नहीं किया?

आज जुमे की नमाज पर कई राज्य सरकारों को आशंका थी कि वक्फ बोर्ड संशोधन अधिनियम के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन हो सकते हैं. पर ऐसा नहीं हुआ. मतलब साफ है कि आम मुसलमान यह समझ रहा है कि यह संशोधन उनके धार्मिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करता है. यह केवल और केवल एक प्रशानिक सुधार का मामला है.

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भोपाल में वक्फ बोर्ड संशोधन बिल का समर्थन करते मुस्लिम समुदाय के लोग.
भोपाल में वक्फ बोर्ड संशोधन बिल का समर्थन करते मुस्लिम समुदाय के लोग.

वक्फ बोर्ड संशोधन बिल संसद से पास हो चुका है. अब राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह विधेयक कानून बन जाएगा. उम्मीद की जा रही थी कि सरकार को यह बिल पेश कराने में उसके सहयोगी दलों की ओर से दिक्कत आ सकती है. पर ऐसा नहीं हुआ. ये भी आशंका थी कि मुस्लिम समुदाय इस विधेयक को लेकर उग्र हो सकता है. पर ऐसा भी नहीं हुआ. आज जुमे की नमाज उत्तर भारत के राज्यों में जिस शांति के साथ निपट चुकी है यह इस बात का प्रतीक है कि केंद्र सरकार को इस बिल पर मुस्लिम समुदाय का भी समर्थन मिला है. बुधवार को जिस दिन बिल को लोकसभा में पेश किया गया था उस दिन तो देश के कई हिस्सों से मुसलमानों की ओर मिठाई बांटने की खबरें भी आईं थीं. कई जगह मुस्लिम समुदाय ने धूम-धड़ाके और पटाखों के साथ इस बिल का स्वागत किया.

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अब सवाल ये उठता है कि क्या मोदी सरकार की पहुंच मुस्लिम कम्युनिटी में भी हो गई है? क्योंकि अगर ये मान भी लिया जाए कि बिल का समर्थन करने वाले बीजेपी के लोग थे तो भी अगर जुमे की नमाज पर पूरे देश में कहीं से भी हिंसक प्रदर्शन की खबरें नहीं है तो इसका मतलब तो यही निकलता है कि मुस्लिम समुदाय को यह बिल मंजूर है. आम मुसलमान शायद यह समझने लगा है कि विपक्ष इसलिए इस बिल का विरोध कर रहा है क्योंकि उसे तो मोदी सरकार की हर बात का विरोध करना है. आइये देखते हैं कि ऐसा क्या रहा जिसके चलते इस बार वक्फ बोर्ड संशोधन का उस तरह विरोध नहीं हुआ जिस तरह का विरोध सीएए या एनआरसी के खिलाफ हुआ था.

1-विपक्ष के पास ऐसे तर्क नहीं थे जो मुसलमानों को भड़का सके, जेपीसी ने मौका ही नहीं दिया

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विपक्ष का विरोध इस आधार पर था कि यह मुसलमानों की धार्मिक मामलों में अड़ंगा डालता है. पर विपक्ष इस बात को साबित नहीं कर सका कि किस तरह यह विधेयक मुसलमानों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है. मुस्लिम नेताओं ने जो तर्क दिए इतने सतही थे कि उन पर आम मुसलमानों ने भरोसा नहीं किया. मुस्लिम नेताओं ने कहा कि वक्फ एक्ट में संशोधन नहीं हो सकता. पर जब जनता खुद देख रही है कि एक्ट बना ही था संसद के कानून से, और कई बार संशोधन भी हुआ संसद से तो फिर संशोधन क्यों नहीं हो सकता? विरोधियों ने कहा कि वक्फ अधिनियम संशोधन पर सरकार बात नहीं करना चाहती है. पर सरकार ने बताया कि जेपीसी इसलिए ही बनाई गई थी. देश भर के लाखों मुसलमानों से जेपीसी ने बात भी की जो रिकॉर्ड में दर्ज है. सरकार ने उनके कई सुझावों को स्वीकार भी किया. रही बात गैर इस्लामिक लोगों के बोर्ड में शामिल करने की तो गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कर दिया कि इस तरह की कोई बात नहीं है. बताया जा रहा है कि गैर इस्लामिक लोगों को केवल उस कमेटी में जगह दी जा रही है जिसका काम दूसरे धर्म के लोगों की जमीनों के कब्जे की जांच करना होगा.

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2-बीजेपी ने CAA के मुकाबले वक्‍फ बोर्ड के बारे में जनता के बीच बेहतर ढंग से जानकारी पहुंचाई

इस बार भाजपा ने वक्‍फ से जुड़ी अनियमितताओं की जानकारी को ज्‍यादा बेहतर ढंग से लोगों के बीच पहुंचाया. बीजेपी ने बताया कि वक्फ की संपत्ति का काम गरीब मुसलमानों और विधवा औरतों की सहायता करने के लिए होता है पर ऐसा हो नहीं रहा है. इसके साथ ही सरकार ने यह साबित किया कि कई लाख एकड़ जमीन से कमाई मात्र डेढ़ से 2 सौ करोड़ ही हो रही है. जबकि 12 हजार करोड़ तक की कमाई हो सकती है. यह तथ्य सा्मने लाया गया कि वक्फ बोर्ड कई जगह सैकड़ों एकड़ जमीन का किराया मात्र कुछ हजर रुपये ही ले रही है. जिसमें कई फाइव स्टार होटल भी शामिल हैं. 

इसके साथ ही पिछड़े मुस्लिम समुदाय को यह बात भी पसंद आई कि बोर्ड में उनके लिए जगह भी आरक्षित की गई है.महिलाओं को भी जगह दिए जाने से आम मुसलमानों के लिए मामला इतना संगीन नहीं हुआ कि उन्हें पत्थर लेकर मैदान में उतरना पड़े. दरअसल वक्फ बोर्ड की करतूतों के बारे में आम मुसलमानों को पहले से ही पता था. वोट बैंक की लालच में अब तक कोई सरकार उसे सामने नहीं ला रही थी . पहली बार ऐसा हुआ कि किसी सरकार ने इस भ्रष्टाचार को सामने लाने में कामयाब हुई है.

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3-मुसलमान जान गए थे कि उन्‍हें सीएए के बारे में गलत जानकारी दी गई थी, उससे किसी की नागरिकता नहीं गई

आम मुसलमान इस मुद्दे पर तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों और अपने धर्म के नेताओं के पीछे इसलिए भी नहीं गया क्योंकि उसे सीएए के नाम पर बरगलाया जाना याद आ गया. विपक्ष के नेताओं ने सीएए के विरोध में यह बात फैलाई थी कि मुसलमानों की नागरिकता चली जाएग. सीएए बिल पास हुए इतना समय बीत जाने के बाद भी आज तक किसी भी मुसलमान की नागरिकता नहीं गई है . एनआरसी तो सरकार करीब करीब रोक ही दिया. अब आम मुसलमानों को यह बात समझ में आ गई है कि वक्फ बोर्ड बिल पर भी हमें बरगलाया जा रहा है. आम मुसलमान यह समझ गया है कि इस बिल से हमारा भले कोई फायदा न हो पर वक्फ की संपत्तियां तो शायद कब्जा मुक्त हो सकें.

4-मुस्लिम समुदाय को समझ में आ गया है कि वक्फ बोर्ड संशोधन से नुकसान के बजाय फायदा ज्यादा

ज्‍यादातर मुसलमान वक्फ बिल के विरोध को सीरियसली इस लिए नहीं लिए क्योंकि उन्हें यह बात समझ में आ गई थी कि यह धर्म का नहीं संपत्ति प्रबंधन का मामला है. मुसलमानों को पता है कि सरकार जितना कह रही है उसका बीस प्रतिशत भी सही हो गया तो उनका कल्याण तय है. आम लोग देख रहे हैं कि सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाओं का लाभ हिंदुओं से ज्यादा उन्हें मिल रहा है. इसका मतलब है कि सरकारी तौर पर मुसलमानों के साथ अन्याय नहीं हो रहा है. अगर वक्फ बोर्ड की आय बढ़ती है तो कुछ गरीब मुसलमानों का कल्याण तो जरूर ही होगा. 

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