महाराष्ट्र की राजनीति में इस समय चर्चा इस बात की है कि क्या महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव परिणाम आने के तुरंत बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लग जाएगा. यह केवल आंकलन ही है, पर परिस्थितियां इस ओर ही इशारा कर रही हैं. जब 15 अक्टूबर को महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों के कार्यक्रम की घोषणा की गई, उस समय ही तमाम राजनीतिक विश्वलेषकों का कहना था कि इससे संवैधानिक संकट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है. दरअसल 23 नवंबर को काउंटिंग की तिथि घोषित की गई और 26 नवंबर को वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है. चुनाव परिणाम और महाराष्ट्र सरकार के कार्यकाल की समाप्ति के बीच महज 48 घंटे का ही वक्त है. यानी, दो दिन में महाराष्ट्र की नई सरकार को शपथ ले लेना है. लेकिन, जिस तरह दोनों गठबंधनों, MVA और महायुति, के भीतर मुख्यमंत्री पद को लेकर सिरफुटव्वल चल रही है, लगता नहीं कि नई सरकार को लेकर जल्द कोई फैसला होने वाला है. और यदि चुनाव नतीजों में दोनों गठबंधन आसपास सीट जुटाते हैं, तो खरीद-फरोख्त भी होगी. कुलमिलाकर 48 घंटे के कम समय में महाराष्ट्र की नई विधानसभा का गठन मुमकिन नहीं लगता है.
1- महाराष्ट्र चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिलने के आसार कम है
तमाम एग्जिट पोल को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि दोनों गठबंधनों महायुति और महाविकास अघाडी के बीच बहुत मामूली सा अंतर है. वैसे तो करीब 90 प्रतिशत एग्जिट पोल महायुति को आगे दिखा रहे हैं. पर दुर्भाग्य से किसी भी पार्टी को बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है. जाहिर है कि जब किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिलेगा तो विधायकों की खरीद फरोख्त होगी. महाराष्ट्र में पूरी की पूरी पार्टी के एक गठबंधन से दूसरे गठबंधन में चले जाने का इतिहास रहा है. महायुति और महाविकास अघाडी दोनों में ही सीएम पद के लिए मारामारी करने वाले बहुतेरे लोग हैं. एकनाथ शिंदे की फिर से लॉटरी लग सकती है. महायुति में अगर बीजेपी अपने किसी नेता को सीएम बनाने की सोचती है तो एमवीए उन्हें यह पद ऑफर कर सकती है. अजित पवार और शरद पवार एक होकर अपने लिए सीएम पद मांग सकते हैं. बहुत सी ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होंगी जिनके समाधान के लिए समय चाहिए होगा. जाहिर है कि इसे आधार बनाकर राज्यपाल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकते हैं.
2- नई सरकार के लिए व्यापक तोड़फोड़ की आशंका
महाराष्ट्र में पहली बार 6 पार्टियां लड़ाई में हैं. जब इतनी पार्टियां मजबूत स्थिति में होती हैं तो चुनाव नतीजों के त्रिशंकु होने की संभावना ज्यादा होती है. पर अगर ऐसा नहीं भी होता है और दोनों गठबंधनों में 10 से 15 सीटों का अंतर होता है तो जाहिर है कि तोड़फोड़ की आशंका बढ़ जाएगी. जाहिर है कि ऐसी स्थिति में हॉर्स ट्रेडिंग से इनकार नहीं किया जा सकता है. विधायकों की खरीद-फरोख्त ही नहीं महागठबंधनों के फेस बदलने की भी संभावना रहेगी. सीएम पद की महत्वाकांक्षा के चलते बहुत बड़े उलट फेर भी हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में केवल 3 दिन में सरकार बन जाना असंभव ही दिखता है. राज्यपाल ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकते हैं.
3- महाराष्ट्र में होने वाली मारामारी के लिए क्या चुनाव आयोग और भाजपा की मिलीभगत जिम्मेदार?
चुनाव आयोग ने जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों का कार्यक्रम घोषित किया उस समय ही शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने कहा कि महायुति सरकार राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की योजना बना रही है. राउत का कहना था कि चुनाव आयोग ने इसे ध्यान में रखते हुए चुनाव कार्यक्रम बनाया है. राउत के आरोपों की सच्चाई का तो पता नहीं, लेकिन हालात तो सचमुच यही है कि नतीजों की घोषणा और विधानसभा के मौजूदा कार्यकाल की समाप्ति के बीच केवल तीन दिन का समय रखा गया. राउत ने व्यावहारिक कठिनाई भी बताई थी कि विधायकों को विधायक दल के नेता का चुनाव करने के लिए पूरे राज्य से आना होगा. महाराष्ट्र एक बड़ा राज्य है और इसमें समय लगेगा. राउत ने सीधे गृह मंत्री अमित शाह पर आरोप लगाया था कि वे नहीं चाहते हैं कि महाराष्ट्र में एमवीए की सरकार बने. वे 26 नवंबर के तुरंत बाद राष्ट्रपति शासन लागू करना चाहते हैं और इसलिए इतनी कम समय सीमा दी गई. वे भाजपा पर चुनावों में हेरफेर करने के लिए चुनाव आयोग के इस्तेमाल का आरोप लगाते हैं. संजय राउत के आरोपों में इसलिए भी दम दिखता है कि झारखंड और महाराष्ट्र के चुनाव तो जम्मू-कश्मीर और हरियाणा के चुनाव के साथ या तत्काल बाद कराए जा सकते थे. और ऐसा करने से ये मारामारी नहीं होती.
4- चुनाव आयोग पर लगने वाले आरोपों में कितना है दम
चुनाव आयोग किसी भी राज्य में चुनाव किस महीने और किस तारीख को होने वाला है इसके लिए मौसम, त्यौहार, सुरक्षा बलों की उपलब्धता और परीक्षाओं जैसे अन्य कारकों पर भी विचार करता है. लेकिन कार्यक्रम निर्धारित करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारक विधानमंडल की समाप्ति की तिथि है, क्योंकि नियमानुसार इस तिथि से पहले चुनाव कराए जाने चाहिए. महाराष्ट्र में हरियाणा और जम्मू कश्मीर के साथ चुनाव न करवा पाने के लिए चुनाव आयुक्त ने सफाई दी थी कि महाराष्ट्र में बारिश की वजह से बीएलओ का काम भी बाकी है. गणेश उत्सव, पितृ पक्ष, नवरात्रि और दिवाली समेत कई त्योहार भी हैं. इस वजह से महाराष्ट्र के चुनाव का शेड्यूल जारी नहीं किए गए.
संविधान का अनुच्छेद 172 (1), जो राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल निर्धारित करता है. इस अनुच्छेद के अनुसार प्रत्येक राज्य की प्रत्येक विधानसभा, जब तक कि उसे पहले भंग नहीं कर दिया जाता, अपनी पहली बैठक के लिए नियत तारीख से पांच वर्ष तक बनी रहेगी, इससे अधिक नहीं, तथा पांच वर्ष की उक्त अवधि की समाप्ति विधानसभा के विघटन के रूप में मानी जाएगी. इसके अतिरिक्त, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 15 में प्रावधान है कि विधानसभा चुनाव की अधिसूचना सदन के कार्यकाल की समाप्ति से छह महीने पहले जारी नहीं की जानी चाहिए.
लेकिन इसके साथ ही चुनाव आयोग को चुनाव कार्यक्रम तय करने का एकमात्र विशेषाधिकार देते हुए किसी समय-सीमा को अनिवार्य नहीं करते हैं जिसके भीतर चुनाव पूरे होने चाहिए या पार्टियों को सरकार बनाने का दावा करने की अवधि तय नहीं करते हैं. हालांकि, पूरी प्रक्रिया विधानसभा के कार्यकाल के पूरा होने के छह महीने के भीतर पूरी होनी चाहिए. इस एक मात्र इस उपबंध के चलते कोई संवैधानिक संकट उत्पन्न होने की कोई नौबत नहीं आती. हालांकि इसकी अलग-अलग व्याख्या हो सकती है. कोई भी सरकार और कोर्ट उपरोक्त उपबंधों को अपने हिसाब से डिफाइन कर सकती है.
आम तौर पर चुनाव आयोग नतीजों के बाद की औपचारिकताओं के लिए पर्याप्त समय छोड़ने की कोशिश करता है, लेकिन हाल के दिनों में उसने विधानसभाओं की समाप्ति तिथि के करीब नतीजों की घोषणा की है. उदाहरण के लिए, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश विधानसभाओं के नतीजे 2 जून को घोषित किए गए, उसी दिन जब उनका कार्यकाल समाप्त हुआ था.