दिल्ली विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ताल ठोंककर चुनाव मैदान में उतर चुकी है. राहुल गांधी-प्रियंका गांधी और अध्यक्ष मल्लिलकार्जुन खड़गे के दिल्ली चुनाव में सक्रिय न होने के चलते लोगों को ऐसा लग रहा था जैसे कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को अंदर ही अंदर समर्थन दे दिया हो. बार-बार दिल्ली की रैलियों में राहुल गांधी के आने की बात होती और ऐन मौके पर पता चलता कि राहुल की तबीयत नासाज है. पर मंगलवार से सब कुछ बदला बदला सा लग रहा है. राहुल गांधी ने तो अरविंद केजरीवाल को घेरने में लगता है बीजेपी को भी पीछे छोड़ दिया है. राहुल गांधी अरविंद केजरीवाल को दिल्ली शराब घोटाला, शीशमहल और दिल्ली दंगे के लिए कठघरे में खड़ा कर रहे हैं. दूसरी ओर अरविंद केजरीवाल भी पूछ रहे हैं कि राहुल गांधी राजमहल पर चुप क्यों हैं, नेशनल हेराल्ड घोटाले में अब तक गांधी परिवार का कोई गिरफ्तार क्यों नहीं हुआ? जाहिर है कि पिछले लोकसभा चुनावों तक एक दूसरे के साथ कदम ताल करते हुए चलने वाले राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल अब खुलकर आमने सामने हैं. ऐसा क्या हुआ कि राहुल गांधी अब कमर कस कर आम आदमी पार्टी पर हमला करने को तैयार हैं.
1-पिछले कई महीनों से कांग्रेस कन्फ्यूज है आम आदमी पार्टी को लेकर
कांग्रेस पार्टी पिछले कई सालों से आम आदमी पार्टी को लेकर कन्फ्यूज है. सबसे पहले कांग्रेस लीडर अजय माकन ने ही आम आदमी पार्टी सरकार के शराब घोटाले को उजागर किया. फिर ये कांग्रेस पार्टी ही थी जो आम आदमी पार्टी और विपक्षी दलों के नेताओं साथ जंतर-मंतर जाकर शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल को जेल भेजे जाने का विरोध कर रही थी. अब एक बार फिर कांग्रेस अरविंद केजरीवाल को दिल्ली शराब घोटाले का सूत्रधार बता रही है. लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी साथ चुनाव लड़ते हैं. पंजाब में फ्रैंडली मैच होता है. पर हरियाणा आते-आते दोनों दूर हो जाते हैं. पर एक दूसरे के खिलाफ हमले नहीं करते. अभी दिल्ली विधानसभा चुनावों के समय भी कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच क्या चल रहा है किसी के समझ से बाहर था.
अजय माकन ने अरविंद केजरीवाल के खिलाफ पीसी की और अगली पीसी में कुछ बड़ा खुलासा करने की बात कही. पर माकन को फिर से पीसी करने से रोक दिया गया. विथानसभा चुनावों के पहले दिल्ली कांग्रेस कमेटी ने आम आदमी पार्टी सरकार के खिलाफ यात्रा निकाली. कहा गया कि राहुल-प्रियंका और खड़गे सभी आएंगे पर किसी भी बड़े नेता को छोड़िए मध्यम दर्जे के राजनेता भी नहीं पहुंचे. ऐसा संकेत दिया गया जिससे लगा कि भविष्य में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में कुछ समझौता हो सकता है. अभी ट्यूजडे सुबह तक लोगों को ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच कोई समझौता हो गया है. पर अब यह भ्रम टूट चुका है.
2-कांग्रेस समझ गई है कि बिना आप को खत्म किए बिना गुजारा नहीं है
राहुल गांधी के अचानक सक्रिय होने और अरविंद केजरीवाल पर जबरदस्त हमला करने के पीछे यह माना जा रहा है कि कांग्रेस नेता यह समझ चुके हैं कि अगर राजनीति में सर्वाइव करना है तो उसे भारतीय जनता पार्टी के बजाय समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी जैसे दलों को कमजोर करने के बारे में सोचना होगा. दरअसल कांग्रेस जिन वोटर्स के बदौलत सत्ता में आती रही है उससे बीजेपी का बहुत लेना देना नहीं है. कांग्रेस का असल नुकसान आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी जैसी क्षेत्रीय पार्टियां कर रही हैं. अगर दलित और मुसलमान वोटर्स फिर से कांग्रेस की ओर आ जाएं तो आम आदमी पार्टी का वर्चस्व दिल्ली से खत्म हो जाएगा. नेशनल कॉन्फिडरेशन ऑफ दलित एंड आदिवासी ऑर्गेनाइजेशंस के एक सर्वे को सही माने तो 5 फरवरी को दिल्ली विधानसभा के चुनावों में 21 फीसदी दलित मतदाताओं ने कांग्रेस को वोट देने की बात कही है.जबकि 2020 के विधानसभा चुनावों में 11 प्रतिशत दलितों ने ही कांग्रेस को वोट दिया था. मतलब साफ है कि अगर कांग्रेस थोड़ी और मेहनत करती है तो कम से कम आम आदमी पार्टी दिल्ली से साफ हो सकती है. इसका प्रभाव यह होगा कि कांग्रेस कम से कम दिल्ली और पंजाब में अपने पुराने रुतबा को हासिल करने की राह पर होगी. दूसरा पक्ष यह भी है कि आम आदमी पार्टी अगर दिल्ली में फिर से सत्ता में आती है तो इसमें कोई दो राय नहीं है कि राहुल गांधी के बजाय मुख्य विपक्षी नेता के रूप में अरविंद केजरीवाल के राष्ट्रीय स्तर पर उभरने का मौका मिल सकता है. यह स्थिति भी कांग्रेस के लिए एक चिंता की बात है.
3-शीला दीक्षित के दिल्ली मॉडल की बात कितनी असरदार
पिछले हफ्ते, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि दिल्ली अब झूठे प्रचार और पीआर मॉडल नहीं चाहती है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आप संयोजक अरविंद केजरीवाल अपना रहे हैं. बल्कि दिल्ली के लोग शीला दीक्षित का वास्तविक विकास मॉडल चाहते हैं. राहुल गांधी की इस बात में दम हो सकता है. क्योंकि दिल्ली में ऐसे बहुत से लोग मिलते हैं जो आम आदमी पार्टी या भारतीय जनता पार्टी को वोट देते हैं, पर जब विकास की बात होती है तो शीला दीक्षित का नाम लेते हैं. यानि कि कहीं न कहीं उनके अंतर्मन में कांग्रेस है पर विकल्पहीनता की स्थिति में वो दूसरों को वोट दे रहे हैं. राहुल गांधी और कांग्रेस को ऐसा लगता है कि अगर ठीक से मेहनत किया जाए तो शीला दीक्षित के विकास मॉडल को भुनाया जा सकता है.
15 साल पहले की दिल्ली जिन लोगों ने नहीं देखी होगी उनके लिए नियमित बिजली, फ्लाईओवर, मेट्रो रेल आदि की कोई कीमत नहीं है. पर इन सबके पीछे शीला दीक्षित की भूमिका को निश्चित रूप से इनकार नहीं किया जा सकता है.
जब कांग्रेस के पास कोई मजबूत चेहरा नहीं है, तो कई नेता मतदाताओं को यह याद दिलाने में जुटे हैं कि दीक्षित के कार्यकाल में बिजली और पानी की आपूर्ति में भारी सुधार हुआ था, बिजली क्षेत्र में सुधार किए गए थे, मेट्रो का विस्तार हुआ था, फ्लाईओवर और सड़क जैसी आधारभूत संरचनाएं विकसित हुई थीं, सार्वजनिक वाहनों के लिए सीएनजी अनिवार्य करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू किया गया था, दिल्ली का हरित क्षेत्र बढ़ा था, और भागीदारी मॉडल (सरकार-जनता की साझेदारी) की शुरुआत की गई थी, जिससे प्रदूषण से निपटने सहित कई परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में मदद मिली.
4-कांग्रेस की यही रणनीति है, देर से आओ और छा जाओ
जो लोग राहुल गांधी के देर से मैदान में उतरने की बात कर रहे हैं उन्हें समझना होगा कि कांग्रेस की रणनीति ही यही है. कांग्रेस शुरू से ही ऐसे ही राजनीति करती रही है. उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनावों के दौरान मतदान के मात्र कुछ दिन पहले ही गांधी परिवार के लोग मैदान में उतरे. फिर भी कांग्रेस प्रत्याशियों ने भारी वोट अर्जित करने में सफलता पाई. दरअसल कांग्रेस को लोग दूसरी पार्टियों से नाराज होकर ही देते रहे हैं. 1977 में इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी और संजय गांधी देश में खलनायक बन चुके थे. पर 1980 तक जनता पार्टी की आपसी रार ने उन्हें आने का मौका दिया और कांग्रेस भारी मतों से विजयी हुई.आम आदमी पार्टी और बीजेपी की अलोकप्रियता ही कभी न कभी कांग्रेस की वापसी का कारण बनेगी.