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महाराष्ट्र चुनाव में जरांगे पाटील बन गए 'हार्दिक पटेल', जानिये किसकी नींद उड़ी |Opinion

मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता जरांगे पाटील ने 24 घंटे के अंदर अपनी रणनीति बदलकर किसको चकमा दिया है? उनके फैसले से महाविकास अघाड़ी को फायदा होने जा रहा है या महायुती को?

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जरांग पाटिल और महायुति के नेता अजित पवार, एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस
जरांग पाटिल और महायुति के नेता अजित पवार, एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस

यह माना जा रहा था कि महाराष्ट्र की लड़ाई में भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे मुश्किल मराठा आरक्षण आंदोलन के चलते मराठों की नाराजगी हो सकती है. फिर जब मराठा आरक्षण की अलख जगाने वाले जरांगे पाटील ने अपने प्रत्याशी खड़े करने की घोषणा कर दी तो एक बार ऐसा लगा कि अब तो कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी ( शरद पवार) को नुकसान होना तय है. बदलने घटनाक्रम में अब पाटील ने अपने प्रत्याशियों को हटा लिया और मराठों को अपने विवेक के आधार पर किसी को भी वोट देने की अपील कर दी है. देखने में तो ऐसा लग रहा है कि यह बीजेपी के लिए खुशखबर है पर वास्तव में ऐसा नहीं है. कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (शरद पवार) भी इसे अपने लिए एक खुशखबरी ही मान रही है. क्या ऐसा संभव है कि जरांगे पाटील का मैदान से हटना दोनों ही गठबंधनों के लिए फायदेमंद हो? आइये देखते हैं कि पाटील के फैसले से किसे फायदा हो सकता है और किसका नुकसान हो सकता है.

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बीजेपी के लिए कितना फायदा-कितना नुकसान

मराठा समुदाय महाराष्ट्र की जनसंख्या का लगभग 32% है  जरांगे पाटील के नेतृत्व में चलने वाला मराठा आरक्षण आंदोलन के चलते ऐसा माना जा रहा था कि महा विकास अघाड़ी को बहुत फायदा होने वाला है.जैसा कि अभी कुछ महीने पहले हुए लोकसभा चुनावों में देखा गया था. एमवीए ने मराठवाड़ा में आठ में से सात सीटें जीतीं, जो मराठा आंदोलन का केंद्र है. मराठों की नाराजगी के चलते ही कई प्रमुख भाजपा नेता भी हारे थे. 2019 के चुनावों में, भाजपा ने इन आठ लोकसभा सीटों में से चार पर जीत हासिल की थी, जबकि उसके सहयोगी शिवसेना (तब एकजुट) ने तीन पर जीत दर्ज की थी. कांग्रेस-एनसीपी को तब कोई सीट नहीं मिली थी.

मनोज जरांगे-पाटील ने किसी भी उम्मीदवार का समर्थन नहीं करने का चौंकाने वाला निर्णय लिया है. पहले उन्होंने अपने उम्मीदवार उतारने का निर्णय लिया, फिर उसे भी बदल दिया है. उन्होंने मराठा समुदाय से अपील की कि वे केवल उन उम्मीदवारों को हराने के उद्देश्य से मतदान न करें, जो आरक्षण का विरोध करते हैं. उन्होंने यहां तक कहा है कि मराठा आरक्षण की मांग का समर्थन करने वाले भाजपा नेताओं को वोट देने के लिए लोग स्वतंत्र हैं. भाजपा ने तुरंत जरांगे पाटील के इस निर्णय की सराहना की और इसे उनके मराठा आरक्षण आंदोलन के लिए समझदारी भरा, उचित और स्वस्थ कदम बताया है.

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हालांकि यह महायुति के लिए केवल खयाली पुलाव भर है. मराठे कभी भी बीजेपी को वोटर नहीं रहे हैं. पिछले सभी चुनाव बीजेपी ओबीसी वोटर्स के बदौलत चुनाव जीतती रही है. इस बार भी बीजेपी के लिए ठीक यही रहेगा कि चुनाव में मराठे, पिछड़े-दलित वोट बंट जाएं. जैसा कि हरियाणा में हुआ. बीजेपी जिस तरह से ओबीसी और दलित वोटों पर खुद को फोकस किए हुए है, उसके चलते संदेह है कि मराठों का वोट उसे शायद ही मिले. राजनीतिक विश्‍लेषक सौरभ दूबे कहते हैं कि बीजेपी ने इसी रणनीति के तहत ही पार्टी में किसी बड़े मराठा नेता को बहुत आगे नहीं किया है. पार्टी के पास दिखावे के लिए भी कोई बड़ा मराठा नेता नहीं है.  

एमवीए दलों के लिए जरूर हो सकता है फायदेमंद

जरांगे पाटील में 12 घंटे से भी कम समय में आए बदलाव को एमवीए अपने पक्ष में मान रहा है. दरअसल रविवार रात 11 बजे की प्रेस कॉन्फ्रेंस के ठीक 12 घंटे के बाद उनका पलटना किसके पक्ष के जाएगा, इस पर रानजीतिक विश्लेषषकों के अलग-अलग मत हैं. उन्होंने रविवार को महायुति के खिलाफ बेशर्मी से धोखा देने वाला बयान दिया और उसका बदला लेने का संकल्प जताया था. यहां तक कि उन्होंने यह वादा किया था कि वह सुबह 7 बजे से पहले उन उम्मीदवारों की सूची जारी करेंगे जिनका वह समर्थन करेंगे. उन्होंने यह भी संकेत दिया था कि ये उम्मीदवार बीड, जालना, छत्रपति संभाजीनगर और पुणे से खड़े हो सकते हैं. वास्तव में अगर जरांगे की ओर से ये उम्मीदवार खड़े हुए होते तो मराठा वोटों का बंटना तय था. ये बीजेपी के लिए काफी राहत वाला होता.

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यही कारण है कि महाराष्ट्र की राजनीति के चाणक्य बोले जाने वाले शरद पवार ने जरांगे पाटील के इस फैसले को अपने पक्ष में बताया है. एनसीपी (एसपी) के प्रमुख शरद पवार ने कहा, हमें उनके निर्णय से कोई लेना-देना नहीं है. अगर उन्होंने अपने उम्मीदवारों का समर्थन किया होता, तो भाजपा को  मराठा वोटों के विभाजन के चलते लाभ होता. पवार कहे हैं कि जरांगे ने सही फैसला किया है.  

क्या हार्दिक पटेल बनेंगे जरांगे पाटील

पर जिस तरह की बातें जरांगे पाटील कर रहे हैं उससे यही लगता है कि वो बीजेपी का नुकसान नहीं चाहते हैं. यही कारण है कि कुछ लोगो उनमें गुजरात में पटेल आरक्षण आंदोलन की उपज हार्दिक पटेल से उनकी तुलना कर रहे हैं.हार्दिक पटेल अंततः बीजेपी में शामिल हो गए. रविवार को अपने प्रत्याशियों के नाम की घोषणा करने वाले जरांगे.

सोमवार सुबह 9:30 बजे घोषणा करते हैं कि वह किसी भी उम्मीदवार का समर्थन नहीं करेंगे. यह कहते हुए कि मित्र दलों ने समय पर नामों की सूची नहीं भेजी थी. उन्होंने दावा किया कि वह किसी दबाव में नहीं हैं. मराठा समुदाय से अपनी मर्जी के अनुसार वोट देने का अनुरोध करते हुए जरांगे पाटील ने कहते हैं कि कुछ बाधाओं के कारण हमारे गठबंधन के साझेदारों से सूची नहीं मिल सकी. बीजेपी उम्मीदवारों का भी वो सपोर्ट करने को तैयार हैं अगर उम्मीदवार हमें लिखित में देंगे कि वे हमारी आरक्षण मांग का समर्थन करते हैं. वो यह भी कहते हैं कि हम उनका समर्थन करेंगे और उनके पत्र या मांग को किसी और के साथ साझा नहीं करेंगे. मतलब साफ है कि उनके लिए बीजेपी अछूत नहीं है. राजनीति अनंत संभावनाओं का खेल है.

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